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भाजपा से तलाक नीतीश को मंहगा तो नहीं पड़ेगा ?

 सोमवार, 17 जून, 2013 को 09:22 IST तक के समाचार

आखिरकार राष्ट्रीय क्लिक करें जनतांत्रिक गठबंधन का घटक दल जनता दल युनाईटेड वही गलती करने जा रहा है जो भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता और भारत के शायद सबसे अनुभवी नेताओं में से एक लालकृष्ण क्लिक करें आडवाणी ने पिछले दिनों की थी.

आडवाणी इस हकीकत को समझ नही पाए कि उनका न केवल दौर खत्म हो चुका है बल्कि उन्होंने नौ बरस से पार्टी की जिस तरह क्लिक करें नेतृत्व किया उससे नरेंद्र मोदी को राष्ट्रीय राजनीति के शीर्ष पर पहुँचा दिया है.

आडवाणी अगर मोदी के करिश्मे को खामोश नाराजगी के साथ कबूल कर लेते तो पार्टी में उनकी वरिष्ठता का भ्रम भी बरकरार रहता और पार्टी में उनका असर और रसूख भी कायम रहता.

आडवाणी ने गलती की और इसका नतीजा यह हुआ कि देश के इस क्लिक करें कद्दावर नेता ने एक तरह से अपनी राजनीति का समापन कर लिया.

2002 में गोधरा

यह किसी भी तरह से देश की क्लिक करें राजनीति में पिछले 70 सालों से सक्रिय सियासतदां की राजनीतिक तकदीर नहीं होनी चाहिए थी.

आडवाणी की इस गलती के बाद क्लिक करें भाजपा के अंदर अब मोदी के खिलाफ कोई विरोध करने की जुर्रत भी नहीं करेगा.

मोदी अब पार्टी से भी बड़े हो गए हैं. आडवाणी वाली गलती अब क्लिक करें बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार कर रहे हैं.

उनकी पार्टी जनता दल युनाइटेड पिछले 17 साल से भाजपा की क्लिक करें सहयोगी है और वो भाजपा के बगैर बिहार में सत्ता में आने का सपना भी नहीं देख सकती थी.

नीतीश कुमार को नरेंद्र मोदी को क्लिक करें प्रधानमंत्री पद के लिए आगे बढ़ाए जाने पर एतराज है.

लेकिन जिस वक्त 2002 में क्लिक करें गोधरा में ट्रेन के एक डिब्बे में कार सेवकों पर हमला किया गया था और जिसके बाद पूरे गुजरात में दंगे भड़क उठे थे, उस वक्त नीतीश कुमार ही तत्कालीन केंद्र क्लिक करें सरकार में रेल मंत्री थे.

राजनीतिक मछली बाजार

उन्होंने कभी भी नरेंद्र मोदी के क्लिक करें कामकाज पर या भाजपा के नजरिए पर कोई सवाल नहीं उठाया तो फिर अचानक उनके जेहन में धर्मनिरपेक्षता, क्लिक करें गुजरात के दंगे और मोदी की छवि कहाँ से अचानक हिचकोले मारने लगी?

क्षेत्रीय पार्टी आम चुनावों में क्लिक करें दिल्ली में कांग्रेस की हार की संभावनाओं को महसूस कर रही हैं.

राजनीतिक क्लिक करें विश्लेषक इस तरह के इशारे कर रहे हैं कि आगामी संसदीय चुनावों में कांग्रेस और भाजपा दोनो ही सरकार बनाने की स्थिति में नहीं होंगी.

क्लिक करें क्षेत्रीय पार्टियों को लगता है कि दिल्ली एक बार फिर राजनीतिक मछली बाजार बनने वाला है.

नीतीश कुमार के दिमाग में कहीं न कहीं ये सपना दबा हुआ है कि उस मछली बाजार की क्लिक करें अफरातफरी में प्रधानमंत्री की टोकरी उनके हाथ लग सकती है.

नीतीश कुमार की पार्टी और उनका संबंध ऐसे राजनीतिक क्लिक करें आंदोलन से रहा है जो साम्यवाद की तरह अपने मायने खो चुका है.

इनके नजरिए का बुनियादी पहलू कांग्रेस का क्लिक करें विरोध रहा है.

राजनीतिक प्रबंधक

धर्मनिरपेक्षता अपने मौजूदा अर्थों में इनके सियासी नजरिए का अहम पहलू नहीं रहा है.

इनकी पार्टी दूसरे राजनीतिक दलों के मुकाबले भाजपा से ज्यादा करीब नजर आती है.

भाजपा के साथ रहने की वजह से न सिर्फ उनकी राजनीतिक ताकत बढ़ जाती है बल्कि वे गठबंधन के अंदर मोदी के सामने जरूरत पड़ने पर संतुलन और ब्रेक का काम कर सकते थे.

नीतीश भी आडवाणी की तरह इस हकीकत को समझ नहीं पा रहे हैं कि वो मोदी की तरह एक कामयाब राजनीतिक प्रबंधक नहीं हैं.

और साथ ही वे अब उतने लोकप्रिय भी नहीं हैं जितने कि मोदी हैं.

नीतीश खुद अपने राज्य में तेजी से लोकप्रियता खो रहे हैं और इस वक्त वे एक कमजोर से प्लेटफॉर्म पर खड़े हैं.

इस वक्त अगर भाजपा से नाता तोड़ा तो सियासी तौर पर ये उनके लिए आत्मघाती कदम साबित होगा.

वो भी आडवाणी की तरह कहीं के नहीं रहेंगे. बड़े ख्वाब देखना अच्छी बात है लेकिन ख्वाब ऐसा न हों कि वो राजनीतिक खुदकुशी बन जाए.

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