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नियमगिरि के बिना क्या जी पाएँगे आदिवासी?

 सोमवार, 22 जुलाई, 2013 को 07:47 IST तक के समाचार
नियमगिरि पर हुई पहली ग्राम सभा में फैसला खनन के खिलाफ हुआ

एक तरफ ओडिशा सरकार की पूरी ताकत और वेदांता कंपनी का धनबल और दूसरी तरफ़ हजारों कमज़ोर और निर्धन प्राचीन आदिवासी. और दोनों के बीच में हजारों साल पुराना नियमगिरि पर्वत.

इस लड़ाई में नियमगिरि पर सदियों से बसने वाले आदिम डोंगरिया कंध और कुटिया कंध समुदाय के आदिवासियों ने बहुत सी कुर्बानियाँ दी हैं.

कइयों को जेल जाना पड़ा, माओवादी होने का आरोप सहना पड़ा और कुछ लोगों को अपनी जान भी देनी पड़ी.

लेकिन आदिवासियों ने हार नहीं मानी.

'नियमगिरि हमारा बैंक'

कुछ महीने पहले नियमगिरि के दौरे में मैंने जब एक डोंगरिया कंध युवक से पूछा कि नियमगिरि आखिर क्यों उनके लिए इतना महत्वपूर्ण है, तो उसका जवाब बेहद रोचक था.

उन्होंने कहा, "नियमगिरि हमारे लिए एक बैंक है. हम यहाँ से पत्ते तोड़ते हैं तो हमें पैसे मिलते हैं, लकड़ी निकालते हैं तो पैसे मिलते हैं."

युवक का जवाब चौंकाने वाला इसलिए था कि आम तौर से डोंगरिया कंध लोगों को न पैसे की पहचान होती है और न ही इस तरह उपमा देने की सूझबूझ. यह युवक पैसों की भाषा में शायद इसलिए बोल रहा था क्योंकि वह कुछ पढ़ा लिखा था और बाहरी दुनिया के रंग-ढंग से काफी हद तक वाकिफ था.

नियमगिरि

नियमगिरि के लिए आदिवासी लोग लंबे समय से संघर्ष कर रहे हैं

लेकिन आगे चलकर इसी युवक ने जो कहा उससे यह स्पष्ट हो गया की चाहे पढ़ा लिखा हो या फिर अनपढ़, हर आदिवासी यह अच्छी तरह से समझता है कि नियमगिरि न केवल उनके लिए बल्कि उनकी आने वाली हर पीढ़ी के लिए भी कितना महत्वपूर्ण है.

युवक ने कहा, "नियमगिरि है, इसलिए हम लोग हैं. जब नियमगिरि ही नहीं होगा, तो हम कहाँ होंगे?" उनका इशारा नियमगिरि में बॉक्साइट खनन की ओर था.

नियमगिरि की स्वयं सम्पूर्ण दुनिया में रहने वाले आदिवासियों को तथाकथित 'विकास' की न तो समझ है और न चाह. वे अपनी ही दुनिया में खुश हैं. बाहरी दुनिया से न तो वे कोई रिश्ता कायम करना चाहते हैं और न ही उस पर निर्भर हैं.

लेकिन उनकी परेशानी यह है की बाहरी दुनिया उनसे रिश्ता कायम करना चाहती है. उन्हें 'सभ्यता' की रोशनी से चकाचौंध करना चाहती है. और यह सब इसलिए क्योंकि वे सैंकड़ों मिलियन टन बॉक्साइट पर पालती मारकर बैठ गए हैं.

उपजाऊ ज़मीन

"जैव विविधता का मतलब उनके लिए यह है कि जो कुछ भी उन्हें विरासत में मिला है, उसे आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखना उनका कर्तव्य है."

सुधीर पटनायक, कार्यकर्ता

पत्रकार और एक्टिविस्ट सुधीर पटनायक ने कई वर्षों से नियमगिरि और आदिवासियों का करीब से अध्ययन किया है. वो मानते हैं कि उनकी लड़ाई अपनी रोज़ी रोटी के लिए नहीं, बल्कि जैव विविधता को बचाए रखने के लिए है.

लेकिन क्या सचमुच डोंगरिया कंध आदिवासी जैव विविधता की बारीकियों को समझते हैं, इस पर पटनायक का कहना है, "जैव विविधता की उनकी परिभाषा आप और हम जैसे लोगों से अलग ज़रूर है. लेकिन उनके पास जो ज्ञान है, वह शायद हमारे पास नहीं है. जैव विविधता का मतलब उनके लिए यह है कि जो कुछ भी उन्हें विरासत में मिला है, उसे आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखना उनका कर्तव्य है."

जैव विविधता बनाए रखने की उनकी सफलता के कारण ही नियमगिरि अपने आप में सम्पूर्ण एक अलग ही दुनिया है. स्वस्थ और शुद्ध जीवन धारण के लिए जो कुछ भी चाहिए, वह सब कुछ यहाँ मौजूद है. यहां के तरह तरह के पेड़, जड़ी बूटियाँ, फल और फूल को आदिवासियों को बहुत प्रिय हैं.

'कान्दुल' (एक तरह की दाल), दर्ज़नों तरह के साग, मिर्च, हल्दी और अदरक के अलावा और भी बहुत कुछ यहां उगता है.

पर्वत की यह ज़मीन इतनी उपजाऊ इसलिए है क्योंकि यहाँ से निकली दो बड़ी नदियों वंशधारा, नगबली और दर्जनों झरनों के कारण पानी की कभी कमी नहीं होती. इस समृद्ध पर्यावरण के कारण यहाँ मनुष्य ही नहीं, पशु, पक्षी भी खूब पनपते हैं.

सरकार पर आरोप

आदिवासी लोगों का कहना है कि नियमगिरि उनकी सारी जरूरतों का पूरा कर देता है

जाने माने पर्यावरणविद् विश्वजीत मोहंती का मानना है कि डोंगरिया कंध आदिवासियों की जीवन शैली नियमगिरि के साथ इस कदर जुड़ी हुई है कि वे इसके बिना जीने की सोच भी नहीं सकते.

वो कहते हैं, "यही कारण है कि स्वतंत्रता से पहले कालाहांडी के राजा ने न केवल यहाँ से पेड़ काटने पर सख्त प्रतिबन्ध लगा रखा था, बल्कि खुद भी यहाँ शिकार नहीं करते थे जबकि यहाँ हर तरह के जंगली जानवर पाए जाते थे."

मोहंती कहते हैं कि संविधान के अनुसार आदिवासियों के हितों का विशेष ध्यान रखने की बजाय ओडिशा सरकार इन्हें खदेड़ने और बर्बाद करने पर तुली हुई है. वो कहते हैं, "उससे और भी शर्मनाक बात यह है कि यह सब कुछ सरकार एक विदेशी कंपनी के लिए कर रही है."

आदिवासियों और सरकार के बीच दस साल से चली आ रही इस लड़ाई का अंतिम और शायद निर्णायक चरण पिछले गुरुवार को शुरू हुआ जब सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार नियमगिरि में खुदाई के बारे में अंतिम निर्णय लेने के लिए गांवों में ग्राम सभाओं का सिलसिला शुरू हुआ.

सरकार पर आरोप हैं कि उसने फैसला अपने (और वेदांत के) पक्ष में करवाने के लिए बहुत ही सोच विचार कर 12 गांवों को चुना और कोई हथकंडा अपनाने से परहेज़ नहीं किया. लेकिन सेर्कापाड़ी में हुई इस पहली ग्राम सभा में सभी 38 सदस्यों ने खुदाई के खिलाफ वोट दिया.

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