अंतिम संस्कार का ‘अनोखा’ विभाजन

  • 22 अगस्त 2013
खण्डेलवाल समाज का श्मशान स्थल

भारतीय समाज अनेक जाति-धर्मों में तो बंटा रहा है. लेकिन यह बंटवारा श्मशान घाट में भी दिखाई देता है.

राजस्थान में विभिन्न जातियों के लिए अलग-अलग श्मशान की परंपरा ‘रियासत काल’ की विरासत है.

राजस्थान में रियासत के दौर में अलग-अलग जातियों के शमशान घाट का चलन शुरू हुआ. यह आज भी जारी है.

जैसलमेर जैसे छोटे से शहर में लगभग 47 श्मशान घाट है जबकि जयपुर में इनकी तादाद 57 है.

हर जाति का अपना अंतिम दाह-संस्कार स्थल हैं और उपजातियों ने भी अपने मोक्ष धाम बना लिए है.

अपने-अपने श्मशान घाट

लेकिन एक दलित के लिए ज़िंदगी का आख़िरी सफ़र भी सुखद नहीं होता, क्योंकि ग्रामीण क्षेत्रों में उन्हें अंतिम क्रिया के लिए जगहतलाशने के लिए ख़ासी मशक्कत करनी पड़ती है.

भारत के सामाजिक ढांचे में इंसानियत का यह विभाजन जन्म के साथ शुरू होता है और मौत के बाद भी श्मशान घाट तक इंसान का पीछा करता है.

राजस्थान के श्मशान धर्म, जाति और फिर उपजाति में बंटे समाज की गवाही देते है. राज्य के सीमावर्ती जैसलमेर में नगर विकास संस्थान ने इन 47 दाह स्थलों के रख रखाव के लिए पाँच करोड़ रूपए मंजूर किए हैं.

गुजराती समाज
राजस्थान में रहने वाले गुजराती समाज के लोगों का अंतिम संस्कार

इनमें से ज़्यादातर श्मशान स्थल हिंदू समाज के हैं. इनमें विभिन्न जातियों और उपजातियों के दाह संस्कार स्थल भी शामिल हैं. मुस्लिम समाज में भी अलग-अलग जातियों के अपने अपने अंतिम संस्कार स्थल है.

जैसलमेर नगर विकास संस्थान के उम्मीद सिंह कहते हैं, “ये श्मशान स्थल रियासत काल में बने है और संस्थान ने इंसान की अंतिम यात्रा को सुखद बनाने के लिए पाँच करोड़ की राशि मंजूर की है."

विभाजन की कहानी कहते बोर्ड

जयपुर में एक बड़े श्मशान घाट पर दाह संस्कार में मदद कर गुज़र बसर करने वाले खेम चंद कहते है, “यहाँ हर जाति का अपना शमशान घाट हैं."

इनमें अग्रवाल, खंडेलवाल, ब्राह्मण, पुरोहित, जांगिड, राजपुर, माली, और दलित जातियों में धानका, नायक, वाल्मीकि सभी के श्मशान अलग-अलग है. सभी जयपुर के बसावट के समय से बने हैं.

जैसलमेर में इतिहासकार नन्द किशोर शर्मा कहते हैं कि यह शहर आठ सौ साल पुराना है तो शमशान भी सैकड़ों साल पुराने हैं. जयपुर में चांदपोल का शमशान घाट सबसे बड़ा है.

यहां के पंडित कैलाश कहते हैं, “अलग-अलग समाज और अलग जाति के शमशान हैं क्योंकि सबके रीति रिवाज थोड़े भिन्न हैं."

जब लोग गया श्राद्ध करने के लिए जाते है तो अपने-अपने श्मशान की परिक्रमा देकर जाते है. सबके श्मशान स्थल एक ही जगह पर होने से अंतिम संस्कार की परंपरा को निभाने में दिक्कत हो सकती है.

जलती चिता , उठता धुंआ, सन्नाटा और फ़िज़ा में दुःख और विषाद जयपुर में नौ बीघा में फैले श्मशान घाट में हर जाति और उपजाति की इबारत लिखे बोर्ड अंतिम यात्रा में भारतीय समाज के बंटवारे की कहानी कहते नज़र आते है.

हर जाति के अपने-अपने शमशान हैं. लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में दलित को मरने के बाद ये हक़ नसीब नहीं होता है.

इंसान बराबर तो भेदभाव क्यों

दलित अधिकार कार्यकर्ता पीएल मीमरोट कहते हैं, ''ग्रामीण राजस्थान में ज़्यादा दिक्कत होती है, उन्हें दाह संस्कार के लिए लकड़ी और जगह दोनों के लिए लोगों से मिन्नतें करनी पड़ती है."

जाट समाज
राजस्थान के जाट समाज के लोगों का श्मशान स्थल

जब सब इंसान बराबर है तो फिर आखिरी सफ़र में ये भेदभाव क्यों?

दलित कार्यकर्ता भंवर मेघवंशी बताते हैं कि दलितों में भी उन जातियों को ज़्यादा चुनौती का सामना करना पड़ता है जिनमे मृत देह को जमीन में गाड़ने की परंपरा है.

ख़ासकर कालबेलिया और रंग स्वामी जैसी जातियों में किसी की मौत होते ही जगह की मुश्किल आन खड़ी होती है.

समाज विज्ञानी प्रोफ़ेसर राजीव गुप्ता कहते हैं कि भारत में जाति व्यक्ति की हैसियत और हस्ती का बख़ान करती है और यह हमें शमशान में भी दिखाई देता है.

अच्छा होता अगर एक श्मशान होता

कायस्थ समाज का श्मशान स्थल
कायस्थ समाज का अपना अलग श्मशान स्थल है

वे कहते हैं कि अफ़सोस है कि राजशाही ख़त्म होने के बाद भी यह परंपरा जारी है.

वे आगे कहते हैं, “जाति आज भी शक्तिशाली और शक्तिविहीन होने का एक मापदंड बनी हुई है."

अंतिम संस्कार में कहीं हम चंदन की लकड़ी इस्तेमाल करते हैं तो कहीं साधारण लकड़ी.

हर जाति के पुरोहितों ने अपना वर्चस्व बनाये रखने के लिए विशेष प्रावधान अंतिम संस्कारों के रूप में बना लिए. अच्छा होता अगर सबका एक ही शमशान होता.”

क्या राजा रंक फ़कीर. मौत के बाद तो माटी में मिल जाना है, फ़ना हो जाना है. लेकिन शमशान का यथार्थ कहता है ग़ोया मौत ने ख़ुद को भी ऊँच-नीच के दर्जो में बाँट लिया है.

किसी को सर छिपाने के लिए उम्र भर आशियाना नहीं मिलता तो कुछ लोग मरकर भी भव्य स्मारकों में रहते हैं.

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