जब मिल्खा ने बर्तन धोए और सड़कों पर सोए

  • 3 जुलाई 2013
मिल्खा सिंह

राष्‍ट्रीय मार्ग नंबर 1 पर मेरी टैक्सी तेज़ धूप और उमस को चीरती हुए तेज़ी से चंडीगढ़ की ओर बढ़ रही थी. हालांकि टैक्सी वातानुकूलित थी लेकिन गर्मी इतनी ज़्यादा थी एयरकंडीशनर भी बार-बार रुककर बाहर की उमस का अहसास करा रहा था.

फ्लाइंग सिख यानी मिल्खा सिंह से मिलने चंडीगढ़ जाना मेरे लिए नई बात नहीं थी. लेकिन वो ज़माना और था, जब मिल्खा सिंह पंजाब के खेल निदेशक थे और एथलेटिक्स छोड़े उन्हें कुछ ही समय हुआ था. अचानक मुझे लगा की अब जब वो 80 पार कर चुके हैं, क्या भरी दोपहर मे उन्हें तकलीफ़ देना ठीक होगा?

हालांकि एक दिन पहले ही मैं उन्हें अपने आने के बारे में बता चुका था लेकिन फिर भी मुझे फ़िक्र हो रही थी. चंडीगढ़ शहर में घुसते ही मैंने उनके नए घर का रास्ता पूछने के लिए फोन लगाया. दूसरी ओर से भर्राई आवाज़ मे जब मिल्खा सिंह ने 'हैलो' कहा तो लगा जैसे लोकप्रिय गायक मन्ना डे से बात हो रही हो.

गर्मजोशी

नौरिस प्रीतम के साथ मिल्खा सिंह
मिल्खा सिंह आत्मीयता से मिलते हैं

उनके सेक्टर में पहुँचने के बाद फिर हमें दिशा जानने की जरूरत हुई. एक पेड़ के नीचे कपड़े प्रेस करने वाले से पूछने के लिए मेरे मुंह से सिर्फ 725 ही निकला था की वो बोल पड़ा, "मिल्खा जी के घर के लिए आगे से बाएं मुड़ जाएं, तीसरी कोठी उनकी ही है." जल्दबाज़ी में मैं प्रेसवाले से यह नहीं पूछ पाया कि उसे एथलेटिक्स का शौक है या ये आने वाली फिल्म 'भाग मिल्खा भाग' का असर है!

कोठी नंबर 725 के गेट पर तैनात गार्डों को मेरे आने के बारे में जानकारी थी, इसलिए मुझे कोई दिक्कत नहीं हुई. उनके ड्राइंग रूम में घुसते ही सैकड़ों मेडल और ट्रॉफियां दिखाई दीं जो उनके बेहतरीन एथलेटिक्स करियर की गवाही दे रहे थे.

एक कमरे से निकलकर मिल्खा सिंह आए और गर्मजोशी से स्वागत किया. मिल्खा की आत्मीयता ने रास्ते की धूप और गर्म लू को बर्फीली हवाओं में बदल दिया. मिल्खा छूटते ही बोले क्या पीओगे? बियर? मैंने 'हाँ' कहते हुए पहले अपने बढ़ते पेट और फिर मिल्खा के समतल पेट की ओर देखा. लगा ही नहीं मैं किसी 80 साल के इंसान से रुबरु हूँ.

मैंने शरमाते हुए बियर पी तो ली लेकिन खुद से इस वादे के साथ कि दिल्ली वापस जाते ही अपने पेट का इलाज करूंगा!

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'भाग मिल्खा भाग'

फिर बियर के घूँटों के बीच मिल्खा से बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ. समझ ही नहीं आ रहा था कि क्या बात करूं. इतना सब तो उन पर लिख और पढ़ चुका हूँ. सोचा क्यों ना उनके जीवन पर बनी और जल्द रिलीज होने वाली फ़िल्म 'भाग मिल्खा भाग'पर बात की जाए?

फ़िल्म की बात शुरू होते ही उनकी आंखों की चमक देख कर लगा कि 'भाग मिल्खा भाग' ने उन्हें एक बार फिर 60 के दशक मे ला खड़ा किया है. वो फरहान अख़्तर की तारीफ़ करते नहीं थके और एक के बाद एक फ़िल्म मे दिखाए गए उनकी ज़िंदगी के किस्से सामने आने लगे.

कैसे वो लाहौर से ट्रेन के ज़नाना डिब्बे में बर्थ के नीचे छुप कर दिल्ली पहुँचे और कैसे उन्होंने पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन के सामने फ़ुटपाथ पर बने ढाबों मे बर्तन साफ़ किए ताकि कुछ खाने को मिल सके- बचा खुचा ही सही.

मिल्खा ने बताया कि कैसे वो और उनकी पत्नी निर्मल, फरहान अख़्तर और फिल्म के निर्देशक राकेश ओम प्रकाश मेहरा के साथ फ़िल्म देख कर रो पड़े थे.

अभी बात चल ही रही थी कि साथ के कमरे से आवाज़ आई कि 'सरदार जी, ज़रा नॉरिस को अंदर भेजें'. पाँव की हड्डी के फ्रेक्चर के बाद उनकी पत्नी निर्मल दो महीने से बिस्तर पर हैं. उन्होंने पहले तो मुझे गले से लगाया और फिर बोली कि 'मुझे तो फरहान से प्यार हो गया है!'

भाग मिल्खा भाग
मिल्खा सिंह 'भाग मिल्खा भाग' को लेकर खासे उत्साहित हैं

वो बोलीं, "उसे लड़के ने ऐसी एक्टिंग की है कि मुझे सरदार जी की जवानी याद आ गई." निर्मल अपने पति को 'सरदार जी' बुलाती हैं जबकि वे उन्हें मामा कहते हैं. यह उन्होंने अपने बच्चों से सीखा है.

मिल्खा ने बताया कि उन्हें आज के फिल्म अभिनेताओं के बारे में कुछ पता नहीं था. बस उनके गॉल्फर बेटे जीव मिल्खा सिंह ने कहा कि राकेश ओम प्रकाश मेहरा अच्छे निर्देशक हैं इसलिए 'हाँ' कर दी और फिर फ़िल्म की शूटिंग शुरू हो गई पैसे लिए-दिए बिना.

लेकिन ऐसा नहीं है कि मिल्खा का फ़िल्मों से कोई सरोकार नहीं है. नर्गिस और मधुबाला के नाम पर वे मुस्करा दिए. शायद उन्हें भी अपनी जवानी याद आ गई थी. उन्होंने बताया कि कैसे राज कपूर मुंबई में उनकी रेस देखने अक्सर आते थे.

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भारत रत्न की माँग

भाग मिल्खा भाग
'भाग मिल्खा भाग' में फरहान अख्तर मिल्खा सिंह बने हैं

थोड़ी देर बाद निर्मल थोड़ी कड़क हो गईं. पूछा कि क्या सरदार जी को भारत रत्न नहीं मिलना चाहिए? मैंने भी सोचा अगर किसी एथलीट ने देश को इतना नाम दिलाया और आज 50 साल बाद फिर फ़िल्म के ज़रिए सुर्खियों मे है तो उसका हक़ तो बनता ही है.

तभी निर्मल बोलीं कि कई साल पहले सरदार जी का नाम राज्य सभा के लिए भी आया था. पंजाब सरकार ने सीट की पेशकश की थी. लेकिन गृह मंत्रालय के एक अफ़सर ने उनकी एप्लीकेशन पर यह लिख दिया था कि संविधान में खिलाड़ियों को राज्यसभा भेजने का प्रावधान नहीं है.

लेकिन निर्मल को ये समझ नहीं आया कि सचिन तेंदुलकर और दिलीप टिर्की को कैसे ये सम्मान मिल गया. मैं भी खामोश सोच रहा था उन्हें क्या जवाब दूं, तभी मिल्खा बोले, "मामा, हुन तुसी येह गल्ला छाड़ दो." और तब एक बार फिर मैं मिल्खा की ज़िंदगी मे झाँकने की कोशिश करने लगा.

फ्लाइंग सिख मिल्खा सिंह के खिलाफ एफआईआर

अतीत

फ़िल्म मे भारत के विभाजन के शॉट के बारे में मिल्खा ने बताया कि उन्हें उन लोगों से कोई शिकवा नहीं जो पाकिस्तान मे उनके गाँव मे रहते थे. 80 साल के बाद भी उनकी याददाश्त ज़बरदस्त है.

उन्हें याद है कि सिखों के गाँव वाले मुसलमानों की शादियों में जाते थे और वो लोग सिखों के त्योहारों पर आते थे. लेकिन जो मार काट हुई वह तो वहाँ आए कबायली लोगों ने की थी.

और तभी मिल्खा को याद आया कि कैसे 1965 के भारत-पाक युद्ध में बंदी बनाए गए मेजर अब्दुल ख़ालिक़ को मेरठ की जेल में रखा गया था. और जेल में भारतीय जवानों को खेलते और भागते देख कर ख़ालिक़ ने बताया की वो भी धावक हैं और मिल्खा से मिलना चाहते हैं.

ये वही ख़ालिक़ थे जो 60 के दशक मे मिल्खा के सबसे तगड़े प्रतिद्वंदी माने जाते थे. मिल्खा उनसे मिलने मेरठ गए और दोनों गले मिल कर काफी रोए भी. शायद इसी बात को ध्यान मे रख कर ख़ालिक़ को समय से पहले ही छोड़ दिया गया था.

मिल्खा को वो दिन आज भी याद है जब लाहौर के खचाखच भरे स्टेडियम मे उन्होंने ख़ालिक़ को 200 मीटर दौड़ में हुई कांटे की टक्कर में हराया था. जिसे देख कर वहां बैठे पाकिस्तान के राष्ट्रपति जनरल अय्यूब ने उन्हें 'फ्लाइंग सिख' की उपाधि दी थी.

भाग मिल्खा भाग !

सबसे बड़े फैन

नेहरू के साथ मल्खा सिंह
जवाहर लाल नेहरू मिल्खा के बड़े फैन थे

ख़ालिक़ की तरह मिल्खा भी फ़ौज में थे और एथलेटिक्स करियर खत्म होने के बाद फ़ौज से छुट्टी चाहते थे. लेकिन उस समय के सेनाध्यक्ष जनरल केएस थिमैय्या और रक्षा मंत्री कृष्णा मेनन उन्हें फ़ौज से नहीं जाने देना चाहते थे.

तब मिल्खा ने अपने उस फ़ैन से बात की जो उनकी रफ़्तार के कायल थे. और वे थे भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू. और जब नेहरू ने उनकी सिफ़ारिश की तो जनरल थिमैय्या और कृष्णा मेनन के पास कोई चारा नहीं था.

सेना छोड़ने के बाद मिलखा को चंडीगढ़ में पंजाब का डिप्टी डॉयरेक्टर स्पोर्ट्स बनाया गया. उस समय चंडीगढ़ एक सुस्त और कुछ उजड़ा सा शहर था. दुनिया घूमने के बाद मिल्खा वहाँ नहीं रहना चाहते थे.

इसलिए उन्होंने उस समय लाल बहादुर शास्त्री की सिफ़ारिश लगवा कर एक फिएट कार खरीदी और दिल्ली से रोज़ चंडीगढ़ आना-जाना करने लगे. लेकिन आज उसी शहर चंडीगढ़ में कोठी नंबर 725 अपने आप में एक मशहूर लैंडमार्क है.

असली मैडल

बात करते करते मिल्खा आचानक बोले, 'यार तुझे पता है जो मैडल 1960 मे रोम मे मुझे नहीं मिला था वो बाद में मुझे मिल गया?' ये सुनकर मैं चौंक गया. तब वो बोले, 'मेरा सबसे अच्छा मैडल है मेरी वाइफ निर्मल', जिनसे उनकी शादी रोम ओलंपिक के बाद हुई थी.

हालांकि उस समय भारत की वॉलीबॉल टीम की कप्तान निर्मल से उनकी मुलाकात तो थी लेकिन प्यार परवान चढ़ा कोलंबो में, जब दोनों इंडो-सिलोन खेलों मे हिस्सा ले रहे थे.

मैंने पूछा कि पहल किसकी थी, तो वे बोले ताली दोनों हाथ से बजती है. तब निर्मल ने बताया कि वे उनकी बहुत बड़ी फ़ैन थीं और ऑटोग्रॉफ लेती रहती थीं. थोड़ा शर्मा कर बोलीं कि वे थे ही इतने स्मार्ट और पॉपुलर की प्यार तो होना ही था.

जब ये बातचीत चल रही थी, तब कई टीवी और अखबारों के पत्रकार उनसे इंटरव्यू के लिए इंतज़ार कर रहे थे. मिल्खा ने सबसे एक-एक करके बात की और सबको खाना खाकर जाने के लिए कहा.

हालांकि मैं उनकी इस आत्मीयता से वाकिफ हूँ लेकिन ऐसा लग रहा था कि फ़िल्म ने उनके जीवन को नया मोड़ दे दिया है.

मिल्खा सिंह
मिल्खा सिंह 'भाग मिल्खा भाग' देख रो पड़े थे.

प्यारे कुत्ते

वे इंटरव्यू के बीच में घर में ऊपर से नीचे निर्मल का हाल पूछने जाते रहे और फोटोग्राफ़रों के लिए पोज़ देते रहे. इस बीच दो स्याह काले तगड़े लैब्राडॉर कुत्ते भी घर में घूम रहे थे, जो किसी को भी डरा सकते थे.

लेकिन शायद मालिकों के प्यार और गर्मजोशी का असर उन कुत्तों पर भी पूरा पड़ा है. दोनों कुत्ते हर आने वाले की गोद में ज़बरदस्ती बैठ कर और हाथ पाँव चाट कर अपने तरीके से प्यार कर रहे थे.

और तब मेरे विदा लेने का समय आया. लाख मना करने पर भी भरी धूप में मिल्खा मुझे बाहर छोड़ने आए. उन्होंने एक बार फिर प्यार से गले लगाया और ये कह कर रुखसत किया कि भूलना मत, आते रहना.

मैं इस वादे के साथ रुखसत हुआ कि आऊंगा तो जरूर लेकिन अपना पेट घटाकर.

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