नक्सलियों के विरुद्ध मरते दम तक संघर्ष: मधुकर राव

  • 11 जून 2013
मधुकर राव

बीजापुर के कुटरू इलाके से चार जून 2005 को सलवा जुडूम की औपचारिक शुरुआत हुई थी.

पिछले दो सालों में माओवादियों ने सलवा जुडूम की अग्रिम पंक्ति, निचली और मध्यम पंक्ति के कई नेताओं को मार दिया है.

उनमें से सबसे प्रमुख नेता महेंद्र कर्मा को 25 मई को दरभा में मारा गया.

सलवा जुडूम की अग्रिम पंक्ति के गिने-चुने नेता ही रह गए हैं, उनमें से मधुकर राव भी एक हैं.

दरभा कांड पर उन्होंने बीबीसी के साथ एक लंबी बातचीत में कहा, "अभी जो इतनी बड़ी घटना हुई है, इसके बाद भी लोगों की आँख खुलनी चाहिए कि नक्सली क्या हैं और क्या नहीं हैं. वैसे यह सबको बताने की जरूरत नहीं है क्योंकि यह तो देखने से ही समझ में आ रहा है कि नक्सली क्या हैं. जो लोग नक्सलियों के समर्थन में और सलवा जुडूम के विरोध में सुप्रीम कोर्ट में पिटीशन दायर किए हैं उनको अभी आगे आकर इस समस्या के समाधान के लिए कार्य करना चाहिए."

सीपीआई का गढ़

एक सवाल और था कि सलवा जुडूम से जुड़े लोगों पर बलात्कार, लूट और बेक़सूर आदिवासियों की हत्या के आरोप लगते रहते हैं.

इस पर मधुकर कहते हैं, "प्रायोजित ढंग से कहीं न कहीं नक्सली विचारधारा से जुड़े हुए लोग हमारे बीच में प्लांट करके उनसे अपराध करवा कर हमें बदनाम किया गया जिसका खामियाजा हमें भुगतना पड़ा."

यह मान भी लिया जाए तो सवाल रह ही जाता है कि जब ये आंदोलन इतना लोकप्रिय था तो महेंद्र कर्मा इसके शीर्ष नेता कहे जाने के बावजूद बुरी तरह से चुनाव क्यों हार गए थे?

मधुकर सफाई देते हुए कहते हैं, "देखिए. ये सब जानते हैं कि यहाँ के मतदान केंद्र अंदर अंदर बीहड़ अंचलों में हैं और वे क्षेत्र नक्सलियों के आंतक में हैं. वह इलाका सीपीआई का गढ़ था और इस तरह से सलवा जुडूम से जुड़ने के कारण नक्सलियों ने गाँव-गाँव जाकर लोगों को महेंद्र कर्मा जी के विरोध में धमाकाया. इस कारण से महेंद्र कर्मा जी को हार का मुँह देखना पड़ा."

गांधीवादी विचार

शुरुआत के आठ साल गुजर जाने के बाद सलवा जुडूम से जुड़े लोगों के जेहन में ये सवाल आता होगा कि वे लोग इस आंदोलन को आज कहाँ पाते हैं?

उनका कहना था, "सलवा जुडूम सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद से ही बंद है. हम आपस में मिल-बैठकर सुरक्षा के लिहाज से अपने क्षेत्र में अपने लोगों को संगठित करके अपने ढंग से आंदोलन को जारी रखे हुए हैं. लेकिन सलवा जुडूम के रूप में नहीं बल्कि हमने दंडकारण्य शांति संघर्ष समिति के रूप में एक संगठन बनाया है. जिसको हम गांधीवादी विचारों से चला रहे हैं."

वैसे दंडकारण्य शांति संघर्ष समिति गांधीवादी विचारों से चलाने की बात पूरी तरह सही नहीं कही जा सकती क्योंकि समिति की शुरुआत हथियारों के साये में हुई थी.

इस पर मधुकर कहते हैं, "नहीं ऐसा नहीं है... यह हमारी मजबूरी है... हम किसी गाँव में शांति से सीधे तरीके से लोगों से नहीं मिल सकते. किसी से बात नहीं कर सकते. हम जाते हैं तो माओवादी हमको घेरकर मारने की कोशिश करते हैं. हमको ऐसी स्थिति या माहौल ही नहीं मिलता कि हम गाँव वालों से बात कर सकें."

नक्सलवादी समस्या

हथियारों की मौजूदगी के बावजूद वे दंडकारण्य शांति संघर्ष समिति के काम करने के तरीके को गाँधीवादी कहते हैं.

उनका कहना है, "जो हमारी सुरक्षा कर रहे हैं, मैं उनकी बात कर रहा हूँ... हम हथियार लेकर नहीं चलते."

इस इलाके के नक्सल समस्या के खत्म होने की संभावनाओं के सवाल पर वह कहते हैं, "निश्चित रूप से. नक्सलवादी समस्या एक दिन जरूर खत्म होगी. वे जिस तरह वारदात को अंजाम दे रहे हैं. यही वारदात एक दिन उनके लिए पीछे मुड़कर चले जाने का कारण बन सकती है. बड़े बड़े नेताओं, मजदूरों, किसानों को मारा गया है. ये किसके हितैषी हैं, ये कहीं नजर नहीं आता. इससे निश्चित रूप से जान पड़ता है कि नक्सली कहीं पर भी कामयाब नहीं होंगे. इसका हमें पूरा भरोसा है."

ऐसा माना जाता है कि माओवादियों को आम लोगों का समर्थन हासिल होता रहा है.

इस सवाल पर उनका कहना था, "नहीं... लोगों का समर्थन कहीं पर भी नहीं मिलता है. आप यहाँ 10 किलोमीटर गाँव में जाएंगे तो किसी नक्सली कार्यकर्ता के सामने गाँववाले जरूर बोलेंगे कि वह उनका समर्थन करते हैं लेकिन जब आप अकेले में उनके दिल की बात जानने की कोशिश करेंगे तो वह साफ-साफ कह देगा कि वह डर से उनका समर्थन करता है लेकिन उनसे दिल से नहीं जुड़ा है. वह जबरदस्ती लाठी, डंडे, बंदूक के सहारे कहीं पर भी हमला करने में ग्रामीण भाइयों का इस्तेमाल करते हैं."

लोगों का समर्थन

किसी भी भूमिगत आंदोलन को शुरू तो किया जा सकता है लेकिन बिना स्थानीय लोगों के समर्थन के लंबे अर्से तक नहीं चलाया जा सकता है.

इस मुद्दे पर राव कहते हैं कि समर्थन शुरू में मिला था. लेकिन अब लोगों का मोह भंग हो रहा है. वह आने वाले समय में अपना रवैया बदलेंगे.

माओवादियों को मिले आम लोगों के समर्थन की वजहों पर रोशनी डालते हुए मधुकर ने बताया, "इसीलिए कि सरकार की पहुँच इस क्षेत्र में नहीं थी. सरकार ने लोगों की सुख सुविधाओं पर ध्यान नहीं दिया, शिक्षा और स्वास्थ्य पर ध्यान नहीं दिया. रोड पुल-पुलिया आदि चीजों, यातायात के साधनों से वंचित रखा गया. ये सभी कारण हैं नक्सलवाद के जन्म के और इनको अच्छे से काम करने का अवसर भी मिला. यदि ये क्षेत्र पूरी तरह से विकसित होता तो नक्सलवाद कहीं नहीं दिखाई देता."

जब मधुकर से यह पूछा गया कि 2005 से 2013 तक के सलवा जुडूम के सफर में वे जब पीछे मुड़कर देखते हैं तो क्या पाते हैं?

उनका कहना था, "खत्म तो नहीं पर पीछे मुड़कर देखने से ऐसा लगता है कि हमारे कई साथी जो हमारे साथ चलते थे. अब नहीं रहे. अब ऐसा लग रहा है कि साथियों के अभाव में हम कहीं न कहीं कमजोर जरूर हुए हैं लेकिन हौसला अभी भी हमारा बुलंद है. हम भी मरते दम तक संघर्ष जारी रखेंगे."

( बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार