'उत्तरांखड: सरकार के एक किलो चावल से क्या होगा'

  • 30 जून 2013
उत्तराखंड
राज्य के आपदाग्रस्त इलाकों में राहत सामाग्रियों के पहुंचते ही लोगों की भीड़ इकठ्ठा हो जा रही है.

उत्तराखंड में आई बाढ़ से प्रभावित इलाकों से बचे यात्रियों को सुरक्षित निकालने का काम लगभग अंतिम चरणों में पहुँच चुका है, और अब प्रशासन का सारा ध्यान तबाही में फंसे स्थानीय लोगों तक मदद पहुँचाने पर है.

लेकिन ये काम भारी चुनौतियों से भरा है.

सबसे ज़्यादा परेशानी उन क्षेत्रों को लेकर है जहाँ की सड़कें और पुल बह गए हैं. ऋषिकेष के केदारनाथ के रास्ते में हमने पाया कि ज़्यादातर बाज़ार बंद हैं, जिन रास्तों में चहल-पहल हुआ करती थीं वो सुनसान पड़े हैं. हर जगह लोगों में भय है.

राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन अथॉरिटी के अनुसार उत्तराखंड में करीब 2200 घर तबाह हो चुके हैं, 154 पुल ढह गए हैं और 1520 सड़के बह गई हैं.

सड़क हो गई गायब

अगस्तमुनी से थोड़ा पहले तिलवाड़ा कस्बा भी ऐसा ही इलाका है जहाँ सड़क से नहीं पहुँचा जा सकता. केदारनाथ के रास्ते पर पड़ने वाला तिलवाड़ा रुद्रप्रयाग से कुछ किलोमीटर आगे है.

तिलवाड़ा जाने वाली सड़क टूट गई है इसलिए वहाँ पहुँचने के लिए करीब एक घंटा थका देने वाले घुमावदार और खतरनाक पहाड़ी रास्तों से होकर गुज़रना पड़ता है.

उत्तराखंड में आई इस प्राकृतिक आपदा के कारण तिलवाड़ा में भी साफ़ पानी, राशन की भारी कमी है. जिनके घर बर्बाद हो गए हैं वो सड़कों पर मारे-मारे फिर रहे हैं और मदद की आस लगाए बैठे हैं. दूसरे कई इलाकों की ही तरह हेलीकॉप्टर से ही यहाँ राहत सामग्री पहुँच रही है.

तिलवाड़ा के पहाड़ी रास्ते में मेरी मुलाकात अवतार सिंह नेगी से हुई जो यहां की तपतपाती गर्मी में मेरी तरह ही पसीने से तर-बतर थे.

उनके अनुसार तिलवाड़ा में डायरिया जैसी पानी से जुड़ी बीमारियाँ फैल रही हैं, जिससे महामारी का खतरा उत्पन्न हो गया है. हालाँकि इस बात की आधिकारिक पुष्टि नहीं हो पाई है.

कई स्थानीय नागरिक इन राहत कार्यों को नाकाफ़ी बताते है.

वो कहते हैं, ''हमारे यहाँ दूषित पानी आ रहा है, इसलिए यहाँ महामारी की संभावना है.''

स्थितियां हैं खतरनाक

रास्ते में हमें गुप्तकाशी से पत्नी के साथ लौट रहे कुलदीप ने बताया कि इलाके की हालत में सुधार आय़ा है, लेकिन स्थिति अभी भी ''खतरनाक'' है.

तिलवाड़ा की भरी रहने वाली सड़कें सुनसान थीं. दुकानें बंद थीं.

यहाँ के दर्जनों मकान, होटल पानी की भेंट चढ़ गए. इलाके के राजकीय इंटर कॉलेज का एक हिस्सा ध्वस्त हो गया है. स्कूल में छुट्टी के कारण किसी की मौत नहीं हुई.

मंदाकिनी नदी के दोनों छोरों को जोड़ने वाले पुल में बड़े गड्ढे हैं और वो कभी भी टूट सकता है. कस्बे के साथ में बह रही नदी के पानी में मिट्टी है और ये पीने लायक नहीं है.

एक व्यक्ति ने कहा, ''यहाँ पानी के सारे नल टूट गए हैं. पहले हम नदी का पानी पीते थे लेकिन अब नदी का पानी पीने लायक नहीं है. अब हमें तीन किलोमीटर दूर पानी लेने जाना पड़ रहा है.''

एक अन्य व्यक्ति का कहना था, “आसपास के गाँवों में भी या तो मकान टूट गए हैं या तो लोगों के परिवार तबाह हो गए हैं, इसलिए वो बाज़ार नहीं आ रहे हैं. यही कारण है कि बाज़ार सूने पड़े हैं.”

प्रभावित लोग सड़कों पर हैं क्योंकि न तो सिर पर छत है न कुछ और.

टूटी सड़कें

तिलवाड़ा से चार किलोमीटर आगे रामपुर गाँव है. टूटी सड़कों से बचते-बचाते हम वहाँ पहुँचे. सड़कें ऐसी कि ज़रा सा पाँव इधर-उधर हुआ कि आप सीधे खाई में गिरेंगे.

रास्ते में हमें दिखा कि कई जगह थोड़ी ऊँचाई पर पड़ने वाली उपजाऊ ज़मीनें तबाह हो गई हैं. थोड़ा आगे करीब 30-40 लोग राशन बाँट रही गाड़ी के सामने जमा थे और वहाँ बहुत शोर था.

राशन बांटने वाले को ताना देते हुए गुस्से में एक पीड़ित ने कहा, ''किसी को यहाँ कुरकुरे मिल रहे हैं. कुरकुरे में क्या होगा? क्या इनके बच्चे कुरकुरे खाकर पलेंगे?''

कुछ लोग सरकारी व्यवस्था के खिलाफ़ नारे लगा रहे थे.

'नाकाफ़ी इंतज़ाम'

उत्तराखंड
राज्य के कई इलाकों में सड़क और पुल बुरी तरह से क्षतिग्रस्त हो गए हैं.

एक महिला ने बताया कि उन्हें 10 किलो आटा, एक किलो चावल और एक पैकेट बिस्किट मिला. जिन परिवारों को राशन मिल रहा है, उनके नाम नोट कर लिए जा रहे हैं.

एक पीड़ित ने चिंता जताई कि इतने अनाज से पूरे महीने का राशन कैसे चलेगा.

एक परेशान महिला दौड़ती हुई हमारे पास आई. उसने नाराज़ होकर कहा, ''इतने चावल से हमारा क्या होगा? सारे लोग भूख से मर रहे हैं. मकान डूब चुके हैं, बच्चे कैसे स्कूल जाएंगे. वो क्या खाएंगे? सरकार सिर्फ़ एक किलो चावल दे रही है, इससे क्या होगा.''

कुछ लोगों ने स्थानीय राजनीतिक कार्यकर्ताओं पर राशन के सामान को गोदामों में छिपाने का भी आरोप लगाया. साथ ही नाराज़गी मदद के नाम पर पुराने कपड़ों को दिए जाने पर भी है. आने-जाने का साधन नहीं होने के कारण लोग पहाड़ी इलाकों के रास्ते कंधों पर सामान लादकर एक जगह से दूसरी जगह ले जा रहे हैं.

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