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मोदी ने कैसे चढ़ी लोकप्रियता की सीढ़ियां

 शनिवार, 14 सितंबर, 2013 को 17:07 IST तक के समाचार
narendra modi, नरेंद्र मोदी

उम्मीद के मुताबिक़ भारतीय जनता पार्टी ने नरेन्द्र मोदी को बाक़ायदा प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया. गुजरात की राजनीति से लेकर दिल्ली तक का मोदी का ये सफ़र बहुत मुश्किल लेकिन लगातार जारी है.

मोदी ने गुजरात में विधानसभा चुनाव के प्रचार के दौरान ही यह साफ कर दिया था कि अगर वो तीसरी बार भी चुनाव जीत गए तो वो राष्ट्रीय राजनीति में अपनी भूमिका निभाएंगे. उनकी इस घोषणा से खुद उनकी पार्टी बीजेपी में बैचेनी रही है.

मोदी की छवि एक कड़क प्रशासक की रही है. राजनीतिक ताकत उनके हाथों में पूरी तरह केन्द्रित होती है और वो अपनी ताकत में किसी को शामिल नहीं करते हैं. हर कोई उनके अधीन होता है.

मुख्यमंत्री के तौर पर उनके 13 साल के कार्यकाल में गुजरात में बीजेपी के तकरीबन सभी बड़े नेता उनके तौर तरीकों से ख़फ़ा होकर या तो पार्टी से अलग हो गए या फिर मोदी के कद्दावर सियासी साए में उनके अस्तित्व का विलय हो गया.

मोदी को नहीं रोक पाए

आरएसएस और विश्व हिन्दू परिषद जैसे बीजेपी के समर्थक संगठन भी मोदी से नाराज़ रहे क्योंकि मोदी सत्ता में दखल और हिस्सेदारी को तैयार नहीं होते.

इन ताकतवर हिन्दू संगठनों के नेतृत्व और बीजेपी के केन्द्रीय नेतृत्व ने लंबे अरसे से मोदी को दिल्ली आने से रोकने की हर मुमकिन कोशिश की लेकिन उन्हें आखिरकार हार माननी पड़ी.

भारत के राजनीतिक परिदृश्य पर मोदी का आना उनकी किसी विशेष खासियत के कारण नहीं है बल्कि इसकी वजह केन्द्र में कांग्रेस की नीतियों को लेकर जनता की नाराज़गी और एक बेहतर विकल्प के तौर पर खुद को पेश करने में बीजेपी की नाकामी है.

नरेंद्र मोदी

मोदी को बीजेपी की ओर से प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया गया है

काफी समय से एक ही परिवार की सरकारें देखते देखते लोग कांग्रेस से ऊब चुके हैं.

दूसरी तरफ बीजेपी ने पिछले वर्षों में खुद को ऐसी राजनीतिक पार्टी के तौर पर पेश किया है जिसका कोई कार्यक्रम और नीति नहीं है. वो खुद अपने ही भंवर में फंसी हुई पार्टी लगती है.

एक ऐसे वक्त में जब भारत में लोग एक बेहतर राजनीतिक विकल्प के लिए तरस रहे थे, आडवाणी के नेतृत्व में बीजेपी खुद को भविष्य की तरफ ले जाने वाली पार्टी के तौर पर पेश नहीं कर सकी. बीजेपी अतीत में फंसी हुई एक भ्रमित और दिशाहीन पार्टी दिखती है.

उम्मीद की किरण

ये वो हालात थे जिनमें देश की नज़रें मोदी की तरफ केन्द्रित हुई. वे भविष्य की बातें करते हैं. उनके भाषणों में नई पीढ़ी की बैचेनी और उमंगों की झलक मिलती है.

वर्षों की भ्रष्ट और रिश्वतखोर व्यवस्था के सताए हुए उद्योगपतियों को भी मोदी में उम्मीद की किरण नजर आती है. सालों की बदहाली से मायूस जनता फिलहाल मोदी के विवादास्पद अतीत को भी नजरअंदाज़ करने के लिए तैयार नजर आती है.

मोदी का उत्थान देश की दोनों बड़ी राजनीतिक पार्टियों की नाकामी को दर्शाती है.

भारत की राष्ट्रीय राजनीति की दिशा अब पार्टियां नहीं बल्कि कुछ राजनेता तय करेंगे. मोदी बेशक इन्हीं राजनेताओं में से एक हैं.

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