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मिड डे मील: कहां हो रही है चूक?

 बुधवार, 17 जुलाई, 2013 को 20:50 IST तक के समाचार
मिड डे मील

मध्याह्न भोजन में देश के 11 करोड़ बच्चे शामिल होते हैं

बिहार में मिड डे मील यानी मध्याह्न भोजन खाने से 22 बच्चों की मौत ने इस योजना के क्रियान्वयन पर गंभीर सवाल उठाए हैं.

बीबीसी ने इस मुद्दे पर बात की 'खाने के अधिकार' पर सुप्रीम कोर्ट के आयुक्त के सलाहकार रुपेश से और मिड डे मील योजना के विभिन्न पहलुओं को समझने की कोशिश की.

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बिहार में मिड डे मील योजना कैसे लागू होती है?

मिड डे मील की व्यवस्था में समुदाय के लोगों का शामिल होना बहुत जरूरी है. इसके तहत बच्चों के अभिभावकों की समिति बननी चाहिए. इसे स्कूल मैनेजमेंट कमेटी भी कहते हैं. इसे स्कूल में बनने वाले भोजन और वहां हो रही पढ़ाने की निगरानी का अधिकार होता है. यह अध्यापकों को सुझाव दे सकती है.

वहां मिड डे मील की जिम्मेदारी किसकी होती है?

इसकी जिम्मेदारी बिहार में शिक्षकों पर है. लेकिन तमिलनाडु में इसके लिए अलग से मैनेजर की नियुक्ति की गई है, जो मिड डे मील योजना की देखरेख करता है.

लेकिन बिहार में स्कूल के रोज़मर्रा के कामकाज और पढ़ाई के अलावा मिड डे मील की जिम्मेदारी भी शिक्षकों पर होती है. इसके कारण बच्चों की पढ़ाई भी प्रभावित होती है.

तमिलनाडु जैसी व्यवस्था के बारे में सरकार क्या कहती है?

सुप्रीम कोर्ट का सलाहकार होने के नाते हमारी ओर से हर साल कई सुझाव दिए जाते हैं. चीफ सेक्रेटरी के साथ-साथ सुप्रीम कोर्ट के साथ होने वाली बैठकों में इस तरह की बातें सामने आती हैं.

लेकिन राज्य सरकार अपने हिसाब से व्यवस्था करने की बात कहती है. यहां मिड डे मील सोसायटी बनाई गई है. लेकिन उसके लिए ब्लॉक स्तर तक कोई आधार संरचना तैयार नहीं है. नियमों के अनुसार सरकार को हर ज़िले में मिड डे मील को-आर्डिनेटर नियुक्त करने चाहिए. लेकिन सभी जिलों में इनकी नियुक्ति नहीं की गई है.

आपने सुप्रीम कोर्ट को कौन-कौन से प्रमुख सुझाव दिए हैं? सरकार का उस पर क्या रवैया रहा है?

सुप्रीम कोर्ट को हमने स्कूलों की देखरेख में स्थानीय लोगों को शामिल करने का सुझाव दिया है. इसके अलावा हमने आधारभूत संरचना विकसित करने की बात कही है. इसके अंतर्गत रसोईघर, भण्डार गृह और तमिलनाडु की तरह मैनेजर नियुक्त करने का भी सुझाव दिया है. इसके अलावा नियमित देखरेख की व्यवस्था बनाने का सुझाव भी दिया है. मिड डे मील की गुणवत्ता बनाए रखने का सुझाव भा दिया है, ताकि स्थितियों को बहतर बनाया जा सके.

"बिहार के स्कूलों की स्थिति बहुत खराब दिखती है. मध्याह्न भोजन पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता है. बच्चों को न तो मीनू के हिसाब से खाना दिया जाता है. यहां स्थानीय स्तर पर गुणवत्ता चेकिंग की भी पर्याप्त व्यवस्था नहीं है. "

रुपेश, सुप्रीम कोर्ट कमिश्नर के राइट टू फूड मामले में सलाहकार

बिहार के स्कूलों में आपने क्या स्थिति देखी है?

वहां के स्कूलों की स्थिति बहुत खराब दिखती है. मिड डे मील पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता है. बच्चों को न तो मैन्यु के हिसाब से खाना दिया जाता है, औ न ही स्थानीय स्तर पर गुणवत्ता चेकिंग की पर्याप्त व्यवस्था है.

भोजन की गुणवत्ता सुनिश्चित करना राज्य सरकार की जिम्मेदारी है. इसके लिए उनको नियमित रूप से डायटीशियन की मदद लेनी चाहिए. लेकिन पर्याप्त सुविधा और व्यवस्था के अभाव में छपरा जैसी दुर्घटनाएं होती है. इस बारे में किसी की जवाहबदेही भी तय नहीं है.

सरकार को जवाबदेह बनाने के लिए क्या अब उपाय हैं?

हम सुप्रीम कोर्ट से कह रहे हैं कि मिड डे मील को संवैधानिक ढांचे में लाया जाए. छपरा मामले में लोग अभी तक जवाबदेही तलाश रहे हैं. जिनकी पहली जवाबदेही बनती है, उन पर कार्रवाई होनी चाहिए. इसके कारण लोगों में भय होगा और घटनाओं में कमी आएगी. मिड डे मील योजना में किसी की मौत होना एक आपराधिक मामला है. इसमें गिरफ़्तारी होनी चाहिए. जवाबदेही तय होने से तत्काल कार्रवाई संभव हो सकेगी.

बच्चों को विषाक्त भोजन मामले में सबसे पहली जवाबदेही किसकी बनती है?

स्थानीय स्तर पर स्कूल के प्रधानाध्यापक की बनती है. लेकिन ज़िला स्तर पर सुप्रीम कोर्ट के अनुसार भूख से होने वाली मौतों के लिए मुख्य सचिव, ज़िला अधिकारी, खण्ड विकास अधिकारी और पंचायत के मुखिया को जिम्मेदार माना जाता है.

स्कूल में पहली जवाबदेही वहां के प्रधानाध्यापक, शिक्षक, मिड डे मील के प्रभारी और जिला शिक्षा अधिकारी की जवाबदेही बनती है.

बिहार में मिड डे मील में बच्चों की मौत

बिहार के छपरा ज़िले में मध्याह्न भोजन खाने से 22 बच्चों की मौत हो गई है

छपरा के प्राथमिक स्कूल में बच्चों को क्या खाना परोसा गया था?

उस दिन बच्चों को आलू और सोयाबीन की सब्जी के साथ चावल खाने को दिए गए थे. इसमें सब्जी में फास्फोरस की मात्रा होने की बात सामने आ रही है. उस दिन स्कूल में अकेली शिक्षिका थी.

स्कूल पंचायत के विकास भवन में संचालित होता है. अनाज को रखने के लिए कोई व्यवस्था स्कूल में नहीं है. स्कूल में सुविधाओं की कमी साफ़ दिखाई देती है. अगर स्कूल की मॉनिटरिंग की उचित व्यवस्था होती तो इस हादसे को रोका जा सकता था.

बच्चों को गरम खाना देने की जगह पैकेज्ड फूड देना कितना बेहतर होगा?

इस बात को लेकर काफी विवाद हुए. लेकिन अंततः गरम खाना देने की बात मानी गई, क्योंकि पैकेज्ड फूड में पोषण की पर्याप्त मात्रा नहीं मिल पाएगी. इसलिए पका हुआ और गर्म खाना देने की बात कही गई है.

इस बारे में सुप्रीम कोर्ट ने भी बच्चों को स्कूल में गरम खाना देने की बात कही है. मध्याह्न भोजन योजना का उद्देश्य ही बच्चों को पोषण वाला भोजन देना है. अतिकुपोषित बच्चे भी स्कूल में आते हैं. बहुत सारे बच्चे स्कूल में ऐसे परिवारों से आते हैं, जिनके घर पर एक वक़्त खाना बनता है.

बाकी राज्यों में मिड डे मील योजना सफलता के साथ कैसे चल रही है?

तमिलनाडु में यह कार्यक्रम निगरानी और आधारभूत संरचना के कारण सफल है. लेकिन बिहार में इसका पर्याप्त अभाव है. तमिलनाडु, केरल और आंध्र प्रदेश में अच्छी व्यवस्था चल रही है. लेकिन केंद्रीकृत रूप से बने खाने में भी काफी कमियां है.

सुबह पांच बजे का बना खाना दोपहर को दो बजे बच्चों के पास पहुंचता है. बच्चे ऐसे खाने को खाते नहीं फेंक देते हैं. इसलिए मूल बात है कि सरकार को स्कूल में पर्याप्त सुविधा देनी चाहिए. बच्चों को परोसे गए भोजन की गुणवत्ता और निगरानी के ऊपर राज्य सरकार को पर्याप्त ध्यान देना चाहिए.

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