दुर्गा शक्ति: अधिकारी जो व्यवस्था के लिए बने चुनौती

  • 2 अगस्त 2013

ऐसे आरोप अकसर लगते रहते हैं कि प्रशासनिक सेवा में कार्यरत अधिकारियों पर राजनीतिक दबाव होता है. लेकिन कुछ अधिकारी ऐसे भी है जिन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई है. एक नज़र ऐसे अधिकारियों पर जिन्होंने निलंबन झेला, इस्तीफ़ा दिया या जो अब भी अपने काम में डटे हैं.

दुर्गा शक्ति नागपाल

दुर्गा शक्ति नागपाल
यूपी सरकार ने दुर्गा शक्ति नागपाल को 27 जुलाई को निलंबित किया.

दुर्गा शक्ति नागपाल 2009 बैच की आईएएस अधिकारी हैं. यूपीएससी परीक्षा में 20वां रैंक हासिल करने वाली नागपाल मूल रूप से छत्तीसगढ़ की हैं. उन्होंने कंप्यूटर साइंस की पढ़ाई की है.

प्रशिक्षण के बाद दुर्गा शक्ति नागपाल को पंजाब काडर मिला था लेकिन उत्तर प्रदेश काडर के आईएएस अधिकारी अभिषेक सिंह से शादी के बाद वे यूपी काडर में आ गईं.

28 वर्षीय दुर्गा शक्ति नागपाल गौतमबुद्ध नगर में एसडीएम (सदर) पद पर कार्यरत थीं. उन्हें 27 जुलाई को उत्तर प्रदेश सरकार ने सांप्रदायिक सदभाव बिगाड़ने के आरोप में निलंबित कर दिया. हालाँकि विपक्ष के मुताबिक उन्हें रेत खनन माफ़िया के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने के कारण निलंबित किया गया.

अशोक खेमका

अशोक खेमका
अशोक खेमका का अब तक 43 बार तबादला किया जा चुका है.

आईएएस अशोक खेमका यूपीए अध्यक्ष सोनिया गाँधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा से संबंधित एक जमीन सौदे को रद्द करने के बाद चर्चा में आए.

अशोक खेमका की पहली पोस्टिंग साल 1993 में हुई थी. 19 साल की नौकरी में उनका 43 बार तबादला किया जा चुका है. इस दौरान अलग-अलग विभागों में आठ पदों उन्होंने एक महीना या उससे भी कम काम किया.

वे सिर्फ़ दो बार ही एक साल से अधिक समय तक किसी पद पर रहे.

संजीव भट्ट

संजीव भट्ट
संजीव भट्ट को 2011 में जेल भी भेजा गया.

गुजरात के भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) के निलंबित अधिकारी संजीव राजेंद्र भट्ट सुप्रीम कोर्ट में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ़ हलफ़नामा दायर करने के बाद सुर्ख़ियों में आए.

इस हलफ़नामे में उन्होंने कहा कि गुजरात में वर्ष 2002 में हुए दंगों में नरेंद्र मोदी की भी भूमिका थी.

49 वर्षीय आईपीएस अधिकारी संजीव भट्ट इस समय गुजरात पुलिस सेवा से निलंबित हैं. 2011 में उन्हें अपने एक मातहत सिपाही पर दबाव डालने के आरोप में जेल भी भेजा गया था.

आईआईटी मुंबई से पोस्ट ग्रेजुएट संजीव भट्ट वर्ष 1988 में भारतीय पुलिस सेवा में आए थे. इस दौरान वे राज्य के कई ज़िलों, पुलिस आयुक्त के कार्यालय और अन्य पुलिस इकाइयों में तैनात रहे.

दिसंबर 1999 से सितंबर 2002 तक वे राज्य ख़ुफ़िया ब्यूरो में ख़ुफ़िया उपायुक्त के रूप में कार्यरत थे. गुजरात के आंतरिक सुरक्षा से जुड़े सभी मामले उनके अधीन थे.

इनमें सीमा सुरक्षा और तटीय सुरक्षा के अलावा अति विशिष्ट जनों की सुरक्षा भी शामिल थी. इस दायरे में मुख्यमंत्री की सुरक्षा भी आती थी.

संजीव भट्ट नोडल ऑफ़िसर भी थे, जो कई केंद्रीय एजेंसियों और सेना के साथ ख़ुफ़िया जानकारियों का आदान-प्रदान भी करते थे.

जब वर्ष 2002 में गुजरात में दंगे हुए थे, उस समय भी संजीव भट्ट इसी पद पर थे.

हर्ष मंदर

1955 में जन्में हर्ष मंदर सिंह 1980 में आईएएस बनें थे. आईएएस सेवा से जुड़ने के बाद उन्होंने अपने नाम से सिंह हटा लिया था ताकि वे किसी एक ख़ास जाति के न लगें.

हर्ष मंदर करीब दो दशक तक आईएएस रहे. इस दौरान वे मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के अलग-अलग हिस्सों में तैनात रहे.

कहा जाता है कि 1989 में नर्मदा बचाओ आंदोलन के दौरान उन्होंने मेधा पाटकर और बाबा आम्टे के शांतिपूर्ण प्रदर्शन को रोकने से इंकार कर दिया था.

साल 1990 में उन्होंने मध्यप्रदेश के रायगढ़ जिले में एक ताकतवर भाजपा नेता की दो हजार एकड़ जमीन गरीबों में बाँट दी थी. इस दौरान हर्ष मंदर का 22 से ज्यादा बार ट्रांस्फर किया गया.

साल 2002 में गुजरात दंगों के बाद उन्होंने दंगों को सरकार द्वारा प्रायोजित बताते हुए अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया था.

भूरे लाल

उत्तर प्रदेश काडर के 1955 बैच के आईएएस अधिकारी भूरे लाल 35 साल से अधिक साल तक आईएएस रहे. इस दौरान वे प्रधानमंत्री कार्यालय, वित्त मंत्रालय और केंद्रीय सतर्कता आयोग समेत कई अन्य अहम पदों पर रहे. अपनी ईमानदारी, कर्तव्यनिष्ठा और निडरता से उन्होंने अलग पहचान बनाई.

राजीव गाँधी की सरकार में वीपी सिंह जब देश के वित्त मंत्री थी तब प्रवर्तन निदेशालय के मुखिया भूरे लाल थे. इस दौरान उन्होंने अनिल अंबानी और अमिताभ बच्चन समेत कई बड़े उद्योगपतियों के यहाँ छापेमारी की कार्रवाई की.

इसके बाद राजीव गाँधी ने वीपी सिंह को वित्त मंत्री के पद से हटा दिया था.

भूरे लाल साल 2004 में लोक संघ सेवा आयोग के सदस्य बने थे.