BBC navigation

भूमि अधिग्रहण विधेयक लोकसभा में पेश

 गुरुवार, 29 अगस्त, 2013 को 17:11 IST तक के समाचार
भूमि अधिग्रहण

भूमि अधिग्रहण विधेयक 1894 में बूने क़ानून की जगह लेगा

भूमि अधिग्रहण विधेयक गुरुवार को लोकसभा में पेश कर दिया गया. यह विधेयक क़ानून बनने के बाद 1894 में बने भूमि अधिग्रहण कानून की जगह लेगा.

ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश भूमि अधिग्रहण विधेयक पेश किया.

सरकार का दावा है कि इस विधेयक में औद्योगिक परियोजनाओं के लिए अधिग्रहीत की जाने वाली ज़मीन के बदले निष्पक्ष मुआवज़े का प्रावधान किया गया है.

विधेयक में ग्रामीण इलाकों में अधिगृहित की जाने वाली ज़मीन के लिए बाज़ार मूल्य से चार गुना अधिक मुआवज़े का प्रावधान है. शहरी क्षेत्र में यह बाज़ार मूल्य से दो गुना अधिक होगा.

साथ ही विधेयक में अधिग्रहण से प्रभावित लोगों को विकास की मुख्यधारा से जोड़ने की बात कही गई है ताकि क्लिक करें जमीन अधिग्रहण के बाद किसानों की सामाजिक और आर्थिक दशा सुधारने में उनकी सहायता की जा सके.

क्लिक करें क्या हैं भूमि अधिग्रहण विधेयक के प्रावधान?

मुआवज़ा

इसे 'उचित मुआवज़ा और क्लिक करें भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन में पारदर्शिता का अधिकार विधेयक, 2012' नाम दिया गया है.

"हमारा मानना है कि ज़मीन के बदले पैसा नहीं बल्कि ज़मीन दी जानी चाहिए. लेकिन इस विधेयक में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है"

रमेश शर्मा, एकता परिषद

इस विधेयक को दो सर्वदलीय बैठकों के बाद पेश किया गया.

सरकार ने क्लिक करें भाजपा की वरिष्ठ नेता सुषमा स्वराज तथा वामदलों द्वारा सुझाए गए पांच प्रमुख सुझावों को विधेयक में स्वीकार किया है.

विधेयक में कहा गया है कि निजी परियोजनाओं के लिए भूमि के अधिग्रहण में 80 फीसदी ज़मीन मालिकों की सहमति ज़रूरी है.

सहमति

निजी-सरकारी भागीदारी परियोजनाओं के लिए 70 प्रतिशत ज़मीन पर मालिकों की सहमति ज़रूरी होगी.

लेकिन भूमि अधिकारों के लिए काम करने वाली संस्था एकता परिषद के अभियान संयोजक रमेश शर्मा का कहना है कि इस विधेयक में अब भी कई ख़ामियां हैं.

उन्होंने बीबीसी से कहा कि भूमि अधिग्रहण क़ानून 1894 का इस्तेमाल आज तक सिर्फ़ औद्योगिक अधिग्रहण के लिए किया गया है. इसका लाभ कभी भी ग़रीबों के लिए नहीं हुआ है. यानी जब भी भूमि अधिग्रहित की गई वो अमीरों और उद्योगपतियों को लाभ पहुंचाने के लिए की गई.

रमेश शर्मा ने कहा, "हमारी हमेशा से यह मांग रही है कि कम से कम एक बार तो इसका इस्तेमाल गरीबों के हित में भूमि अधिग्रहण करने के लिए किया जाए. दुर्भाग्य से इस क़ानून के 118 वर्षों के इतिहास में कभी भी इसका इस्तेमाल नहीं किया गया."

रमेश ने कहा, "हमारा मानना है कि ज़मीन के बदले पैसा नहीं बल्कि ज़मीन ही दी जानी चाहिए. लेकिन इस विधेयक में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है."

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए क्लिक करें यहां क्लिक करें. आप हमें क्लिक करें फ़ेसबुक और क्लिक करें ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)

इसे भी पढ़ें

BBC © 2014 बाहरी वेबसाइटों की विषय सामग्री के लिए बीबीसी ज़िम्मेदार नहीं है.

यदि आप अपने वेब ब्राउज़र को अपडेट करते हुए इसे स्टाइल शीट (सीएसएस) के अनुरूप कर लें तो आप इस पेज को ठीक तरह से देख सकेंगे. अपने मौजूदा ब्राउज़र की मदद से यदि आप इस पेज की सामग्री देख भी पा रहे हैं तो भी इस पेज को पूरा नहीं देख सकेंगे. कृपया अपने वेब ब्राउज़र को अपडेट करने या फिर संभव हो तो इसे स्टाइल शीट (सीएसएस) के अनुरुप बनाने पर विचार करें.