भूमि अधिग्रहण बिलः क्यों प्रदर्शन कर रहे हैं किसान?

  • 29 अगस्त 2013
भूमि अधिग्रहण बिल का विरोध

भूमि अधिग्रहण विधेयक गुरुवार को लोकसभा में पेश हो गया. इस विधेयक को किसान हितैषी बताया जा रहा है लेकिन हरियाणा के मेवात ज़िले के किसान इस बिल के ख़िलाफ़ प्रदर्शन कर रहे हैं.

नेशनल अलायंस ऑफ पीपल्ज़ मूवमेंट और संयुक्त किसान संघर्ष मोर्चा ने गुरुवार को दिल्ली के जंतर-मंतर पर बिल के विरोध में प्रदर्शन किया.

इस विरोध प्रदर्शन में जनता दल यूनाइटेड के राज्यसभा सांसद अली अनवर भी शामिल हुए.

बीबीसी से बातचीत में अली अनवर ने कहा, "प्रदर्शनकारियों की मुख्य माँग यह है कि बिल के प्रावधानों को 2012 से लागू करने के बजाए 2007 से लागू किया जाना चाहिए ताकि जिन लोगों की ज़मीनें बेहद सस्ती दरों पर अधिग्रहित की गई हैं उन्हें भी अपनी ज़मीन की जायज़ क़ीमत मिल सके. "

क्या है भूमि अधिग्रहण विधेयक?

संयुक्त किसान संघर्ष मोर्चा के संयोजक रमज़ान ने कहा, "हम नए बिल के समर्थक हैं लेकिन बिल के कुछ प्रावधान किसानों से ज़्यादा कॉर्पोरेट का समर्थन करते हैं. हमारा विरोध यह है कि जब नई प्रक्रिया बन ही रही है तो उसके तहत ख़ेती की ज़मीन को अधिग्रहण से बाहर क्यों नहीं किया जा रहा है."

वे कहते हैं, 'स्टैंडिंग कमेटी का सुझाव था कि कम से कम 90 प्रतिशत किसानों की सहमति के बाद ही अधिग्रहण किया जाए लेकिन इसे नज़रअंदाज़ कर दिया गया. फसली ज़मीन का अधिग्रहण किसी भी सूरत में न किए जाने का भी सुझाव था लेकिन यह भी नज़रअंदाज़ कर दिया गया."

खाद्य सुरक्षा बिल: कहीं खुशी तो कहीं ग़म

'चुनावी हथकंडा'

कर्नल शेहरावत
आम आदमी पार्टी के कर्नल डी सेहरावत बिल को चुनावी हथकंडा मानते हैं.

आम आदमी पार्टी के नेता कर्नल डी सेहरावत इस बिल को सत्ताधारी दलों का चुनावी हथकंडा मान रहे हैं.

ज़मीन विरोध का कारण बताते हुए उन्होंने कहा, "कॉर्पोरेट के साथ सौदा करते वक्त नियामक प्राधिकरण बनाया जाता है लेकिन किसानों के मामले में ऐसा कोई आयोग या प्राधिकरण नहीं बनाया जा रहा है जो स्वतंत्र रूप से इस बात का जायज़ा ले सके कि किसान की ज़मीन की वास्तविक क़ीमत क्या है और उसे कितनी क़ीमत मिलनी चाहिए."

जंतर-मंतर पर हुए विरोध प्रदर्शन में हरियाणा के मेवात ज़िले से आए किसान भी शामिल थे. इनमें ज़्यादातर किसान ऐसे हैं जिनकी सारी ज़मीन अधिग्रहित की जा चुकी है.

'हड़पी गई ज़मीन'

शमशुद्दीन
शम्सुद्दीन का कहना है कि उनकी सारी ज़मीन सस्ती दरों पर अधिग्रहित कर ली गई.

45 साल के शम्सुद्दीन की तीन एकड़ ज़मीन अधिग्रहित की गई थी जिसके एवज़ में उन्हें 16 लाख रुपये प्रति एकड़ की दर से मुआवज़ा दिया गया था.

रोज़गाह मेव गाँव के रहने वाले शम्सुद्दीन की सारी ज़मीन जा चुकी है और अब उनके पास बस रहने का घर ही बचा है.

अनपढ़ शम्सुद्दीन यह भी नहीं बता पाते कि उन्हें कितना मुआवज़ा मिला है लेकिन वे यह ज़रूर कहते हैं कि मुआवज़ा बाज़ार दर से कम था.

शम्सुद्दीन कहते हैं, "हमारी ज़मीन सारी सरकार ने हड़प ली. हमारे लिए तो कुछ भी नहीं बचा है. स्कूल और कब्रिस्तान भी नहीं छोड़ा गया. गाँव के लोग अब गाँव छोड़कर जाने के लिए मजबूर हैं."

जिस इलाक़े में उनकी ज़मीन है वहां अभी बाज़ार भाव सवा से पौने दो करोड़ रुपये प्रति एकड़ के बीच है. शम्सुद्दीन चाहते हैं कि नए बिल के प्रावधान उनकी अधिग्रहित की गई ज़मीन पर भी लागू होने चाहिए.

'बच्चों का क्या होगा?'

आज़ाद
आज़ाद ख़ान जैसे ज़्यादातर किसानों की सबसे बड़ी चिंता बच्चों का भविष्य है.

हरियाणा के मेवात ज़िले के खेड़ी कांकड़ गाँव के रहने वाले आज़ाद ख़ान के परिवार की कुल 40 एकड़ ज़मीन 16 लाख रुपये प्रति एकड़ के हिसाब से अधिग्रहित की गई है.

आज़ाद ख़ान का कहना है कि उनके ख़ेत की वास्तविक क़ीमत क़रीब दो करोड़ रुपये प्रति एकड़ थी.

आज़ाद ख़ान कहते हैं, 'हमारी ज़मीन का पैसा हमें साल 2010 में मिला. हम इस पैसे से शहर में एक प्लॉट तो खरीद सकते हैं लेकिन कुछ और नहीं कर सकते. हमारे पास पैसा नहीं रहेगा तो हम क्या करेंगे? कल जब हमारे बच्चों के पास कुछ नहीं होगा और वे अपराध में लिप्त हो जाएंगे तो सरकार उन्हें क्रिमिनल कहेगी.'

आज़ाद ख़ान को डर है कि जिन नौ गाँव के लोगों की ज़मीन अधिग्रहित की गई है वे जल्द ही सड़क पर आने की कगार पर होंगे.

ज़ाहिदा
ज़ाहिदा को यह तो पता है कि उनकी कितनी ज़मीन अधिग्रहित हुई लेकिन ये नहीं पता कि पैसा कितना मिला.

मेवात से आए किसानों में 40 साल की ज़ाहिदा भी हैं जिनके परिवार की 15 एकड़ ज़मीन सरकार ने 16 लाख की दर से अधिग्रहित की.

अनपढ़ ज़ाहिदा को नहीं मालूम कि उन्हें कुल कितना पैसा मिला. वे इतना ही कहती हैं कि सरकार ने किसानों के साथ अन्याय किया है.

ज़ाहिदा जैसी ही और भी महिलाएं कम मुआवज़ा दिया जाने को लेकर प्रदर्शन कर रही हैं. इस बीच संसद में जन प्रतिनिधि बिल पर चर्चा कर रहे हैं.

क्या इन महिलाओं की माँगें जंतर-मंतर से कुछ ही दूर संसद तक पहुंच पाएंगी?

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार