रुपये की गिरावट से इनकी बल्ले-बल्ले

  • 21 अगस्त 2013

रुपये की कीमत में लगातार जारी गिरावट से अर्थव्यवस्था और सरकार के बही-खातों पर भले ही बुरा असर पड़ रहा है लेकिन अर्थव्यवस्था का एक हिस्सा ऐसा भी है जिसे इस गिरावट से फायदा मिल रहा है.

जाने-माने अर्थशास्त्री राजेश रापरिया ने बीबीसी संवाददाता सुशीला सिंह को बताया कि आमतौर पर रुपये की गिरावट से आयातकों को नुकसान होता है लेकिन जिन आयातकों ने स्टॉक कर रखे हैं वो मुनाफे में रहेंगे.

इसके अलावा ऐसी कंपनियां जिन्होंने विदेश से कर्ज़ नहीं ले रखा है वो इस समय फायदे में रहेंगी.

राजेश रपरिया ने बताया कि रुपये की गिरावट से उन प्रवासी भारतीयों को भी फायदा होता है जो भारत में धन भेजते हैं. राजेश रपरिया ने यह भी जोड़ा कि ये फायदा वो तभी तक लेना चाहते हैं जब तक कि देश की अर्थव्यवस्था स्थिर रहे.

निर्यातकों को फायदा

आमतौर पर मुद्रा में गिरावट से आयातकों को नुकसान होता है जबकि निर्यातक फायदे में रहते हैं.

निर्यात के मोर्चे पर आईटी और फार्मा जैसे क्षेत्र हैं जिनको फायदा हो रहा है लेकिन इसे गौर से देखा जाए तो पता चलता है कि इससे सिर्फ कंपनियों का मुनाफा बढ़ रहा है, रोज़गार के मौके नहीं.

राजेश रपरिया का कहना है, "आईटी क्षेत्र करीब 180 अरब डॉलर का निर्यात करता है. यहां आप देखें तो रुपये के अवमूल्यन के कारण इन कंपनियों का मुनाफा बढ़ रहा है, लेकिन रोजगार की स्थिति ख़राब है."

उनका कहना है कि रुपये के अवमूल्यन के कारण कारोबार का आकार तो बढ़ रहा है लेकिन वास्तव में कंपनी का काम नहीं बढ़ रहा है.

इसलिए कंपनियों के मुनाफे में बढ़ोतरी का फायदा कर्मचारियों को नहीं मिल रहा है, जबकि उन कर्मचारियों को बाजार में महंगी चीज़ें खरीदनी पड़ रही हैं.

उन्होंने कहा कि किसी भी देश में लोग तभी तक पैसा लगाते हैं जब तक सरकार पर उनका भरोसा रहता है. ऐसे में एनआरआई डिपॉज़िट में भी कमी आ सकती है.

मई से अब तक 15 फीसदी गिरावट के साथ रुपया अमरीकी डॉलर के मुकाबले सबसे निचले स्तर पर जा पहुंचा है.

अमरीकी फेडरल रिजर्व के प्रोत्साहन पैकेज को वापस लिए जाने की संभावना की चर्चाओं के चलते निवेशक भारत जैसे उभरते बाज़ार से पैसा वापस खींच रहे हैं.

इसके अलावा उन घरेलू कारोबारियों को भी राहत मिलती है, जिन्हें सस्ते आयात से कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा था. लेकिन यह लाभ सीमित ही होता है.

रिकॉर्ड घाटा

पिछले साल भारत का चालू खाता घाटा जीडीपी के मुकाबले 6.7 प्रतिशत के स्तर पर जा पहुंचा था, जो एक रिकॉर्ड है.

इसी तरह 31 मार्च को खत्म हुए वित्त वर्ष के दौरान चालू खाता घाटा जीडीपी के मुकाबले करीब पांच प्रतिशत था.

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के मुताबिक अगर किसी देश का चालू खाता घाटा जीडीपी के मुकाबले छह प्रतिशत के स्तर पर पहुंच जाए तो यह खतरनाक स्थिति का संकेत है.

भारत के लिए चुनौतियाँ इसलिए भी काफी मुश्किल हैं क्योंकि यहाँ महंगाई दर भी काफी ज़्यादा है. ऐसे में रुपये की गिरावट से बाजार में महंगाई विकराल रूप ले सकती है.

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