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इस बार कैसे सही साबित हो रहा है मौसम विभाग

 शनिवार, 15 जून, 2013 को 07:38 IST तक के समाचार
बारिश का मौसम

अब भी भारत की अर्थव्यवस्था का मॉनसून पर बड़ा दारोमदार है

भारत का मौसम विभाग अब तक खबरों से ज्यादा चुटकुलों में रहा है क्योंकि अकसर उसकी भविष्यवाणियां गलत साबित हुई हैं. लेकिन इस बार जो मौसम विभाग कह रहा है, वहीं हो रहा है.

2009 में विभाग ने औसत मॉनसून का पूर्वानुमान लगाया लेकिन क्लिक करें बारिश सामान्य से 22 प्रतिशत कम रही है. साल 2007 में विभाग ने मॉनसून के सामान्य से कम रहने की बात कही तो पूर्वानुमान के उलट बारिश औसत से ज्यादा हुई.

लेकिन 11वीं पंचवर्षीय योजना के बाद से क्लिक करें मौसम विभाग का आधुनिकीकरण हुआ है. अमेरिकी डोपलर रडार, रिमोट सेंसर युक्त उपग्रह और ऑटोमैटिक मौसम स्टेशन से मिलने वाले डाटा की सही सैंपलिंग ने विभाग की साख बचा ली है.

विभाग के महानिदेशक लक्ष्मण सिंह राठौड़ के मुताबिक पिछले कुछ सालों में ऑब्जरवेसन सिस्टम और डाटा की गणना के मॉडलों में आमूल-चूल सुधार किया गया है. मौसम विभाग को सूचना प्रौद्योगिकी और मीडिया की भी मदद मिली है.

इस साल के मॉनसून के बारे में राठौड़ कहते हैं, "क्लिक करें मॉनसून के दो सप्ताह बीत गए हैं. इसकी प्रारंभिक अवस्था बहुत अच्छी है. केरल के तट पर मॉनसून ठीक एक जून को दस्तक देने के बाद निरंतर पूर्व और पश्चिम की ओर बढ़ रहा है. अब तक भारत के 60 प्रतिशत से ज्यादा भूभाग तक मानसून पहुंच गया है."

वो कहते हैं कि अब तक सामान्य से 25 प्रतिशत ज्यादा बारिश अब तक हुई है. उत्तर पश्चिमी भारत में मॉनसून अभी नहीं पहुंचा है लेकिन यहां भी मॉनसून से पूर्व की बारिश अच्छी हो रही है. इस साल मॉनसून का कृषि पर बहुत सकारात्मक असर होगा.

पूर्वानुमान

"भारत में विविधता बहुत ज्यादा है. जैसलमेर और चेरापूंजी एक ही अक्षांश पर हैं लेकिन एक जगह सूखा पड़ता है और दूसरी जगह साल भर बारिश होती है. विविधता के कारण पूरे देश के लिए मौसम की सटीक जानकारी देना विभाग के लिए बड़ी चुनौती है."

लक्ष्मण सिंह राठौड़, मौसम विभाग के महानिदेशक

मौसम का पूर्वानुमान तीन स्तर पर होता है, दीर्घावधि, मध्यम अवधि और अल्पावधि. इसमें सबसे पहले दीर्घावधि अनुमान होता है यानी मॉनसून आने से तीन महीने पहले अप्रैल में इस बारे में सूचना दी जाती है जिसके आधार पर लोग निर्णय लेते हैं.

लक्ष्मण सिंह राठौड़ मानते हैं कि दीर्घावधि पूर्वानुमान की सटीकता अच्छी नहीं होती है. लेकिन विभाग के लिए सूचना देना जरूरी होता है इसलिए एकमात्र सही जानकारी से लोगों को अपडेट करना रह जाता है.

राठौड़ कहते हैं, "मध्यम अवधि में हमारी सटीकता बहुत अच्छी है. हम बता पातें है कि बारिश होगी या नहीं होगी लेकिन मात्रा में सटीकता अभी बहुत अच्छी नहीं है. रोजमर्रा के निर्णय लेने के लिए अभी मध्यम और अल्पावधि का पूर्वानुमान बहुत सटीक है, जिसे और बेहतर बनाया जा सकता है."

पूर्वानुमान के गलत होने की बात स्वीकारते हुए राठौड़ कहते हैं, "दीर्घावधि पूर्वानुमान के कारण हमारी बहुत आलोचना भी होती है लेकिन लोगों को भी अपने फैसले लेते वक्त सावधानी बरतनी चाहिए. दीर्घावधि पूर्वानुमान की बाध्यताओं को ध्यान में रखते हुए लोगों को फैसले लेने चाहिए. यह केवल मार्गदर्शन के लिए होता है."

चुनौती

भारत की आधी से ज्यादा आबादी खेती पर निर्भर है और खेती मॉनसून पर. साल 2009 में मौसम विभाग सूखे का अंदाजा नहीं लगा पाया था जिस कारण भारत में धान और गन्ने की उपज प्रभावित हुई थी. इस कारण भारत को चीनी आयात करनी पड़ी थी और विश्वभर में चीनी के दाम 30 प्रतिशत तक बढ़ गए थे.

मॉनसून

गर्मी से बेहाल लोगों हो या किसान, सभी को बारिश का इंतजार रहता है

मौसम भारत की अर्थव्यस्था को खासा प्रभावित करता है. ऐसे में मौसम की सटीक जानकारी देना और भी चुनौतीपूर्ण हो जाता है.

राठौड़ कहते हैं, "भारत में विविधता बहुत ज्यादा है. जैसलमेर और चेरापूंजी एक ही अक्षांश पर हैं लेकिन एक जगह सूखा पड़ता है और दूसरी जगह साल भर बारिश होती है. विविधता के कारण पूरे देश के लिए मौसम की सटीक जानकारी देना विभाग के लिए बड़ी चुनौती है."

12वीं पंचवर्षीय योजना के तहत मौसम विभाग जिला स्तर पर पूर्वानुमान दे रहा है. अब ब्लॉक स्तर पर मौसम का पूर्वानुमान देने की योजना पर काम जारी है.

विभाग अभी पांच दिन तक के मौसम का सटीक पूर्वानुमान दे रहा है. बड़े शहरों के लिए दस दिन तक के मौसम का सटीक पूर्वानुमान देने तैयारी चल रही है.

अप्रैल में जारी पूर्वानुमान में विभाग ने मॉनसून के सामान्य रहने के संकेत दिए थे. मौसम विभाग इस अनुमान में सुधार करने जा रहा है.

विभाग के मुताबिक इस साल मॉनसून 98 प्रतिशत रहेगा. अब तक विभाग के पूर्वानुमान सही होते दिख रहे हैं.

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