नरेंद्र मोदी प्रधामनंत्री बने तो श्रेय मनमोहन, सोनिया, राहुल को

  • 14 जुलाई 2013
नरेंद्र मोदी

पहली बात तो यह स्पष्ट करना ज़रूरी है कि वाणी का संयम और सौम्य भाषा का प्रयोग नरेंद्र मोदी के बहुचर्चित और बहुविज्ञापित गुणों में से नहीं है.

मगर बाक़ी लोग जो प्रगतिशील और धर्मनिरपेक्ष मिज़ाज के हैं और वे जो ख़ुद को जनतांत्रिक कहते हैं, वे मोदी को दानव समझते हैं.

तो क्या आप जिसे दानव के रूप में प्रोजेक्ट कर रहे हैं, उसके बारे में आप यह उपेक्षा करते हैं कि उसके स्वर सुरीले, मधुर और सौम्य होंगे?

इसके बावजूद कुछ आपत्तिजनक बातें बची रह जाती हैं कि यदि आप गाड़ी में होते हैं और आप ड्राइवर की सीट पर नहीं भी बैठे होते हैं तो गाड़ी के मालिक या टैक्सी पर चलने वाले की ज़िम्मेदारी होती है कि वह यह आश्वस्त कर ले कि ड्राइवर किस तरह से गाड़ी चला रहा है, वह लाइसेंसशुदा है कि नहीं.

सत्तारूढ़ पार्टी

गुजरात दंगे
गुजरात के दंगों में मारे गए ज्यादातर लोग अल्पसंख्यक समुदाय के थे.

मोदी का ये इंटरव्यू उनके बारे में कोई नई जानकारी नहीं देता है. कांग्रेस के संजय झा ने अपनी टिप्पणी में कहा है कि इतने सारे 'डॉग लवर्स' और 'ह्यूमन राइट्स एक्टिविस्ट' हैं और अगर मरना ही था तो लोग सड़क पर भूखे मर जाएँ.

जिस देश में सत्तारूढ़ पार्टी से जुड़ा एक व्यक्ति यह कहता हो कि जानवर की तरह कार के नीचे दबकर मरने से बेहतर है कि आदमी सड़क पर भूखा मर जाए तो उसको इंसान की तरह मरना नहीं कहते.

वह भी मिट्टी ख़राब होना ही कहलाता है और इस देश में खाते-पीते लोग मँहगी गाड़ियों से चढ़कर आम लोगों पर रौब दिखाते हैं. मोदी ने 'कुत्ते का बच्चा' शब्द का इस्तेमाल किया था. लेकिन मोदी तो कह सकते हैं कि हिंदी मेरी मातृभाषा नहीं है और फिर कु्ते का बच्चा तो कोई गाली भी नहीं है. कु्त्ते का बच्चा तो बहुत ही न्यूट्रल शब्द है.

हिंसा पर रोकथाम

कहीं न कहीं उन तर्कों में दम तो ज़रूर होगा. आप यह नहीं कह सकते कि चित्त भी मेरी पट्ट भी मेरी. ऐसा लगता है कि मोदी अगर कुछ नहीं कहते, मौन रहते तब भी विवाद होता. वो कुत्ते का बच्चा या कुत्ते का पिल्ला की जगह कुछ और कहते तब भी विवाद होता.

क्योंकि कांग्रेस के पास अपनी प्राण रक्षा के लिए इस शत्रु के अलावा कुछ और बचा ही नहीं है. बाहर से सीमा पर आक्रमण होते जा रहे हैं. नक्सलवादी हिंसा पर रोकथाम नहीं हो पा रही है. जिन बैसाखियों पर कांग्रेस टिकी है बसपा और द्रमुक के भ्रष्टाचार पर भी कुछ नहीं किया जा रहा है.

जहाँ तक मोदी के बयान पर कांग्रेस, सपा या वामपंथियों के विरोध की बात है सच तो यह है कि मोदी तो सबके निशाने पर हैं. चिंता की बात तो यह है कि कोई मोदी की निंदा करे, उन्हें खलनायक माने लेकिन उनके विपक्ष में जो विकल्प हैं, वे दूध के धुले तो हैं नहीं. यह तो दैत्य दानव वाला संघर्ष हो गया न.

खाद्य सुरक्षा कानून

सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी और उसके सहयोगी

कांग्रेस उतनी ही दोषी, कलंकित, जनतंत्र विरोधी, फ़ासीवादी, कुनबापरस्त और भ्रष्ट है जितने शायद नरेंद्र मोदी. रही बात नफ़े नुक़सान की तो मुझे लगता है कि यह नरेंद्र मोदी को उनके अपने किए और कहे से नहीं होगा.

नफ़ा नुक़सान उन्हें जितना भी होना होगा या उनका तिलक दिल्ली के प्रधानमंत्री के रूप में होगा, इसका श्रेय मनमोहन सिंह, सोनिया गाँधी, राहुल गाँधी और उनके दरबारियों को देना होगा. केवल मोदी का इंटरव्यू ही चुनाव से जुड़ा हुआ नहीं है बल्कि जो कुछ भी घट रहा है उन सब के पीछे कहीं न कहीं चुनाव की आहट सुनी जा सकती है.

2014 की तैयारी केवल इस इंटरव्यू के विज्ञापन से नहीं हो रही है. इसके साथ ही क्या कांग्रेस का खाद्य सुरक्षा क़ानून, या रायबरेली में हो रहे ढेर सारे नए विश्वविद्यालयों के पीछे चुनाव नहीं हैं. इसमें ग़लत क्या है. लोकतंत्र है, चुनावी पार्टियाँ हैं और चुनावी इस्तेमाल के लिए कुछ कहना या करना लोकतंत्र के लिए बुनियादी गतिविधि है.

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