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उत्तराखंड: कैमरा लेकर माँ की तलाश में बेबस बेटा

 सोमवार, 1 जुलाई, 2013 को 13:17 IST तक के समाचार
मितेश

मितेश की माँ अब भी लापता हैं

मैं गुजरात का रहने वाला हूँ. मेरी माँ, ममेरा भाई और उनकी पत्नी जून की शुरुआत में चार धाम यात्रा के लिए अहमदाबाद से निकले थे.

चार धामों में से तीसरा था केदारनाथ धाम. वे लोग 15 जून को हेलिकॉप्टर से सुबह वहाँ जाने वाले थे और 16 जून को वापस आने वाले थे. लेकिन 15 तारीख को वहाँ घोड़े वालों की हड़ताल हो गई.

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इस विवाद के कारण हेलिकॉप्टर सेवा भी नहीं चली. उन्हें लगा की यात्रा में बाधा नहीं आनी चाहिए, इस वजह से वे डोली लेकर ऊपर चले गए. उन्होंने मेरी बहन से कहा कि 'चिंता मत करना हम नीचे आकर फोन करेंगे.'

मुझे इस बात का पता नहीं था, वरना मैं उन्हें कभी डोली में जाने नहीं देता. फिर उनसे संपर्क टूट गया. हमें लगा कि माताजी हमारा फोन रिसीव न करें, ऐसा हो नहीं सकता.

मुझे कोई जानकारी नहीं थी कि वहाँ कुछ दिक्कत हुई थी. हमें लगा शायद फ़ोन नेटवर्क ठीक से काम नहीं कर रहा है और शाम को जब वो लौट आएँगे तो बात हो जाएगी.

जब कोई ख़बर नहीं आई तो व्याकुलता बहुत ज़्यादा बढ़ गई. मुझे लगा कि 17 जून को उत्तराखंड की ओर चल देना चाहिए चाहे वहाँ कुछ न हुआ हो. मेरे मन ने कहा कि भले ही कोई छोटी मोटी दिक्कत हो लेकिन मैं ख़ुद वहाँ उन्हें बचाने जाऊँगा.

दिल टूट गया

उत्तराखंड में कई सड़क, पुल टूट गए हैं

17 जून को मैं विमान से दिल्ली पहुँचा लेकिन आगे उड़ान न मिल पाने के कारण दिल्ली में ही फँस गया. मुझे रात भर नींद नहीं आई क्योंकि तब तक ये स्पष्ट हो चुका था कि उत्तराखंड में बड़ी आपदा आई है. हालांकि ये अनुमान नहीं था कि सदी की सबसे बड़ी आपदा आ चुकी है. मेरे बाकी भाई कनाडा और न्यूज़ीलैंड में हैं. वो लोग भी जैसे-तैसे करके वीज़ा लेकर भारत पहुँच गए.

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18 जून को मैं दिल्ली हवाई अड्डे पर ही था. मैं यहाँ सचिवालय में गया लेकिन तब तक यहाँ भी अंदाज़ा नहीं था कि कितनी बड़ी विपत्ति आई है. हमें लगा कि हम हेलिकॉप्टर लेकर वहाँ चले जाएँगे चाहे 15 लाख लगे या 20 लाख.

लेकिन फिर पता चला कि सारे हेलिकॉप्टर सरकार ने ले लिए हैं. विदेश से भाई आ गए, इंटरनेट, फेसबुक पर ख़बर फैल गई. मैने सबसे पहले तब बीबीसी को इंटरव्यू दिया. सोचा दुनिया को पता चले कि कैसी अव्यवस्था फैली है.

ऐसा नहीं है कि प्रशासन की नीयत नहीं थी, इनकी क्षमता ही नहीं थी. सेना को पहले दिन ही बुला लेना चाहिए था.

इसी बीच मुझे मेरी माताजी की एक सहयात्री का फ़ोन आया और वो रो रही थी. उन्होंने रोते हुए कहा, "बेटा मुझे बचाओ. मुझे आपकी माताजी तो नहीं दिख रही हैं लेकिन मैं भी तुम्हारी माताजी जैसी हूँ."

मैने उन्हें धीरज बंधाते हुए पूछा कि वो कहाँ फँसी हुई हैं. उन्होंने बताया कि वो जंगलचट्टी में है. उत्तराखंड पहूँच कर मैने आईटीबीपी के लोगों को इसकी जानकारी थी.

वीडियो रिकॉर्डिंग

"जब तक प्रशासन राहत काम कर रहा है तब तक मैं यहीं डटा रहूँगा-जब तक शासन ये नहीं कहता कि एक भी आदमी ज़िंदा नहीं है. उसके बाद भी मैं ख़ुद जाकर देखूँगा अपने कैमरे के साथ."

आईटीबीपी के लोगों ने बताया कि उन्होंने जंगलचट्टी में खाने के पैकेट गिराने शुरू किए हैं क्योंकि वहाँ लोग हो सकते हैं.

मैंने उनसे कहा कि साहब हो नहीं सकते यकीनन लोग हैं क्योंकि मुझे मेरी माताजी की सहेली का फोन आया था. फिर इस इलाक़े से लोगों को बचाने की कोशिश हुई. मेरी माताजी की सहयात्री को भी हेलिकॉप्टर से बचाने की कोशिश हुई लेकिन वो हेलिकॉप्टर टूट गया. मेरा दिल भी जैसे टूट गया था उस वक़्त. लेकिन 23 जून को समाचार मिला कि यात्री समेत पायलट ज़िंदा बच गए हैं.

जैसे ही मेरी माताजी की सहेली सुरक्षित बाहर आईं, मेरे भाइयों ने उनका वीडियो रिकॉर्ड किया जिसमें उन्होंने बताया कि हज़ारों की संख्या में लोग अब भी फँसे हुए हैं और दुनिया की सर्वश्रेष्ठ सेना के लोग लगे हुए हैं. एक और सहयात्री की बात भी हमने रिकॉर्ड की जिसमें उन्होंने फोटो देखकर बताया कि 23 जून तक मेरी माताजी जंगलचट्टी में थीं.

हमने हर मुमकिन कोशिश की उनको ढूँढने की. हमने मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को फोन किया. हमने सेना के लोगों से मदद की भीख माँगी.

उत्तराखंड में राहत और बचाव

उत्तराखंड में अब भी राहत और बचाव का काम जारी है

मेरी माताजी का नाम है पुष्पाबेन गोरड़िया, उम्र है 69 साल, कद पाँच फुट है, दोनों पैरों में गठिया है, मुझे लगता है कि वो चल नहीं पा रही होंगी और अब भी वहीं कहीं होंगी.

साथ में मेरे भाई भी हैं जो स्वस्थ हैं और माताजी को उठा सकते हैं. मेरे परिवार के तीनों लोगों में से अभी तक कोई भी पहुँचा है. इसिलए मुझे उम्मीद है कि वो तीनों एक साथ हैं. तीनों एक साथ ही आएँगे या नहीं आएँगे, ये मुझे पता नहीं है.

जब तक प्रशासन राहत काम कर रहा है तब तक मैं यहीं डटा रहूँगा-जब तक शासन ये नहीं कहता कि एक भी आदमी ज़िंदा नहीं है. उसके बाद भी मैं ख़ुद जाकर देखूँगा अपने कैमरे के साथ.

प्रशासन का दरवाज़ा खटखटाकते रहें, लेकिन प्यार से. सेना के भी लोग मारे गए हैं. सबको एकजुट रहने की ज़रूरत है.

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