क्या नाराज़ है अखिलेश सरकार से उनका वोटर?

  • 12 सितंबर 2013
मुजफ्फरनगर में सांप्रदायिक दंगा

उत्तर प्रदेश के मुज़फ्फरनगर जिले में हिंदू-मुस्लिम दंगों से राज्य के अन्य इलाक़ों में भी तनाव पैदा हो गया था.

अंग्रेजी अख़बार 'हिंदुस्तान टाइम्स' के लखनऊ संस्करण की संपादक सुनीता एरोन कहती हैं, "पूरा राज्य बारूद के ढेर पर बैठा हुआ है."

मुख्यमंत्री अखिलेश यादव पर हिंसा और तनाव को रोकने में नाकाम रहने का आरोप लगाया जा रहा है.

कुछ लोग उनकी सरकार को बर्खास्त करने की मांग कर रहे हैं. लेकिन सुनीता एरोन कहती हैं कि फ़िलहाल सरकार को कोई खतरा नहीं है.

पूर्ण बहुमत

सुनीता कहती हैं, "मुझे नहीं लगता उनकी सरकार को कोई खतरा है. ऐसे समय जब चुनाव नज़दीक है, कांग्रेस ऐसा कोई क़दम नहीं उठाएगी."

शीतला सिंह फैजाबाद से प्रकाशित होने वाले अख़बार 'जनमोर्चा' के संपादक हैं, वो भी सरकार पर किसी तरह के ख़तरे से इनकार करते हैं.

उन्होंने कहा ,"सरकार पूर्ण बहुमत में है और दंगे पर नियंत्रण हो गया है. इसके बाद कोई कार्रवाई होगी, ऐसा कभी देखने में नहीं आया."

हांलाकि सुनीता एरोन का कहना है, "आजकल हो रहे दंगों का कारण आने वाले चुनाव हैं, जब भी चुनाव करीब आता है इस तरह की घटनाएं बढ़ जाती हैं. साल 2009 में भी ऐसा हुआ था."

वैसे आम धारणा यह भी लग रही है कि मुज़फ्फरनगर में हुए दंगों को रोका जा सकता था.

जानकारों के अनुसार अखिलेश यादव के समर्थकों में परंपरागत रूप से उनका समर्थक रहा मुसलमान समुदाय भी शामिल है.

शीतला सिंह कहते हैं, ''उनकी नाराज़गी समझ में आती है, सरकार से उनको बड़ी अपेक्षाएं थीं, वो पूरी नहीं हुईं. मुसलमानों की नाराज़गी नाजायज़ नहीं लगती है.''

विश्लेषकों के मुताबिक़ मुसलमानों के अलावा दूसरे लोग भी राज्य सरकार से मायूस हैं. उत्तर प्रदेश के सबसे कम उम्र के मुख्यमंत्री बने अखिलेश यादव ने पिछले साल मार्च में पदभार संभाला था. उस समय उनकी उम्र 39 साल थी.

पूरे नहीं हुए वादे

पद संभालने के बाद राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के बेटे अखिलेश यादव ने लोगों से कई वादे किए थे. लोगों को उनसे काफी उम्मीदें थीं. लेकिन विश्लेषकों के मुताबिक़ वो वादे पूरे करने में अब तक विफल रहे हैं.

सरकारी लैपटॉप
विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने कई वादे किए थे

शीतला सिंह कहते हैं, "सियासी पार्टियां वादे तो करती हैं. लेकिन वो अक्सर उन्हें पूरा नहीं करतीं हैं. ऐसा ही अखिलेश यादव ने भी किया".

अखिलेश यादव के समर्थक यह स्वीकार करते हैं कि क़ानून-व्यवस्था ख़राब ज़रूर हुई है लेकिन बाक़ी क्षेत्रों में हालात इतने बुरे नहीं हैं.

तो कया अगले साल होने वाले आम चुनाव में समाजवादी पार्टी को इसका खमियाजा भुगतना पड़ सकता है?

विश्लेषक कहते हैं कि यह सवाल इस समय उचित नहीं है, क्योंकि आम चुनाव अगले साल मई में होने हैं.

लेकिन क्या समाजवादी पार्टी से नाराज़ मुसलमान चुनाव में पार्टी का साथ छोड़ देंगे, इस सवाल पर सुनीता एरोन कहती हैं, "मुस्लिम एक पार्टी में नहीं जाएंगे. अगर नरेंद्र मोदी भाजपा के प्रधानमंत्री पद के दावेदार चुन लिए गए, तो वो हर हाल में अलग-अलग चुनाव क्षेत्र में ऐसे उमीदवार को वोट देंगे जो भाजपा के उमीदवार को हरा दे."

शीतला सिंह कहते हैं, "हर पार्टी अभी से ही आज की स्थिति से फायदा उठाने की कोशिश करेगी. इसका परिणाम क्या होगा यह देखने के लिए हमें इंतजार करना होगा. अभी से कुछ नहीं कहा जा सकता".

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