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बीबीसी हिंदी गूगल हैंगआउट: इनोवेशन के नए आयाम

 सोमवार, 16 सितंबर, 2013 को 19:22 IST तक के समाचार

अपने घर में बैठकर तो कई बार गूगल के वीडियो चैट के ज़रिए लंदन, हॉलैंड और अमरीका बात कर चुका था लेकिन पत्रकारिता में इस तरह का प्रयोग पहली बार कर रहा था और सच मानिए यह एक सुखद अनुभव रहा.

मौका था बीबीसी हिंदी के गूगल हैंगआउट का जिसमें विषय था 'ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट और इनोवेशन से होने वाले बदलाव'.

ज़ाहिर है कि भारत के कई गांवों में इंटरनेट की पकड़ अब भी कम है लेकिन ये शिकायत भी गलत साबित हुई कि लोग नया काम नहीं कर रहे हैं.

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आईआईएम अहमदाबाद के प्रोफेसर अनिल गुप्ता ने गांवों और छोटे छोटे शहरों मे हो रहे जिन प्रयोगों के बारे में बताया, उन पर किताबें लिखी जा सकती हैं.

दूसरी तरफ 'सीजीनेट स्वर' के तहत मोबाइल के ज़रिए आदिवासियों को ताकत दे रहे शुभ्रांशु की कहानी हम पहले से जानते थे लेकिन उनके विचारों से भी कई बातें स्पष्ट हुईं.

'एयर जल्दी' के धोनडुप नामग्याल ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट पहुंचाने के लिए प्रतिबद्ध दिखे और सबसे बेहतरीन बात ये लगी कि वो एकदम युवा हैं और ग्रामीण क्षेत्रों में काम करने के लिए उनकी तत्परता तारीफ के काबिल है.

साथ ही पूर्णिया से गिरिन्द्र झा और बिहार के ही गांव से रवि रंजन ने भी शामिल होने की पुरज़ोर कोशिशें की.

असल में ये कोशिशें ही कामयाब करती हैं भारत के ग्रामीणों को.

"अनिल ने उस बच्चे की कहानी भी बताई जो अपने गांव में पहाड़ के ऊपर जाकर इंटरनेट कनेक्शन पाता है और हर दिन दस सवाल सुलझा लेता है या फिर बिहार का वो आदमी जिसने प्रेशर कुकर के ज़रिए झाग वाली कॉफी बना ली."

अनिल गुप्ता बताते हैं कि उनके इनोवेशन लैब से हज़ारों लोग जुड़े हुए हैं. जबकि शुभ्रांशु ने बताया कि इंटरनेट को सिर्फ ब्रॉडबैंड तक न सीमित रखकर इसे मोबाइल से जोड़ा जाए तो प्रयोगों और परिणामों की कोई सीमा ही नहीं होगी.

बीबीसी फेसुबक और ट्विटर पर कई श्रोताओं ने अपने सवाल रखे जिनमें से कुछ सवालों के जवाब भी देने की ईमानदार कोशिश हुई.

सोचिए एक प्लेटफॉर्म पर अहमदाबाद, दिल्ली, भोपाल के हैकर ग्राम और पूर्णिया से लोग जुड़ कर आपस में बात कर रहे हैं.

अनिल गुप्ता की ये बात मजेदार लगी कि वो लोगों को दुनिया से ही नहीं बल्कि एक दूसरे से जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं. ज़ाहिर है उन लोगों को अपने सवालों का जवाब मिल गया होगा जो सोशल मीडिया या इंटरनेट को समय की बर्बादी मानते हैं.

अनिल ने उस बच्चे की कहानी भी बताई जो अपने गांव में पहाड़ के ऊपर जाकर इंटरनेट कनेक्शन पाता है और हर दिन दस सवाल सुलझा लेता है या फिर बिहार का वो आदमी जिसने प्रेशर कुकर के ज़रिए झाग वाली कॉफी बना ली.

ये जिजीविषा ही तो ग्रामीण भारत को विकास के रास्ते पर डालती है. धोनम कहते हैं कि लोगों को ये समझ नहीं आता है कि इंटरनेट का कैसे इस्तेमाल करें लेकिन एक बार वो जब इंटरनेट पर आ जाएंगे तब उन्हें पता चलेगा कि ये दुनिया कमाल की है और फिर उन्हें कोई नहीं रोक सकेगा.

शुभ्रांशु हैंगआउट से खराब कनेक्शन की वजह से बाहर हुए फिर आए और ये बता पाए कि भोपाल जैसे शहर में भी कनेक्शन की दिक्कत होती है लेकिन फिर भी वो कोशिश करते रहते हैं.

रवि रंजन जानना चाह रहे थे कि गांवों में थ्री जी क्यों नहीं आता जिसका सटीक जवाब तो किसी के पास नहीं था लेकिन सब मानते थे कि ये सुविधाएं पहुंचनी चाहिए.

भारत सरकार इस दिशा में काम तो कर रही है लेकिन जाहिर है हर सरकारी काम की तरह इसमें देरी हो रही है.

वैसे अनिल गुप्ता ने जिस तरह के इनोवेशन्स की बात बताई, कुछ ऐसी ही बात गिरिन्द्र ने भी कही जो हैंगआउट में अपनी आवाज़ तो नहीं पहुंचा पाए लेकिन बीबीसी हिंदी तक उन्होंने दूसरे माध्यम से अपनी बात बताई.

पिछले एक साल से गांव जाकर बसे गिरिन्द्र ने बताया कि उन्हें पंजाब से उनके दोस्त ने धान के साथ कदंब की खेती करने की सलाह दी और अब वो यही कर रहे हैं जिसमें लाभ होने की उम्मीद है. ये जानकारी उन्हें ईमेल के ज़रिए मिली थी यानी इंटरनेट के ज़रिए उन्होंने खेती से जुड़े फैसले लिए और वो सफल साबित हो रहे हैं.

ज़ाहिर है इंटरनेट की भूमिका का कोई जवाब नहीं है. आने वाले दिनों में हमारे सभी विशेषज्ञों के अनुसार ग्रामीण भारत में एक बड़ी क्रांति इंटरनेट के ज़रिए होनी संभव है. जहां तक बीबीसी हिंदी का सवाल है तो हम अपने श्रोताओं, पाठकों और दर्शकों के लिए ये बदलाव गूगल हैंगआउट, फेसबुक पन्ने, ट्विटर फीड और बीबीसी हिंदी के वेबपन्ने और रेडियो के ज़रिए लाते रहेंगे.

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