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जो जान पर खेलकर बचा रहे हैं औरों की जान

 रविवार, 23 जून, 2013 को 08:04 IST तक के समाचार

नेहरू इंस्टीट्यूट ऑफ माउन्टेनियरिंग (एनआईएम) के छात्रों, कर्मचारियों और विशेषज्ञों ने तय किया कि उत्तराखंड में आई संकट की इस घड़ी में हमें आपदा पीड़ितों की मदद जरूर करनी चाहिए.

16 जून को बादल फटने और भारी बारिश के कारण तेज जल बहाव आया जिसने पूरे इलाको को तहस-नहस कर दिया. सड़कें नष्ट हो गईं हैं. होटल बह गए, छोटी-छोटी दुकानें बह गईं जो कई परिवारों के रोजी-रोटी का सहारा थीं.

हमारा प्रयास है कि हम पर्वतारोहण, खोज और बचाव में अपनी दक्षता का उपयोग पीड़ितों को सुरक्षित स्थान तक पहुँचाने में कर सकें. हमें उत्तरकाशी से स्थानीय प्रशासन, वन विभाग और स्वास्थ्य विभाग की भी पूरी मदद मिल रही है.

स्थानीय प्रशासन और बचाव दल की मदद से बनाई गई हमारी टीमों में संस्थान के 40-50 प्रशिक्षित बच्चे हैं जिनकी उम्र 20-25 साल है. इन बच्चों में उत्साह और जज्बा है कि हमारे इलाके में आपदा आई है तो हमें कुछ करना चाहिए.

टीम में काम

ऊपर की तरफ करीब तीन हजार लोग फंसे हैं, इसलिए व्यवहारिक रूप से ये संभव नहीं है कि सबको हेलीकॉप्टर से लाया जा सके. ऐसे में इस तरह की टीमें बहुत जरूरी है. हमारी टीम ने 20 तारीख से बचाव कार्य शुरू किया है.

इस टीम में हमारे इंस्ट्रक्टर हैं जो रूट बनाने में और लोगों को उत्साहित करने में माहिर हैं. टीम में पुलिस के भी लोग जो स्थानीय लोगों को प्रेरित कर सकेंगे.

टीम में कुछ लोकल पोर्टर हैं जो एनआईएम के कर्मचारी हैं. यानी यह कुल 110 लोग का ग्रुप है जिसे छह समूह में बांट दिया गया है. इन छह समूहों को करीब 20-22 एरिया दिए गए हैं. हमारी टीम ने स्थानीय लोगों को भी अपने साथ जोड़ा है.

हमने टीमों को निर्देश दिए हैं कि सबसे ऊपरी क्षेत्र की टीम यात्रियों को लाकर अपने नीचे वाले क्षेत्र की टीम को सौंप दे. फिर वो टीम उन यात्रियों को वहाँ से लाकर अपने से नीचे क्षेत्र की टीम को सौंप देगी. हर टीम अपने से नीचे की टीम को यात्रियों को सौंप कर फिर से ऊपर चली जाएगी ताकि और यात्रियों को बचा सके.

इस आपदा में सबसे ज्यादा लोग गढ़वाल क्षेत्र में फंसे हैं. गढ़वाल क्षेत्र में प्रवेश करने के तीन रास्ते हैं. उत्तरकाशी गंगोत्री रास्ता, केदारनाथ रास्ता और बद्रीनाथ रास्ता.

दुआओं की जरूरत

हमारा प्रयास है कि ऊपर फंसे पीड़ितों को उत्तरकाशी लाया जा सके. गंगोत्री से हर्सिल तक आने वाली सड़कें गायब हो गईं हैं. हर्सिल से उत्तरकाशी तक आने वाला रास्ता भी खत्म हो गया है इसलिए लोगों को लाने के लिए हमें बार-बार पहाड़ पर चढ़कर घूम कर फिर से रास्ते पर वापस आना पड़ रहा है.

कई यात्री भावुक होकर अपना सामान भी नहीं छोड़ना चाह रहे हैं. तो हम कोशिश कर रहे हैं कि हम यथासंभव उनके सामान सहित उन्हें उत्तरकाशी तक पहुँचा सकें.

कई जगहों पर सड़कें थोड़ी ठीक हैं. जैसे एक किलोमीटर के भीतर सिर्फ दो ब्लॉक हैं. ऐसी जगहों पर सड़क को एकाध जगहों पर काट कर बुज़ुर्गों और अन्य असहाय यात्रियों को मोटरसाइकिल पर बिठा कर सुरक्षित जगह तक ले जाने लायक रास्ता बनाया जा रहा है.

हमारी कोशिश है कि यदि शाम हो जाए तो हम यात्रियों को ऐसी जगह ले जाए जहाँ स्कूल या गाँव हो ताकि उनके रहने की व्यवस्था की जा सके.

हमारी टीम जब किसी फंसे हुए समूह को बचाने जाती है तो उसे निकाले बिना हटती नहीं है. हमारी टीम तड़के ही बचाव कार्य में जुट जाती है और सूरज ढलने तक लोगों की मदद करती रहती है.

हम चाहते हैं कि लोग दुआएँ करें कि ये नौजवान और सेना इसी तरह मिलकर देश के लिए काम करते रहें.

(बीबीसी संवाददाता इकबाल अहमद से बातचीत पर आधारित)

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