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162 साल के बूढ़े तार की मौत

 रविवार, 14 जुलाई, 2013 को 09:57 IST तक के समाचार

162 साल पुराने तार की मौत

  • टेलीग्राम, तार, 15 जुलाई, इतिहास, फोटो गैलरी

    राजधानी दिल्ली में मोर्स कोड की मशीनों का इस्तेमाल 1970 के दशक तक चला. इसके बाद उनकी जगह दूसरी तकनीकों ने ले ली. दिल्ली के वार म्यूज़ियम में रखी यह मशीन 1915 की है. इसका इस्तेमाल द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान तार भेजने में हुआ था.

    1830 से 1840 के दशकों में सेम्युअल मोर्स ने लंबी दूरी के बीच संचार के लिए एक तकनीक विकसित की, जिसके तहत इलेक्ट्रिक सिग्नलों को एक तार के ज़रिए दूसरी जगह पहुंचाया जाता था. मोर्स ने इसके लिए एक कोड तैयार किया. इसमें अंग्रेज़ी के हर शब्द के लिए डैश और डॉट का इस्तेमाल होता था. डैश की अवधि एक डॉट के समय से तीन गुना ज़्यादा होती थी. इसी की मदद से सेम्युअल मोर्स ने 1844 में अमरीका में वाशिंगटन डीसी से बाल्टीमोर के बीच पहला टेलीग्राफ़ संदेश भेजा. बाद में तार के लिए इसी मोर्स कोड मशीन का इस्तेमाल किया जाने लगा.

    मोर्स पद्धति अभी भी गोपनीयता बनाए रखने के लिए सेना और नेवी में इस्तेमाल होती है. माना जाता है कि इसे डिकोड करना आसान नहीं है. असल में मोर्स कोड पद्धति वायरलेस संचार की आधारशिला रही है और संचार के साधनों में यह सबसे ज्यादा वक्त तक चलने वाली तकनीक भी है.

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    यह वह तार है जिसके ज़रिए पहली बार ईस्ट इंडिया कंपनी के शासकों ने बग़ावत की खबर दूसरे स्टेशनों तक पहुंचाकर अपनी फ़ौजों को ख़बरदार किया. 10 मई 1857 के इस तार में डिप्टी कमिश्नर की तरफ़ से पंजाब के चीफ़ कमिश्नर सर जॉन लॉरेंस को बताया गया है कि -

    'आज सुबह 60वीं और 5वीं रेजीमेंटों के सिपाही हथियारबंद थे और उत्तेजित थे. कैवेलरी और आर्टिलरी को आदेश दिया गया. ख़जाने पर लगाए गए गार्ड भी हथियारों के साथ थे और काफ़ी उत्तेजित थे. मैंने पुलिस को तैयार रहने और अपनी जगह रहने को कहा है. मैंने जनरल से सलाह-मश्विरा किया है. उन्होंने 5वीं रेजीमेंट के एक अफ़सर को ट्रेज़री गार्ड को बर्खास्त करने और उन्हें लाइन भेजने के लिए कहा है. जनरल आपकी इजाज़त के बग़ैर कोई आदेश नहीं देंगे. मेरे ख़्याल से अगर कोई और गड़बड़ नहीं होती तो यह क़दम उठाने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी.'

    संयोग ही है कि 1857 से कुछ पहले ही भारत में टेलीग्राम और रेल का आगमन हुआ था और डाक व्यवस्था को भी ठोस स्वरूप दिया गया था. 1857 में यह तीनों साधन अंग्रेजों के लिए बहुत मददगार रहे.

    1857 में बोर्ड आफ रिवेन्यू के वरिष्ठ सदस्य ई ए रीड, उत्तर पश्चिमी प्रांत के लेफ्टीनेंट गवर्नर जे आर कॉल्विन, भारत सचिव जी एफ एडमंस्टन, दिल्ली के कमिश्रर साइमन फ्रेजर, आगरा के कमिश्रर आर सिम्पसन समेत कई सेनाधिकारियों के पास पहुंचे या उनकी तरफ़ से भेजे गए रोजमर्रा के तारों से पता चलता है कि संचार के सारे रास्ते अवरुद्ध थे. पूरा इलाका बग़ावत की चपेट में था. ऐसे में तेज़ रफ़्तार तार ने अंग्रेजों को काफ़ी मदद पहुंचाई.

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    1857 के विद्रोह के दौरान 11 मई को ईस्ट इंडिया कंपनी के हुकमरानों ने यह टेलीग्राम अंबाला से सभी टेलीग्राफ़ स्टेशनों को भेजा था. इसमें मेरठ और दिल्ली की घटनाओं का ज़िक्र किया गया है.

    इसमें लिखा गया था – दिल्ली से अभी-अभी यह ख़बरें मिली हैं कि हमें जल्द से जल्द दफ़्तर छोड़ देने होंगे, क्योंकि मेरठ के सिपाहियों ने सभी बंगले जला दिए हैं. वे इस सुबह यहां आए थे.. हमें लगता है कि एमसी टॉड की मौत हो चुकी है. एसी आज सुबह निकले थे लेकिन अभी तक नहीं लौटे हैं. हमें पता चला है कि कई यूरोपियन मारे जा चुके हैं. अलविदा.

    इस तार को भेजने के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी ने तीन अहम काम किए. सबसे पहले तोपखाना नियंत्रण में लिया गया और फिर हथियारबंद सैनिकों के हथियार जमा कराए गए. सोच यह थी कि कहीं सिपाई इसका इस्तेमाल अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ न कर सकें. इसके बाद कंपनी ने अपनी सेनाएं विद्रोह के इलाक़ों में भेजना शुरू किया. तब कुछ सेनाएं बर्मा की राजधानी रंगून और चीन जा रही थीं. उन्हें वापस बुलाकर विद्रोह के इलाक़ों में भेजा गया. इसी के साथ कुछ और तार भेजकर स्थानीय शासकों से मदद मांगी गई.

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    लखनऊ की बेगम हजरत महल की मौजूदगी के बारे में यह टेलीग्राम 1857 में आगरा के इलेक्ट्रिक टेलीग्राफ़ ऑफ़िस की तरफ़ से भेजा गया था. इस टेलीग्राम के ज़रिए पंजाब के लेफ्टिनेंट गवर्नर जनरल को ख़बर दी गई. इसमें लखनऊ की बेगम हज़रत महल को नेपाल ले जाने की सूचना भेजी गई थी.

    नवाब वाज़िद अली शाह की पहली पत्नी बेगम हज़रत महल ने 1857 में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के ख़िलाफ़ बग़ावत कर दी थी. यहां तक कि उन्होंने अपने बेटे बिरजीस क़दर को अवध की कमान भी सौंप दी थी. मगर यहां तार अंग्रेज़ों के काम आया. टेलीग्राम के ज़रिए यह ख़बर एकदम दूसरे स्टेशनों तक पहुंचा दी गई. बेग़म को नेपाल भागने पर मजबूर करने के साथ ही ईस्ट इंडिया कंपनी ने लखनऊ के साथ-साथ तकरीबन पूरे अवध पर फिर कब्जा़ कर लिया. हज़रत महल ने नेपाल के शासक राणा जंग बहादुर से शरण मांगी. बाद में नेपाल में ही उनकी मौत हुई.

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    1948 में कलकत्ता (आज के कोलकाता) से बांग्लादेश के नोआखाली इलाके (तब पूर्वी पाकिस्तान) भेजे गए इस टेलीग्राम में एक कोर्ट केस की ख़बर दी गई है. तार भेजने वाले हबीब दाऊद ने इसमें ख़बर दी है कि –

    'आखिरी सुनवाई, एक हज़ार रुपए के नोट के साथ आएं. पहले पहुंचें वरना अफ़सर मनचाहा आदेश पारित कर देंगे.'

    आज़ादी मिलने से लेकर अब तक तार का इस्तेमाल अदालती कार्यवाहियों के लिए होता रहा है. सरकार अभी तक कोर्ट नोटिसों के लिए और नागरिक पुरस्कार पाने वाले लोगों को टेलीग्राम के ज़रिए सूचित करती रही है. वकील सरकारी रिकॉर्ड रखने के लिए तार का इस्तेमाल करते रहे हैं. मिसाल के लिए इसके ज़रिए वो जज के सामने यह भी साबित करते हैं कि उनका मुवक्किल पुलिस की यातना झेल रहा है. इसके अलावा सैनिकों की छुट्टियां मंज़ूर-नामंज़ूर करने से लेकर उनके परिवारों को उनकी सलामती की ख़बर देने तक तार ही अकेला ज़रिया रहा है.

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    भारत और पाकिस्तान के विभाजन के बाद तारघरों का भी बंटवारा हुआ. मगर कुछ वक़्त तक भारत के टेलीग्राफ़ विभाग पर पाकिस्तान की मुहर भी लगाई जाती रही. ऐसे टेलीग्राम भी मौजूद हैं जिन पर आधे हिस्से में भारत और आधे में पाकिस्तान का नाम रहता था. 1950 के दशक तक ऐसा ही चलता रहा.

    हालांकि 15 अगस्त 1947 को लाहौर में पोस्टमास्टर जनरल का ओहदा बना दिया गया था लेकिन पाकिस्तान की नई सरकार ख़ुद को स्थायी रख पाने में ही इतनी उलझी थी कि ब्रिटिश ज़माने के डाक टिकट और टेलीग्राम ही जारी थे. दोनों के पोस्ट एंड टेलीग्राफ़ विभाग भी कुछ वक्त तक संयुक्त ही रहे.

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    जब डाकटिकटों का चलन शुरू हुआ तो टेलीग्राम के लिए कुछ डाकटिकट अलग से निकाले गए. इन्हें तार संदेश के दूसरी तरफ़ लगाया जाता था. दो आना से लेकर 25 रुपए तक ऐसे कई डाक टिकट थे जो सिर्फ टेलीग्राम के लिए इस्तेमाल होते थे. सरकार को ज़्यादा राजस्व तार पर इस्तेमाल होने वाले डाक टिकटों से ही होता था, क्योंकि उसकी कीमत आम डाक से ज़्यादा होती थी.

    कई डाक टिकटों में इनमें रानी विक्टोरिया के अलावा जॉर्ज पंचम के चेहरों का इस्तेमाल किया गया था.

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    टेलीग्राम के लिए लोकप्रिय शब्द 'तार' ने डेढ़ सौ साल से ज़्यादा वक़्त तक करोड़ों लोगों की भावनाओं, रिश्तों की गर्मी और यक़ीनन उनके दुखों की नुमाइंदगी की. और यह सब कोड के तहत लिखे गए चंद अल्फ़ाज़ के ज़रिए.

    यहां तक कि बड़े मायने में तार हिंदुस्तान में कारोबार में तरक्की की वजह भी बना. इसी तार के ज़रिए बड़े-बड़े कारोबारी सौदे होते थे. बैंकरों ने इसका काफ़ी इस्तेमाल किया. औद्योगिक विकास में तार की अहमियत को व्यापारी भी जानते थे. मिसाल के लिए इस तार में ऐसे ही एक सौदे का ज़िक्र किया गया है.

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    मीडिया के लिए 1882 में प्रेस टेलीग्राम शुरू किए गए. इसके पीछे मक़सद ख़बरों को जल्द से जल्द प्रकाशित करना था. इन इनलैंड टेलीग्राम की वजह से छोटे और बड़े अखबारों दोनों को ही काफ़ी मदद मिली क्योंकि तब तक रेल के अलावा संचार के साधन मौजूद नहीं थे. अख़बारों के लिए अलग से प्रेस रूम बनाए गए. ख़बरें लोगों तक जल्द से जल्द पहुंचने लगीं.

    ये इनलैंड प्रेस टेलीग्राम ख़ास वक़्त के लिए जारी किए जाते थे और इनके ज़रिए संवाददाता मुफ़्त में ख़बर भेज सकते थे और तार के पैसे का भुगतान बाद में अख़बार प्रबंधन की तरफ़ से सरकार को बाद में किया जाता था.

    बाद में दूसरे संचार साधनों के आने के बाद प्रेस टेलीग्राम का चलन धीरे-धीरे कम होता गया.

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    आज़ादी के बाद टेलीग्राम का एक इस्तेमाल ग्रीटिंग के बतौर भी किया जाने लगा. ये तुरंत पहुंचने वाले ग्रीटिंग थे, जिनमें लोग जन्मदिन, शादी-विवाह, बच्चों के जन्म, नौकरी मिलने जैसे शुभ समाचार भेजा करते थे.

    ग्रीटिंग्स के इस्तेमाल के लिए बाद में राज्यों ने अपने-अपने तार भी जारी किए. ग्रीटिंग के लिए भेजे जाने वाले आर्डिनरी तार के लिए पहले दस शब्दों के लिए साढ़े तीन रुपए और एक्सप्रेस तार भेजने के लिए दुगनी कीमत वसूली जाती थी.

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    राजधानी दिल्ली के अंतर्राज्यीय बस अड्डे से कुछ मीटर दूर मौजूद है टेलीग्राफ़ मैमोरियल. एक पुरानी ब्रिटिश इमारत के साथ ही यहां एक मैमोरियल लगाया गया था, जिस पर उन टेलीग्राफ़ कर्मचारियों के नाम खुदे हैं जिनकी 1857 के ग़दर के दौरान विद्रोहियों ने हत्या कर दी थी. इस पर लिखा है -

    * 1857 का दिल्ली टेलीग्राफ़ ऑफ़िस इस पोस्ट से 2415 गज दूर 31 डिग्री उत्तर पश्चिम में मौजूद था.

    * 9 अप्रैल 1902 को इसे टेलीग्राफ़ विभाग के सदस्यों ने 11 मई 1857 के दिन दिल्ली टेलीग्राफ़ ऑफ़िस स्टाफ़ की वफ़ादारी और यादगार सेवाओं के लिए खड़ा किया. उस दिन दो नौजवान सिग्नेलर विलियम ब्रैंडिश और जे डब्ल्यू पिल्किंगटन अपनी ड्यूटी पर तब तक जमे रहे जब तक उन्हें वहां से हटने को नहीं कहा गया. दिल्ली में हो रही घटनाओं की जानकारी अंबाला भेजकर उन्होंने पंजाब सरकार को अपनी अमूल्य सेवाएं दीं. सर रॉबर्ट मॉन्टगोमरी के शब्दों में – इलेक्ट्रिक टेलीग्राफ़ ने भारत को बचाया.

    * 11 मई 1857 की सुबह दिल्ली टेलीग्राफ़ ऑफ़िस स्टाफ़ के असिस्टेंट इनचार्ज चार्ल्स टॉड यमुना नदी के बाएं किनारे पर केबल हाउस के पास मेरठ से टेलीग्राफ़िक संचार को जोड़ने की कोशिश में मारे गए.

    सिग्नेलर डब्ल्यू ब्रैंडिश 1 सितंबर 1885 को रिटायर हुए. सिग्नेलर जे डब्ल्यू पिल्किंगटन ख़ुद फ़्लैग स्टाफ़ टावर से टेलीग्राफ़ ऑफ़िस पहुंचे और कमांडर इन चीफ़ को बग़ावत की पूरी ख़बर भेजी. इस क़दम के बाद उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया लेकिन वो भाग निकले. 24 मार्च 1867 को उनकी मृत्यु हुई.

    * टेलीग्राफ़ विभाग में विद्रोह के दौरान हुई मौतें

    दिल्ली – चार्ल्स टॉड

    कानपुर – हेनरी फार्मर, एडविन ब्रियरली, थॉमस डॉज़ेंस, बैग्निस स्केलॉन, थॉमस गुडिंज

    लखनऊ – विलियम रैमसे, जॉन डेवेयर

    इंदौर – जेम्स बटलर, थॉमस ब्रूक, विलियम एवरी, डेविड बोन

    शांदा – जी आर गार्टलान, जे हॉल

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