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डोपिंग में क्यों बदनाम है भारत?

 बुधवार, 14 अगस्त, 2013 को 08:05 IST तक के समाचार
भारत में डोपिंग

कुछ ही दिन पहले रेलवे एथलेटिक्स प्रतियोगिता में प्रेम कुमार ने 8.09 मीटर की जंप लगाकर राष्ट्रीय रिकॉर्ड में सुधार किया, लेकिन उसके बाद वो घंटों स्टेडियम में बैठे डोप कंट्रोल अधिकारी का इंतज़ार करते रहे.

डोप कंट्रोल अधिकारी को उनका यूरिन सैंपल लेना था ताकि उस राष्ट्रीय रिकॉर्ड को मान्यता मिल सके. लेकिन स्टेडियम में डोप कंट्रोल अधिकारी तो तब होता, जब चैम्पियनशिप के आयोजक रेलवे और एथलेटिक्स फेडरेशन को इस बात की परवाह होती.

बहरहाल 24 घंटे गुज़रने के बाद दूसरे दिन डोपिंग नेशनल एंटी डोपिंग एजेंसी के अधिकारी ने प्रेम कुमार का सैंपल लिया. उसका नतीजा भी आना है.

वैसे इस टेस्ट का 24 घंटे के बाद होना किसी एथलीट के प्रतियोगिता में डोप टेस्ट पास करने के बराबर नहीं माना जा सकता. नियमों के अनुसार प्रतियोगिता में पहले तीन पदक जीतने वालों का टेस्ट रेस या प्रतियोगिता के एक दम बाद होना ज़रूरी है.

यूसैन बोल्ट

कुछ लोग यूसैन बोल्ट पर भी डोपिंग करने का शक जताते हैं.

वर्ना उसे 'आउट ऑफ कॉम्पिटीशन' यानी प्रतियोगिता के बाहर का टेस्ट माना जाता है. लेकिन भारत में सब चलता है.

ऐसे में अगर इंटरनेशनल एथलेटिक्स फेडरेशन की फेहरिस्त में डोपिंग के दोषी 44 भारतीय एथलीटों के नाम हो तो कोई हैरानी की बात नहीं है.

'अधिकारियों का सुस्त रवैया'

डोपिंग के मामले में रूस के बाद सूची में दूसरा स्थान भारत के लिए शर्म की बात है, लेकिन जब अधिकारियों का ही रवैया सुस्त हो तो क्या किया जा सकता है?

ये ठीक है कि इंटरनेशनल ओलंपिक कमेटी के नियमों के अनुसार खिलाड़ी और सिर्फ खिलाड़ी ही ज़िम्मेदार होता है अगर वो दोषी पाया जाए लेकिन इतना कहने से अधिकारियों या खेल संघों की ज़िम्मेदारी ख़त्म नहीं हो जाती.

इसलिए महिला मैराथन की विश्व रिकॉर्ड होल्डर ब्रिटेन की पॉला रेडक्लिफ ने कुछ दिन पहले एक सेमिनार में ये ज़ोर दिया कि अगर किसी खिलाड़ी को दोषी पाया जाए तो उस देश के खेल संघ और कोचों पर प्रतिबंध लगना चाहिए.

इस बदनाम लिस्ट में ऐसे भारतीय खिलाड़ियों के नाम भी है जिन्हें आम आदमी तो दूर, शायद खेल को समझने और जानने वाले भी न पहचानें. बोधिसत्व बनर्जी, दीपक चौधरी, नितिन कुमार, रोहित कुमार और सचिन कुमार आदि ऐसे एथलीट हैं जिन्हें शायद ही कोई जानता हो.

"शॉर्ट कट लगाने के चक्कर में एथलीट इन पदार्थों का सहारा लेते हैं"

मुकुल चटर्जी, डायरेक्टर जनरल, नाडा

इन पर दो-दो साल के प्रतिबंध लगे हैं. इससे साफ़ पता चलता है कि डोपिंग की ये बीमारी सिर्फ सीनियर और जाने-माने एथलीटों तक सीमित नहीं है बल्कि इसकी जड़ें गहरी और जूनियर स्तर तक गई हैं. और ये फ़िक्र की बात है.

भारत में एथलेटिक्स में या बाकी खेलों में डोपिंग कोई नई चीज़ नहीं है. 1968 के मेक्सिको खेलों के ट्रायल में दिल्ली के रेलवे स्टेडियम में कृपाल सिंह 10 हज़ार मीटर रेस में भागते समय ट्रैक छोड़कर सीढ़ियों पर चढ़ गए थे और मुंह से झाग निकलते हुए बेहोश हो गए थे. बाद में पता चला कि उन्होंने नशीले पदार्थ ले रखे थे ताकि मेक्सिको के लिए क्वॉलिफाई कर सकें.

दिल्ली के एशियन गेम्स में भी विवाद हुआ था जब शॉट पुट के रजत पदक विजेता कुवैत के मोहम्मद झिंकावी ने स्वर्ण पदक विजेता भारत के बहादुर सिंह के खिलाफ आरोप लगाए थे कि उन्होंने डोप टेस्ट नहीं करवाया.

यहां तक कि झिंकावी ने विरोध ज़ाहिर करते हुए अपना रजत पदक भी नहीं लिया था. और ये कह कह वो कुवैत वापस गए थे कि एक महीने बाद कुवैत में होने वाली एशियन चैम्पियनशिप में वो बहादुर सिंह को हराएंगे. और हुआ भी ऐसा. लेकिन किसी ने इस पर ध्यान नहीं दिया. और वो बहादुर सिंह आज भारत के नेशनल कोच हैं.

'पूरे विश्व में फैली समस्या'

डोपिंग की समस्या

अकसर खिलाड़ी अपना प्रदर्शन सुधारने के लिए डोपिंग का सहारा लेते हैं

नेशनल एंटी डोपिंग एजेंसी के निदेशक जनरल मुकुल चटर्जी मानते हैं कि भारतीय एथलेटिक्स में डोपिंग के मामले बढ़ रहे हैं. इसका मुख्य कारण ये है कि एथलेटिक्स का खेल शरीर की ताकत पर ज़्यादा और स्किल पर कम निर्भर होता है. ऐसे में शॉर्ट कट लगाने के चक्कर में एथलीट इन पदार्थों का सहारा लेते हैं. लेकिन सिर्फ इस कारण से एथलीटों को माफ़ नहीं किया जा सकता.

वैसे ये बीमारी सिर्फ भारत में ही नहीं पूरे विश्व में फैली हुई है. जमैका में तो इसका इतना प्रकोप है कि यूसैन बोल्ट को भी शक की नज़र से देखा जाता है.

जर्मनी में भी हाल में पुराने दस्तावेज़ों से पता चला है कि 70 के दशक के कई खिलाड़ी डोपिंग में लिप्त थे और यही हाल अमरीका का भी है. लेकिन क्या भारत के एथलीटों को इसलिए ये पदार्थ लेने चाहिए क्योंकि विदेशों में भी इनका इस्तेमाल होता है?

ये सही है कि खेलों को डोपिंग से बिल्कुल मुक्त नहीं किया जा सकता. आखिर ये चोरी और बेईमानी भी मानवीय प्रवृत्ति है और पैसे और यश के लिए इंसान ग़लत काम करने से नहीं चूकता.

लेकिन अगर समय रहते जूनियर एथलीटों को थोड़ा सिखाया जाए तो इसे कम ज़रूर किया जा सकता है, भले ही इस से पूरी तरह छुटकारा न मिले.

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