BBC navigation

जानिए मौद्रिक नीति की बारीकियाँ

 शुक्रवार, 20 सितंबर, 2013 को 10:34 IST तक के समाचार

भारतीय रिज़र्व बैंक की मौद्रिक नीति आम इंसान की ज़िंदगी को बहुत अधिक प्रभावित करती है. यह नीति महंगाई पर क़ाबू पाने की कोशिश के साथ ही ब्याज दर भी तय करती है. ऐसे में मौद्रिक नीति की बारीकियों को समझने के लिए बीबीसी ने जानेमाने अर्थशास्त्री रोहित बंसल से बात की.

मौद्रिक नीति क्या है?

मौद्रिक नीति एक क़िस्म का अस्त्र है, जिसके आधार पर बाज़ार में मुद्रा की आपूर्ति को नियंत्रित किया जाता है. मौद्रिक नीति ही यह तय करती है कि रिज़र्व बैंक किस दर पर बैंकों को क़र्ज़ देगा और किस दर पर उन बैंकों से वापस पैसा लेगा.

मौद्रिक नीति को कौन तय करता है?

मौद्रिक नीति को भारतीय रिज़र्व बैंक अपने केन्द्रीय बोर्ड की सिफ़ारिशों के आधार पर तय करता है. इस बोर्ड में जानेमाने अर्थशास्त्री, उद्योगपति और नीति निर्माता शामिल होते हैं.

इसके लिए रिज़र्व बैंक समय-समय पर भारत सरकार के आर्थिक विभागों से सलाह-मशविरा करता है, लेकिन अंतिम निर्णय रिज़र्व बैंक ही लेता है.

देश की अर्थव्यवस्था की वर्तमान स्थिति को देखते हुए मौद्रिक नीति किस तरह महत्वपूर्ण है?

मौद्रिक नीति के आधार पर बैंकों की ब्याज दरें तय होती है.

इस समय नए गवर्नर के सामने सबसे बड़ी चुनौती है कि बाज़ार में इतना पैसा न जाए कि महंगाई बढ़ जाए. इसलिए क़ीमतों पर क़ाबू शायद उनकी बड़ी प्राथमिकता होगी, लेकिन अर्थव्यवस्था के विकास के लिए उद्योगों को पैसा मिलना भी ज़रूरी है. इसलिए भारत जैसे विकासशील देश की मौद्रिक नीति में सामंजस्य सबसे बुनियादी बात है.

एक तरफ़ तो अर्थव्यवस्था कि स्थिति अच्छी नहीं है और दूसरी तरफ़ महंगाई एकदम से बढ़ती जा रही है. इस विरोधाभास का क्या कारण है?

इसकी एक वजह यह है कि बाज़ार में क़र्ज़ उपलब्ध है, लेकिन उसका वितरण बड़ा बेढंगा है. यानि जो छोटे उद्यमी हैं, जिनके पास गिरवी रखने के लिए कुछ नहीं है, उन्हें क़र्ज़ नहीं मिल रहा है.

रघुराम राजन ने अपने प्रारंभिक भाषण में एक बहुत बड़ी बात यह कही है कि भारत की मुद्रास्फीति को दर्शाने वाला जो थोक मूल्य सूचकांक है, आम ज़िंदगी में हमें उस सूचकांक से कहीं अधिक महंगाई का सामना करना पड़ता है.

महंगाई के आंकड़ों में इस अंतर का क्या असर होता है?

थोक मूल्य सूचकांक का बहुत अधिक मतलब नहीं है, लेकिन इसी के आधार पर बैंक दर तय हो जाती हैं. इसी के आधार पर हमारी जमापूंजी पर हमें ब्याज मिलता है.

जब हमें लगता है कि बैंकों में पैसा रखने पर हमें कुछ ख़ास मिलेगा नहीं तो हम सोना ख़रीद लेते हैं.

रिर्जव बैंक के सामने सबसे बड़ी चुनौती महंगाई को काबू में करने की है.

इस वजह से मुझे लगता है कि अगर मौद्रिक नीति के लिए इस्तेमाल होने वाले महंगाई के सूचकांक को ठीक कर दें तो इसकी सच्चाई सामने आने लग जाएगी, विश्वसनीयता बढ़ेगी और जमाकर्ताओं को उनके धन का एक जायज़ रिटर्न मिलेगा.

मौद्रिक समीक्षा से हमें क्या उम्मीद करनी चाहिए?

बीते दिनों रुपए में गिरावट के बाद फैली घबराहट के बाद भारत ने कई आपातकालीन क़दम उठाए थे. इनमें कुछ हद तक ढील दिए जाने के संकेत हैं.

बाज़ार में नक़दी के प्रवाह को बढ़ाया जा सकता है या इस मोर्चे पर सख़्ती देखने को मिलेगी?

मेरे ख़्याल से इस समय रघुराम राजन का सबसे बड़ा लक्ष्य महंगाई को क़ाबू में रखने का होगा. ऐसे में वो नक़दी को भी उसी संदर्भ में देखेंगे, लेकिन मुझे अभी भी लगता है कि नक़दी का वितरण ज्यादा बड़ी चुनौती है. बैंकों के पास काफ़ी नक़दी है, लेकिन वो ऋण नहीं देते हैं.

अमरीकी फ़ेडरल रिज़र्व की ताज़ा घोषणाओं का हमारी मौद्रिक नीति पर कितना असर पड़ सकता है?

मुझे लगता है कि रघुराम राजन कोई ऐसा निर्णय नहीं लेंगे, जिससे लगे कि भारत का केन्द्रीय बैंक फ़ेडरल रिज़र्व के फ़ैसलों से संचालित है. वो रुपए को ज़रूर सहारा देना चाहेंगे, लेकिन वो ऐसा भी कोई निर्णय नहीं लेना चाहेंगे जिससे रुपया लगातार मज़बूत होता जाए.

रुपए की तेज़ी या कमज़ोरी हमें किस तरह प्रभावित करती है?

रघुराम राजन की यह पहली मौद्रिक नीति है.

रिज़र्व बैंक के गवर्नर की सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी अपनी मुद्रा का बचाव करना है, लेकिन मान लीजिए कि रुपया मज़बूत होकर 50 रुपए प्रति डॉलर के स्तर पर आ गया. तो इससे हमारा निर्यात महंगा हो जाएगा. विदेशियों के लिए भारत में आना महंगा हो जाएगा. लेकिन रुपया अगर लगातार गिरता चला जाए तो हम जो आयात करते हैं, वो हमारे नियंत्रण से बाहर चला जाएगा. इसलिए दोनों चरम स्थितियों के बीच संतुलत स्थापित करना आरबीआई का सबसे बड़ा धर्म है.

मौद्रिक नीति की घोषणा कब होती है?

यह समय समय पर बदलता गया है क्योंकि पहले इसकी अवधि ज्यादा थी, लेकिन जैसे-जैसे भारत विश्व अर्थव्यवस्था के साथ जुड़ता चला गया है, इसको छह महीने की जगह तीन महीने पर लाने की पहल भी हुई है. और इस बार ही देखिए रघुराम राजन ने इसे एक तारीख़ से आगे बढ़ा दिया और अब यह 20 सितंबर को आ रही है.

इस बारे में कोई ऐसा क़ानून या निर्देश नहीं है कि चाहे कुछ भी हो जाए आपको इस तारीख़ को मौद्रिक नीति की घोषणा करनी ही है. लेकिन आम तौर इसकी घोषणा एक अप्रैल और एक सितंबर को होती है.

आम जनता क्या उम्मीदें कर सकती है?

जिस ब्याज दर पर बैंकों को आरबीआई से पैसा मिलता है, उसी आधार पर बैंक आम लोगों को क़र्ज़ या बैंकों में हमारी जमाओं पर ब्याज देते हैं.

इसलिए सबसे पहले उसे सोशल मीडिया और दूसरे माध्यमों के ज़रिए यह मांग करनी चाहिए कि हमें महंगाई की सही दर के बारे में बताइए. और उसके आधार पर बैंक में जमा धन पर मुझे ब्याज मिलना चाहिए.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप क्लिक करें यहां क्लिक कर सकतें हैं. आप हमें क्लिक करें फ़ेसबुक और क्लिक करें ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

इसे भी पढ़ें

BBC © 2014 बाहरी वेबसाइटों की विषय सामग्री के लिए बीबीसी ज़िम्मेदार नहीं है.

यदि आप अपने वेब ब्राउज़र को अपडेट करते हुए इसे स्टाइल शीट (सीएसएस) के अनुरूप कर लें तो आप इस पेज को ठीक तरह से देख सकेंगे. अपने मौजूदा ब्राउज़र की मदद से यदि आप इस पेज की सामग्री देख भी पा रहे हैं तो भी इस पेज को पूरा नहीं देख सकेंगे. कृपया अपने वेब ब्राउज़र को अपडेट करने या फिर संभव हो तो इसे स्टाइल शीट (सीएसएस) के अनुरुप बनाने पर विचार करें.