तेलंगाना और आंध्र के बीच फँसी सोने के अंडे देने वाली मुर्ग़ी

  • 30 जुलाई 2013
हैदराबाद शहर, आंध्र प्रदेश, चार मीनार

तेलंगाना राज्य की मांग पर विचार के लिए दिल्ली में मंगलवार को कांग्रेस कार्यकारणी की बैठक होनी है. माना जा रहा है कि इस बैठक में सब से बड़ा मुद्दा हैदराबाद शहर का होगा.

इससे पहले जब भी कभी तेलंगाना राज्य की मांग पर चर्चा हुई है तो यही सवाल समाधान के रास्ते में सबसे बड़ी रुकावट बना कि हैदराबाद शहर का भविष्य क्या होगा? स्वाभाविक रूप से तेलंगाना राज्य के समर्थकों का यही कहना है कि हैदराबाद ही तेलंगाना राज्य की राजधानी होगी क्योंकि भौगोलिक रूप से वो तेलंगाना क्षेत्र में ही है और ये शहर इससे पहले भी तेलंगाना राज्य की राजधानी रह चुका है.

संकट के बादल

तेलंगाना समर्थक आंध्र और रायलसीमा क्षेत्र के लोगों की इस मांग को मामने से इनकार करते हैं कि बँटवारे की सूरत में हैदराबाद को दोनों राज्यों की राजधानी बनाया जाना चाहिए. उनका कहना है कि आंध्र या रायलसीमा क्षेत्र कहीं भी हैदराबाद से सटे हुए नहीं है और उन दोनों क्षेत्रों की सीमा हैदराबाद से कम से कम 200 किलोमीटर दूर है.

गोरखालैंड की माँग

तो फिर सवाल यह उठता है कि आखिर रायलसीमा-आंध्र क्षेत्रों के राजनेता हैदराबाद को लेकर इतनी जिद क्यों कर रहे हैं और किसी भी कीमत पर उसे छोड़ने के लिए तैयार क्यों नहीं हैं? इसके कई कारण हैं. सबसे पहले तो राजधानी होने के कारण हैदराबाद ही राज्य का सबसे ज्यादा विकसित और मुख्य वाणिज्यिक केंद्र रहा है.

राजस्व

अलग तेलंगाना राज्य के लिए संघर्ष करते लोग.

राज्य की अर्थव्यवस्था में हैदराबाद कितना महत्वपूर्ण है, उसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि हैदराबाद शहर और उसके पास के इलाके से राज्य के राजस्व का 55 प्रतिशत हिस्सा आता है यानी लगभग 40 हज़ार करोड़ रुपए. इसी तरह केंद्र सरकार को भी आंध्र प्रदेश से मिलने वाले राजस्व का 65 फीसदी हिस्सा यानी तकरीबन 35 हज़ार करोड़ रुपए इसी शहर से मिलता है.

सांसद देंगे इस्तीफा

इसके अलावा स्थानीय कर के रूप में भी इसी शहर से 15 हज़ार करोड़ रुपए वसूल किए जाते हैं. इस तरह हैदराबाद शहर को अगर सरकार सोने के अंडे देने वाली मुर्गी के रूप में देखती हैं तो शायद गलत भी नहीं है. इस आमदनी में पिछले 10 से 15 सालों में ज़बरदस्त इज़ाफ़ा हुआ है. खास तौर पर उस समय से जबकि चंद्रबाबू नायडू के दौर में हैदराबाद सूचना प्रौद्योगिकी के अंतरराष्ट्रीय केंद्र के तौर पर उभरा.

तेलंगाना पर फैसला

चुनांचे आज हैदराबाद से उत्पाद और सेवाओं का जो निर्यात विदेशों को होता है उसका मूल्य भी लगभग 90 हज़ार करोड़ रुपए का है जिसमें से सॉफ्टवेयर और आईटी सेवाओं का हिस्सा 60 हज़ार करोड़ रुपए का है और शेष भाग दवाओं के उद्योग और दूसरे क्षेत्रों से आता है. राज्य के बँटवारे का विरोध करने वाले आंध्र और रायलसीमा के लोग कहते हैं कि 1956 में आंध्र प्रदेश की स्थापना के बाद से हैदराबाद का जो विकास हुआ है उसमें उनका भी हिस्सा है.

हिस्सा

पृथक तेलंगाना राज्य की माँग को लेकर विरोध प्रदर्शन.

लेकिन तेलंगाना के लोग इससे इनकार करते हैं और उनका कहना है कि आंध्र और रायलसीमा से हैदराबाद आकर बसने वालों ने हैदराबाद की संस्कृति और सुविधाओं को नुकसान ही पहुँचाया है और इस शहर की पहचान बदल डाली है. आंध्र के लोग चाहते हैं कि गत पचास साठ वर्षों में हैदराबाद में केंद्र सरकार के जो वैज्ञानिक और प्रतिरक्षा क्षेत्र के शोध केंद्र स्थापित हुए हैं वे केवल तेलंगाना को ही क्यों मिले, उसमें उनका हिस्सा भी होना चहिए.

आंध्र में उथल पुथल

इसके अलावा हाल के सालों में हैदराबाद में अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट और विश्व स्तर की रिंग रोड बनने से इस शहर को जो फायदा हुआ और इस समय निर्माण होने वाले हैदराबाद मेट्रो में अरबों डालर के पूंजी निवेश से जो लाभ हो सकता है उस पर भी उनकी नज़रें हैं. हैदराबाद पर अपना नियंत्रण बनाए रखने की इच्छा में आंध्र और रायलसीमा के वे पूंजीपति सबसे आगे हैं जिन्होंने इस शहर में बड़े व्यापार स्थापित किए हैं.

कहा तो यह भी जाता है कि पिछले 30 से 40 सालों में हैदराबाद में जितने बड़े औद्योगिक और व्यापारिक नाम उभरे हैं वे सब के सब आंध्र के पूंजीपतियों के हैं. तेलुगु मीडिया की सबसे बड़ी हस्ती रामोजी राव आंध्र के हैं और वह तेलुगु के सबसे बड़े दैनिक समाचार पत्र और एशिया के सबसे बड़े फिल्म स्टूडियो के मालिक हैं. यह स्टूडियो भी हैदराबाद में ही है.

नौकरियाँ

हैदराबाद शहर में वॉल मार्ट का नया स्टोर

बात चाहे रेड्डी लैब्स की हो या जीवीके ग्रुप की, सत्यम कम्प्यूटर्स की या फिर लैंको ग्रुप की, इन सबके मालिक आंध्र के लोग ही हैं. हैदराबाद में कपड़ों और सोने के व्यापार से लेकर हर क्षेत्र पर आंध्र के लोग ही छाए हुए हैं. हैदराबाद में सबसे बड़े पाँच सितारा होटल भी उन्हीं के हैं. तेलुगु फिल्म उद्योग पर वही छाए हुए हैं. एनटी रामा राव और अक्किनेनी नागेश्वर से लेकर अब एनटीआर जूनियर और महेश बाबू तक सभी फ़िल्मी हीरो आंध्र के हैं.

सबसे बड़े फ़िल्म निर्माता आंध्र के हैं. निर्माण के क्षेत्र पर उनका नियंत्रण है और सभी बड़े-बड़े रिहाइशी कॉम्प्लेक्स भी उनके हैं. इन हालात में इस बात पर किसी को आश्चर्य नहीं है कि आंध्र और रायलसीमा के लोग हैदराबाद छोड़ने के लिए तैयार नहीं है. तेलंगाना के समर्थकों का एक आरोप यह भी है कि उनकी नौकरियों पर भी आंध्र वालों ने कब्ज़ा कर लिया है. उनकी कम से कम दो लाख नौकरियों पर आंध्र के लोग काम कर रहे हैं.

साझी राजधानी

इन्फोसिस का एक परिसर

इसका एक संकेत इस बात से भी मिलता है की सचिवालय में कुल कर्मचारियों में तेलंगाना के लोगों का हिस्सा केवल 10 प्रतिशत है. एक अनुमान के अनुसार इस समय पूरे तेलंगाना की आबादी में आंध्र वालों का हिस्सा 90 लाख है और इनमें से 50 फीसदी लोग हैदराबाद और उसके आस-पास रहते हैं. आंध्र और रायलसीमा के नेताओं का कहना है कि इस बात की गारंटी नहीं है कि तेलंगाना बनने के बाद इन लोगों के जान-माल की सुरक्षा का मसला नहीं होगा.

इसीलिए वे चाहते हैं कि हैदराबाद को केंद्र प्रशासित क्षेत्र घोषित किया जाए या कम से कम दस वर्ष तक उसे साझी राजधानी बनाया जाए. अगर ऐसा होता है तो इस इलाके का सारा राजस्व केंद्र सरकार की झोली में जाएगा और न तेलंगाना और न ही शेष आंध्र को कुछ मिलेगा. ऐसे में शायद तेलंगाना राज्य किसी कीमत पर हैदराबाद को नहीं छोड़ेगा और न ही आंध्र वाले उसे छोड़ने पर तैयार होंगे.

ऐसे में संभावना यही है कि कम से कम पांच वर्ष तक हैदराबाद दो राज्यों की राजधानी रहेगा और उसका प्रशासन केंद्र के हाथ में आ जाएगा.

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