उत्तराखंड बाढ़: अब तक नहीं लौटे तो अंतिम संस्कार शुरू

  • 30 जुलाई 2013
माहेश्वरी  परिवार के (दाँए से) केशर देव, प्रेम लता और कांता कुमारी का अंतिम संस्कार किया जा चुका है
माहेश्वरी परिवार के (दाँए से) केशर देव, प्रेम लता और कांता कुमारी का अंतिम संस्कार किया जा चुका है

उत्तराखंड की प्राकृतिक आपदा में अपने परिजनों को खो चुके हज़ारों लोग इतने नाउम्मीद हो चुके हैं कि उनमें से कई ने अपने प्रियजनों के अंतिम संस्कार की रस्में भी पूरी करनी शुरू कर कर दी हैं.

दिल्ली का महेश्वरी परिवार भी उनमें से एक है. पीतमपुरा के इस घर ने तीन सदस्य गँवाए हैं. एक महीने से ज़्यादा इंतज़ार के बाद तीनों के बारे में कोई ख़बर ना आने पर उनका अंतिम संस्कार पूरा कर दिया गया है.

परिवार का कहना है, "अगर तीनों में से कोई भी लौट आता है तो वह उनकी ज़िंदगी का सबसे ख़ुशनुमा दिन होगा. अंतिम संस्कार में हुआ ख़र्च तो दान-पुण्य ही है लेकिन अगर उन लोगों को कुछ हो गया है तो उनकी अंतिम रस्में होनी ज़रूरी हैं."

केदारनाथ में 16 जून को आई प्राकृतिक आपदा में इस परिवार के चार लोग फँसे. सबसे उम्रदराज़ विट्ठल महेश्वरी बच निकलने में क़ामयाब रहे. इस भयंकर तबाही को देखने के बाद वह अपनी पत्नी कांता कुमारी महेश्वरी, साले केशर देव और सलहज प्रेम लता महेश्वरी के लौटने की उम्मीद हार चुके हैं .

केशर देव और प्रेम लता की दोनों बेटियों के आँसू अभी तक सूखे नहीं हैं. दोनों की शादी हो चुकी है और उनका कोई भाई नहीं है. वे कहती हैं, "हमारा तो पूरा पीहर ही ख़त्म हो गया." माँ-बाप के रहते कभी उन्हें काम करने की ज़रुरत नहीं हुई. अब छोटे बच्चे को छोड़कर पिता का कारोबार संभालना पड़ रहा है.

'कोई दस्तावेज़ नहीं'

शिखा और आँचल
शिखा और आँचल को अब भी माता-पिता के लौटने की उम्मीद है

केशर देव और प्रेम लता की बड़ी बेटी शिखा अपने माता-पिता के कारोबार को बंद होने से बचाने में खुद को बहुत असहाय महसूस कर रही हैं. वह कहती हैं कि हमारे पास लिखित में कोई दस्तावेज़ नहीं है, जिससे हम अपने माँ-बाप का काम आगे संभाल सकें. अगर उनका मृत्यु प्रमाण पत्र ही मिल जाता तो हमारी मुसीबतें कम हो जातीं.

शिखा कहती हैं, "हम लोग पहले ही संभल नहीं पा रहे हैं और सरकार हमारे लिए मुसीबत पर मुसीबत खड़ी कर रही है. हम बैंक की कोई भी औपचारिकता पूरी नहीं कर पा रहे हैं."

छोटी बेटी आँचल सरकार से इस बात का जवाब चाहती है कि 15 जुलाई को मृत्यु प्रमाण पत्र देने की बात से वह पीछे क्यों हट गई और कोई अगली तारीख क्यों नहीं दी जा रही है?

उन्हें डर है कि कहीं सरकार इस मामले को ठंडे बस्ते में ना डाल दे.

केदारनाथ में अभी तक साफ़-सफ़ाई का काम पूरा ना होने पर भी आँचल सरकार से नाराज़ हैं. वह कहती हैं, "सरकार यह भी नहीं कर सकती तो क्या कर सकती है?"

खोए हुए लोगों के लिए बनाई गई "मिसिंग सेल" बंद होने की ख़बरों पर बड़ी बेटी शिखा का यह भी कहना है कि लोगों को ढूँढने का काम इतनी जल्दी बंद नहीं करना चाहिए.

'भिखारी बन गया'

विट्ठल महेश्वरी
विट्ठल महेश्वरी बताते हैं कि उन्हें उत्तराखंड में परिजनों को खोजने में काफ़ी परेशानी हुई

जलप्रलय से बचकर आए विट्ठल महेश्वरी अपनी पत्नी को याद करके रो पड़ते हैं. वह कहते हैं, "मेरी पत्नी हर जगह मेरी सहभागी थी. सारी संपत्ति उसके नाम थी, मेरे नाम तो कुछ भी नहीं था."

विट्ठल कहते हैं, "मैं आज जब अपनी दुकान पर जाता हूँ तो चेक पर मेरे दस्तख़त चलेंगे नहीं, उसके दस्तख़त हैं नहीं. सब कुछ होते हुए भी मैं तो आज भिखारी बन कर रह गया."

उन्हें यह भी शिकायत है कि आज तक केंद्र सरकार और दिल्ली सरकार का कोई भी नुमाइंदा उनकी सुध लेने नहीं आया.

विट्ठल महेश्वरी के बेटे दीपेश कहते हैं, "सुनने में आया था कि दिल्ली से जितने लोग खोए हैं उनकी एक सूची उत्तराखंड सरकार को दी गई है. वह सूची भी वेबसाइट पर नहीं डाली गई है. हमें तो यह भी नहीं पता कि मेरी माँ और मामा-मामी का नाम उस सूची में है या नहीं."

'सौतेला व्यवहार'

दीपेश माहेश्वरी : "दिल्ली सरकार से नहीं मिली मदद."
दीपेश माहेश्वरी : "दिल्ली सरकार से नहीं मिली मदद."

दीपेश बताते हैं कि जब वह अपने परिजनों को ढूँढने गए थे तो वहाँ सभी राज्यों से मदद भेजी गई थी. सभी राज्यों ने अपने लोगों को ढूँढने के लिए स्टॉल लगाए थे. लेकिन उनका कहना है कि वहाँ दिल्ली का स्टॉल केवल एक दिन दिखा. उन लोगों को अपने आप ही सभी प्रयास करने पड़े.

वह कहते हैं, "मेरी माँ के नाम पर जो चल-अचल संपत्ति है उसे हम किराए पर भी नहीं दे सकते. बिना मृत्यु प्रमाण पत्र के हमें कोई अधिकार ही नहीं है."

उत्तराखंड में लोगों को ढूँढने में आई परेशानियों को बयान करते हुए दीपेश कहते हैं , "क्या हम सरकार के कुछ नहीं लगते? हमारे साथ सौतेला व्यवहार क्यों किया जा रहा है?"

दिल्ली सरकार के प्रवक्ता सतपाल ने बीबीसी को बताया, "दिल्ली सरकार ने उत्तराखंड में अपने अधिकारियों के दो दल भेजे थे. अलग से स्टॉल इसलिए नहीं दिखे क्योंकि वे अधिकारी उत्तराखंड की सरकार के साथ मिलकर काम कर रहे थे."

उन्होंने यह भी कहा कि दिल्ली सरकार की तरफ से उत्तरखंड सरकार को मदद के तौर पर 10 करोड़ रुपए की सहायता राशि दी गई. उत्तराखंड सरकार इसे चाहे जैसे ख़र्च कर सकती है.

'सबक लेना चाहिए'

माहेश्वरी  परिवार ने अपने परिजनों के लिए ब्राह्मण भोज करवाया.
माहेश्वरी परिवार ने अपने परिजनों के लिए ब्राह्मण भोज करवाया.

अभी तक मुआवज़े की घोषणा न होने पर सतपाल कहते हैं, "उतराखंड सरकार जब तक मृतकों की घोषणा नहीं करती तब तक मुआवज़े की घोषणा कैसे की जा सकती है?"

वह कहते हैं कि खोए हुए लोगों को मृत घोषित करने की क़ानूनी समय सीमा सात साल है लेकिन उत्तराखंड सरकार जलप्रलय के मामले में इसे तीन महीने करने पर विचार कर रही है.

दीपेश के मामा प्रदीप महेश्वरी अपनी बहन के खोने के लिए केंद्र और उत्तराखंड सरकार को ज़िम्मेदार मानते हैं. वह कहते हैं, "सरकार ने शुरू से ही लापरवाही से काम किया, जब मौसम विभाग बार-बार चेतावनी दे रहा था तो क्या सरकार दो दिन के लिए यात्रा बंद नहीं कर सकती थी?"

प्रदीप कहते हैं, " हमारे लोग तो चले गए अब वह वापस नहीं आ सकते लेकिन आगे के लिए सरकार को सबक ले लेना चाहिए."

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकतें हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार