कहीं भाजपा का भविष्य दांव पर पर तो नहीं?

  • 11 जून 2013

भारत की मुख्य विपक्षी पार्टी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) इस समय अब तक के सबसे बड़े संकट से गुजर रही है.

भाजपा के दिग्गज नेता लाल कृष्ण आडवाणी ने सोमवार को पार्टी के सभी पदों से अचानक इस्तीफा दे दिया है.

बताया जा रहा है कि ऐसा भाजपा के विवादित नेता नरेन्द्र मोदी को 2014 के चुनावों में पार्टी के चुनाव अभियान की कमान सौंपने के कारण हुआ है.

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक 85 वर्षीय आडवाणी के मन में 2014 के चुनावों के दौरान पार्टी की ओर से प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी बनने की महत्वाकांक्षा पल रही थी.

मगर पार्टी ने उनके बजाय मोदी को आगे बढ़ा दिया.

(आडवाणी को मनाने की कोशिश)

इस विवाद के मूल में दो व्यक्तित्वों का टकराव है. माना जा रहा है कि यह संकट भाजपा के नए तथा पुराने सिपाहियों के बीच राजनीतिक नियंत्रण की लड़ाई से जुड़ा है.

ये वे टकराहटें हैं जो राजनीतिक दलों में विभाजन का कारण बन सकती है.

राष्ट्रवाद का ब्रांड

आडवाणी का बचाव करने वालों का कहना है कि वे 33 साल पुरानी हिन्दू राष्ट्रवादी पार्टी को जमीन से आसमान तक ले जाने वालों में से एक हैं.

करिश्माई नेता पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी के साथ मिलकर आडवाणी नें महज 15 वर्षों के भीतर पार्टी को 2 संसदीय सीटों से बढ़ाकर प्रमुख राजनीतिक ताकत बना डाला.

उनका मानना है कि यदि आडवाणी को कमान मिलती है तो 2014 के चुनावों में पार्टी के पास जीतने की बेहतर संभावनाएँ हो सकती हैं.

आडवाणी के ये समर्थक मोदी को बाँटने वाला व्यक्ति मानते हैं.

आडवाणी के समर्थकों का मानना है कि 2014 के चुनाव अभियान के लिए मोदी को आगे बढ़ाने का मतलब आडवाणी के साथ अन्याय करना है.

माना जा रहा है कि मोदी को यह नई जिम्मेदारी उन्हें प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने के लिए दी गई है.

मोदी का बचाव करने वाले मानते है कि गुजरात के मुख्यमंत्री को प्रचार अभियान की कमान सौंपकर पार्टी ने एक ऐसे व्यक्ति पर दाँव लगाया है जो निर्णायक और मजबूत नेतृत्व का प्रतीक है, जो राष्ट्रवाद के ब्रांड को मजबूत करता है, और युवा तथा भारत के विशाल मध्यवर्ग का चहेता है.

वे मानते हैं कि गुजरात का जोरदार आर्थिक प्रदर्शन मोदी की काबलियत का प्रमाण है.

'एक तानाशाह'

मोदी के समर्थकों का यह भी मानना है कि सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी को हराने के लिए भाजपा की तरफ से मोदी से अच्छा दाँव और कोई नहीं है.

कांग्रेस की अगुवाई वाली सरकार पर इस समय भ्रष्टाचार और निष्क्रियता के आरोप हैं, जबकि मोदी के जीवनीकार उन्हें कुशल रणनीतिकार बताते हैं.

नरेंद्र मोदी के आलोचकों का कहना है कि मोदी को आने वाले दिनों में कड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा.

टाइम्स ऑफ इंडिया के मुताबिक पार्टी के कई लोग मोदी को टीम भावना वाले खिलाड़ी के बजाए 'एक तानाशाह' मानते हैं.

सबसे महत्वपूर्ण यह है कि पार्टी के बाहर उन्हें एक विभाजनकारी नेता के रूप में देखा जाता है.

उन पर आरोप है कि उन्होंने 2002 में मुस्लिम विरोधी दंगों को रोकने के लिए कोई कारगर कदम नहीं उठाए.

गुजरात में 2002 में हुए इन दंगों में 1,000 से अधिक लोग मारे गए थे.

भारत की कुल 1.2 अरब आबादी का करीब 15 फीसदी हिस्सा मुस्लिम आबादी का है.

छह से अधिक राज्यों में मुस्लिम मतदाताओं की हिस्सेदारी 11 प्रतिशत से अधिक है. इसमें राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण राज्य उत्तर प्रदेश शामिल है.

मुस्लिम मतदाता

एक अनुमान के मुताबिक 543 लोकसभा सीटों में 200 सीट ऐसी हैं, जहाँ मुस्लिम मतदाता निर्णायक है.

ऐसी मीडिया रिपोर्टें भी हैं जो बताती हैं कि यदि भाजपा मोदी को प्रधानमंत्री के उम्मीदवार के रूप में आगे करती है तो मुस्लिम मतों का ध्रुवीकरण हो सकता है.

सवाल यह भी है कि क्या भाजपा के साझेदार मोदी की आक्रामक राजनीति के सामने सहज रह पाएंगे?

भाजपा के साथ मिलकर बिहार में गठबंधन सरकार चला रही जनता दल यूनाईटेड ने पहले ही काफी बयान दे रखे हैं.

उसने कहा है कि यदि मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया जाता है तो वह भाजपा की अगुवाई वाले गठबंधन से अलग हो जाएगी.

मोदी के राजनीतिक जीवन पर आधारित किताब 'नमो स्टोरी' के लेखक किंगशुक नाग कहते हैं, "मोदी खुद को युवा भारत की निराशा को दूर करने वाले के रूप में पेश कर रहे हैं. पार्टी 2014 के चुनावों को मोदी पर जनादेश बनाने की कोशिश कर रही है."

विद्रोह की शुरुआत

आडवाणी ने मोदी के खिलाफ विद्रोह की शुरुआत कर दी है. एक समय था जब मोदी आडवाणी के सहायक थे.

आडवाणी के इस्तीफे के साथ ही कहानी में नाटकीय मोड आ गया है, जो भाजपा को करारा नुकसान पहुँचा सकता है.

सवाल कई हैं. हर कोई जानना चाहता है कि क्या इस इस्तीफे के बाद पुराने लोग आडवाणी के इर्द-गिर्द जमा होंगे?

क्या पार्टी का बंटवारा हो जाएगा? या क्या वे फिर मोदी के साथ होंगे?

या क्या भाजपा कोई ऐसा समाधान तलाश लेगी जिससे उसका चेहरा भी बच जाए और जो सभी को स्वीकार्य भी हो?

कई अर्थों में आडवाणी और मोदी एक-दूसरे को प्रतिबिंबित करते हैं. दोनों ही अपनी पीढ़ी के कट्टरपंथी और ध्रुवीकृत राजनीति करने वाले नेता हैं.

एक चाहता है कि वह दूसरे की जगह पा ले, मगर दाँव पर भाजपा का भविष्य है.

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