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कश्मीर में ज़ुबिन मेहता के शो को लेकर विवाद

 गुरुवार, 29 अगस्त, 2013 को 14:55 IST तक के समाचार

विश्व प्रसिद्ध संगीतकार ज़ुबिन मेहता के प्रस्तावित शो को लेकर भारत प्रशासित कश्मीर में विवाद शुरू हो गया है.

अलगाववादियों, स्थानीय कलाकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भारत प्रशासित कश्मीर में होने वाले ज़ुबिन मेहता के संगीत कार्यक्रम को लेकर विरोध जताया है.

विभिन्न समूहों और राजनेताओं ने इस कार्यक्रम के मुख्य प्रायोजक जर्मन दूतावास को पत्र लिखकर अपना विरोध दर्ज कराया है.

जर्मन दूतावास को पत्र

शीर्ष अलगाववादी नेता सैयद अली शाह गिलानी ने ऐसे ही एक पत्र में लिखा है, ''हमें किसी भी कलाकार से कोई व्यक्तिगत समस्या नहीं है. असल में भारत सरकार कश्मीर को एक शांत राज्य के तौर पर दिखाना चाहती है जबकि भारतीय सुरक्षा बल यहां हिंसा कर रहे हैं. तथ्य ये है कि दस लाख सशस्त्र सुरक्षा बलों ने इस इलाक़े को बलपूर्वक क़ब्ज़े में कर रखा है.''

अलगाववादी संगठन हुर्रियत कांफ्रेंस (गिलानी गुट) के प्रमुख गिलानी ने साल 2004 में यूरोपीय संघ के प्रतिनिधिमंडल की उस टिप्पणी का भी हवाला दिया है जिसमें प्रतिनिधिमंडल ने कश्मीर को 'सुंदर जेल' बताया था.

हुर्रियत कॉन्फ्रेंस (गिलानी गुट) ने भारतीय मीडिया पर पक्षपातपूर्ण रिपोर्टिंग का आरोप लगाया है.

उनके प्रवक्ता अयाज़ अकबर ने बीबीसी से कहा,'' कश्मीर पर वैश्विक राय पर भारतीय मीडिया आँख में धूल झोंकने की कोशिश करता है. हम जर्मन राजदूत या जर्मनी का विरोध नहीं कर रहे हैं. इस कार्यक्रम को लेकर हमारा कुछ एतराज़ है जिससे हमने राजदूत को अवगत करा दिया है.''

अकबर ने कहा,''संगीत कार्यक्रम प्रसन्नता का प्रदर्शन है. लेकिन पूरा कश्मीर अब भी दो जगहों पर छह आम नागरिकों के मारे जाने का शोक मना रहा है. हम अब भी इस साल फरवरी में दिल्ली में गुपचुप रूप से फांसी पर लटका दिए गए अफजल गुरु के शव को पाने का इंतज़ार कर रहे हैं. बेहतर होगा कि जर्मनी भारत सरकार को मानवाधिकार और न्याय के मुद्दों का समाधान करने के लिए कहे. हम उन्हें बताना चाहते हैं कि हम खुद अच्छा गा सकते हैं, हमें अंतरराष्ट्रीय समुदाय से नैतिक समर्थन की ज़रूरत है.''

एक अन्य अलगाववादी नेता मीरवाइज़ उमर फ़ारूक़ ने इस आयोजन को "जनता के पैसे की बर्बादी ' करार दिया है.

मीरवाइज़ ने कहा, ''जब लोगों का कामकाज सबसे बुरे दौर से गुज़र रहा हो उस समय इस तरह का आयोजन सीधे तौर से पैसे की बर्बादी है. अगर वे पैसा ही ख़र्च करना चाहते हैं तो वे हमारी स्वास्थ्य और शिक्षा ज़रूरतों को प्रायोजित कर कश्मीर-जर्मन मैत्री कार्यक्रम की शुरुआत कर सकते थे.''

पत्रकारों, शिक्षाविदों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और कलाकारों वाली सिविल सोसाइटी के एक समूह ने जर्मन दूतावास को एक विस्तृत ज्ञापन लिखा है.

सिविल सोसायटी का मत

प्रमुख कलाकारों, शिक्षाविदों और सार्वजनिक बुद्धिजीवियों के दस्तखत वाले इस पत्र में कहा गया है कि "संगीत प्रेम, न्याय, गरिमा, और शांति के उच्च सत्य को ज़ाहिर करता है, हम लंबे समय से पीड़ित, और अब तक बहादुरी से लड़ रहे कश्मीरियों और आम जनता के लिए पेश किए जाने वाले संगीत कार्यक्रम का तहेदिल से स्वागत करते हैं. लेकिन व्यावसायिक हित को साधने वाला कोई भी म्यूजिक कंसर्ट पूरी तरह से अस्वीकार्य है.''

"यह एक विशुद्ध सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं है. जुबिन मेहता उच्च दर्जे के कलाकार हैं, लेकिन उनकी शैली यहाँ बहुत से लोग नहीं समझते हैं. इस शो के पीछे ज़रूर कुछ राजनीतिक हित साधने की कोशिश की जा रही है, इसीलिए लोग इस शो से गुरेज़ कर रहे हैं. हमारे पास सैकड़ों स्थानीय कलाकार हैं, जो गाते हैं, अभिनय करते हैं लेकिन इस तरह का विवाद कभी पैदा नहीं होता."

मुश्ताक अली, प्रसिद्ध फिल्म निर्माता और सांस्कृतिक कार्यकर्ता

प्रसिद्ध फ़िल्म निर्माता और सांस्कृतिक कार्यकर्ता मुश्ताक अली अहमद ने प्रस्तावित संगीत कार्यक्रम के बारे में संदेह जताते हुए बीबीसी को बताया कि ''यह एक विशुद्ध सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं है. ज़ुबिन मेहता उच्च दर्जे के कलाकार हैं, लेकिन उनकी शैली यहाँ बहुत से लोग नहीं समझते हैं. इस शो के पीछे ज़रूर कुछ राजनीतिक हित साधने की कोशिश की जा रही है, इसीलिए लोग इस शो से गुरेज़ कर रहे हैं. हमारे पास सैकड़ों स्थानीय कलाकार हैं, जो गाते हैं, अभिनय करते हैं लेकिन इस तरह का विवाद कभी पैदा नहीं होता.''

प्रमुख विश्लेषक प्रोफ़ेसर शेख शौकत इस तरह की घटनाओं के बारे में कहते हैं कि ''ऐसे कार्यक्रम तब अपना महत्व खो देते हैं जब वे संदेह के दायरे में आ जाते हैं.''

शौकत बताते हैं कि ''1983 में भारत और वेस्टइंडीज़ के बीच खेला गया एक दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय मैच प्रतिद्वंद्वी राजनीतिक दावों का केंद्र बन गया था ठीक उसी तरह ज़ुबिन के शो ने अपने सांस्कृतिक मूल्य खो दिए हैं और अब यह विभिन्न विचारधाराओं के लिए हार-जीत का प्रश्न बन गया है.''

अतीत

अतीत में भी विभिन्न कार्यक्रमों ने कश्मीर में विवाद खड़ा किया है.

पाकिस्तान के कश्मीरी चरमपंथी नेता सैयद सलाहुद्दीन ने साल 2008 में पाकिस्तानी सरकार से कहा था कि वो पाकिस्तानी संगीत बैंड जुनून को भारत प्रशासित कश्मीर में शो करने की अनुमति नहीं दे.

बैंड कश्मीर आया लेकिन जहां उन्होंने शो किया उस जगह को जनता के लिए बंद कर दिया गया था. शो के कुछ दिन बाद ही कश्मीर में प्रदर्शनों की शुरुआत हो गई थी जिसमें अब तक लगभग 200 लोगों की जान जा चुकी है.

लड़कियों के एक बैंड को उस वक्त बंद होना पड़ा था जब कुछ युवाओं ने फेसबुक पर धमकियां दी थी. इस बैंड को एक संगीत प्रतियोगिता के दौरान शुरू किया गया था जिसे भारत के अर्धसैनिक बल सीआरपीएफ ने प्रायोजित किया था.

विश्लेषकों का मानना है कि भारत प्रशासित कश्मीर में कला की अभिव्यक्ति लंबे समय से राज्य सरकार के एकाधिकार में रही है.

एक स्थानीय स्तंभकार जावेद नक़ीब का कहना है कि "कश्मीर में एकमात्र सांस्कृतिक अकादमी मुख्यमंत्री के नेतृत्व में है. ऐसी परिस्थितियों में कोई भी व्यक्ति कला के स्वतंत्र विकास की उम्मीद नहीं कर सकता. यही कारण है कि सरकारी हस्तक्षेप वाले किसी भी सांस्कृतिक कार्यक्रम से लोग पहले ही दूरी बना लेते हैं.''

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