केदारघाटी में 68 और नरकंकाल मिले

  • 7 सितंबर 2013
केदारनाथ

केदारघाटी में जिस तरह आपदा के तीन महीने बाद भी नरकंकालों के मिलने का सिलसिला जारी है उससे उस प्रलयंकारी बाढ़ की विभीषिका का और भी क्रूर और दिल दहलानेवाला पक्ष सामने आ रहा है.

शुक्रवार को पुलिस ने 68 और शवों का दाह संस्कार किया. ये नरकंकाल पिछले दो दिनों में गरूडचट्टी से गौरीकुण्ड के बीच पहाड़ की चोटियों के आसपास से मिले थे. उत्तराखण्ड पुलिस के पर्वतारोही, कमांडो व नागरिक पुलिस के कर्मियों के इस संयुक्त अभियान में केदारघाटी की सबसे ऊँची पहाडियों पर शवों की तलाशी की जा रही है जो लगभग 12500-13000 फ़ीट की ऊचाई पर है. पुलिस के अनुसार सभी शवों के पंचनामे भरे गए व डीएनए सैम्पल भी सुरक्षित रखे गए हैं.

इसके पहले चार तारीख़ को भी वहां क़रीब 64 शवों का दाह संस्कार किया गया था.

पुलिस महानिरीक्षक राम सिंह मीणा ने बताया, “अब मौसम खुलने के बाद जंगलचट्टी, रामबाड़ा, गौरीगांव और भीमबली इलाक़ों की ऊंचाई वाली जगहों और दुर्गम स्थानों में तलाशी अभियान चलाया जा रहा है जहां पहले नहीं जा पाए थे. यहां बड़ी तादाद में कंकाल मिल रहे हैं.”

केदार घाटी

अब जिन स्थानों से शव और कंकाल मिल रहे हैं वहां प्रकट तौर पर आपदा से कोई नुक़सान नहीं हुआ है तो सवाल उठता है कि फिर ये कंकाल कैसे हैं? हो सकता है कि बाढ़ और घनघोर बारिश से घबराकर लोग बचने के लिए सुरक्षित ठिकानों की तलाश में और ऊंचे इलाक़ों में भागे होंगे .

इस बात की कल्पना की जा सकती है कि चीख़-पुकार और दहशत का क्या मंज़र रहा होगा और किस हाल में बच्चे-बूढ़े और महिलाएं भी पहाड़ियों पर भागी होंगी. बाढ़ की चपेट में आने से तो वो बच गए होंगे लेकिन राहत के अभाव में उनकी जान चली गई होगी.

मूसलाधार बारिश और कड़ाके की ठंड में खुले आसमान के नीचे, जंगली जानवरों के ख़ौफ़ के साए में भूख-प्यास से व्याकुल लोगों ने आख़िरी पलों तक किस तरह जीने के लिए संघर्ष किया होगा और तड़प-तड़प कर कर दम तोड़ा होगा.

ग़ौरतलब है कि आपदा 16 और 17 जून को आई थी और शुरूआत में सरकार ने इसे बहुत हलके ढंग से लिया था. मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा तीन दिनों तक दिल्ली में ही डेरा डाले रहे थे.

जब स्थानीय सूत्रों से आपदा की विभीषिका का पता चला तब सरकार जागी और 21 जून से सेना और एनडीआरएफ़ ने सघन राहत और बचाव अभियान चलाया. केंद्रीय गृहमंत्री सुशील शिंदे भी इस बात को स्वीकार कर चुके हैं कि राहत और बचाव में देरी हुई.

उसी समय से आशंका ज़ाहिर की जा रही थी कि जितनी मौतें जल प्रलय की सीधी चपेट में आने से हुई होंगी उससे कहीं ज्यादा राहत के अभाव में और भूख प्यास से हुई होगी. आरोप भी लगे थे कि अगर तत्काल ही उसी मुस्तैदी से राहत और बचाव शुरू कर दिया जाता तो शायद इतने लोग मारे ही नहीं जाते. आज मिल रहे नरकंकालों से इन आरोपों की एक तरह से पुष्टि हो रही है.

केदारनाथ

इस बीच केदारनाथ मंदिर में 11 तारीख़ को पूजा शुरू करने के लिए सरकार ने एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा रखा है. सरकार का दावा है कि मंदिर परिसर की सफ़ाई हो चुकी है और वहां बुनियादी सुविधाएं बहाल कर दी गई हैं.

लेकिन पूजा को लेकर सरकार जैसी हड़बड़ी दिखा रही है उसपर उंगलिया उठाई जा रही हैं. पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निंशंक कहते हैं, “लोगों का ध्यान बांटने के लिए सरकार पूजा-पूजा कर रही है.पूजा शुरू करना कौन सी बहादुरी का काम है. अगल-बगल दबे हज़ारों शवों को तो आप नहीं निकाल पा रहे हैं, लोगों तक राहत तो पहुँचा नहीं पा रहे हैं. ये पूरी तरह हास्यास्पद है और सरकार की संवेदनहीनता का प्रमाण है.”

पुलिस के अनुसार शवों की तलाशी का अभियान सम्भवतः दो दिन और चलाया जाएगा और गोमकारा नामक जगह में इसके लिए नया बेस कैंप बनाया गया है.

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