वो ख़ूबसूरत गांव जो अब भुतहा बन गया है

  • 9 जुलाई 2013
मन्दाकिनी नदी का किनारा

कभी इस इलाक़े में चहल पहल रहा करती थी. खूबसूरत पहाड़ियाँ, खेत खलिहान, पेड़, फल और फूल के अलावा नदी का किनारा इस जगह की रौनक में चार चाँद लगा दिया करता था.

केदारनाथ धाम की यात्रा करने वाले श्रद्धालुओं को कभी राहत देने वाला ये पड़ाव, आज सुनसान है और उफान पर बह रही मंदाकिनी नदी की आवाज़ इसे और ख़ौफ़नाक बना रहीं हैं.

ये गाँव अब भुतहा हो गया है क्योंकि यहाँ अब कोई नहीं रहता. सारे मकान वीरान पड़े हैं. अलबत्ता कुछ लोग जो नज़र आते हैं ये वो हैं जो इन मकानों से अपना बचा-खुचा सामान ले जा रहे हैं.

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मन्दाकिनी नदी के किनारे बसे गाँव अब खाली हैं

मंदाकिनी नदी के किनारे बसा सुमाडी गाँव, तिलवाड़ा से लगा हुआ है जहाँ 16 जून की बारिश के बाद मंदाकिनी नदी ने जमकर तबाही मचाई. इस इलाक़े में नदी के किनारे बसे कई मकान और मंदिर बह गए.

आज इस टोले के 100 से ज्यादा घर वीरान पड़े हुए हैं. इनमे रहने वाले लोग अब भाग कर ऊपरी इलाक़ों में चले गए हैं.

रुद्रप्रयाग और गुप्तकाशी के बीच ये इलाक़ा व्यवसाय का प्रमुख केंद्र हुआ करता था. मगर उफान पर बस रही मंदाकिनी नें लोगों में ख़ौफ़ पैदा कर दिया है.

अमरीकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा की सैटेलाइट तस्वीरों से पता चलता है कि 16 जून की तबाही के बाद मंदाकिनी नें इस इलाक़े में अपना रास्ता भी बदल दिया है जिस वजह से भूस्खलन का खतरा और भी बढ़ गया है.

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नदी के तेज बहाव में मकान और मंदिर बह गए

नदी के तेज़ बहाव में जो मकान और मंदिर चपेट में आए, वो तो बह गए. मगर मिट्टी में कटाव के कारण इलाक़े के बचे रह गए मकान असुरक्षित हो गए हैं जो किसी भी दिन गिर सकते हैं.

सुमाड़ी के रहने वाले राजेंद्र प्रसाद ने बताया कि गाँव के लोग उपरी इलाक़ो में जाकर दूसरे गांवों में किराए पर रह रहे हैं. उन्होंने बताया कि 25 मकान तो बह गए लेकिन जो बचे हैं वे भी अब रहने लायक नहीं.

इस इलाक़े में जान का उतना नुकसान नहीं हुआ, क्योंकि जब केदारनाथ घाटी में तबाही मचाते हुए नदी मलबा लेते हुए आगे बढ़ रही थी तब यहाँ रहने वाले लोगों को फ़ोन से उनके रिश्तेदारों नें पहले ही सतर्क कर दिया था.

इसी इलाक़े के शरत सिंह नेगी का कहना है कि ऊपरी गाँवों में भी अब रहने की जगह नहीं है. वो कहते हैं, "इतने लोग बेघर हुए हैं कि अब इनके रहने के लिए भी कोई जगह नहीं है."

सुमाड़ी के लोगों का कहना है कि सरकार ने इनके पुनर्वास के लिए अब तक कोई पहल नहीं की है.

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ज्यादातर मकानों पर खतरा मंडरा रहा है

उत्तराखंड पुलिस में काम कर रहे देवेंद्र उचौली हादसे के वक़्त बद्रीनाथ में ड्यूटी पर थे. मोहल्ले वालों के सहयोग से उनके घर के लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहुँचाया गया. वो आनन-फानन में भागकर गाँव आए. अब वो ऊपर के एक गाँव में मकान किराए पर लेकर परिवार के साथ रह रहे हैं.

उचौली कहते हैं कि सरकार की तरफ से उन्हें सिर्फ चने की सौगात दी गई जबकि उनके सामने सबसे बड़ी चिंता है सिर छुपाने की.

गांव में जो घर बचे रह गए हैं, उनकी दीवारों में बड़ी-बड़ी दरारें पैदा होनी शुरू हो गई हैं. लगातार हो रही वर्षा ने लोगों की चिंता और बढ़ा दी है.

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नदी किनारे बसे तमाम मकान खतरे में हैं

ऐसे में बचे हुए मकान कितने दिनों तक टिके रहेंगे, कोई नहीं कह सकता. मगर सरकार इन दरके हुए घरों को 'पूर्ण क्षति' के रूप में नहीं देखती.

आपदा में बेघर हुए सैकड़ों लोग अपने आप को बेबस महसूस कर रहे हैं. अलबत्ता सिर्फ सुमाड़ी ही नहीं, जिस हिसाब से तिलवाड़ा से मंदाकिनी नदी नें अपना रुख बदला है उससे तिलवाड़ा जैसे छोटे से कस्बे पर ही ख़तरा मंडराने लगा है.

वैसे भी रुद्रप्रयाग से यहाँ आने वाली सड़क ध्वस्त हो चुकी है और अब यहाँ आने के लिए 40 किलोमीटर का सफ़र तय करना पड़ रहा है जबकि इसकी दूरी जिला मुख्यालय से सिर्फ नौ किलोमीटर की है.

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