भाजपा: 'साधो घर में झगरा भारी....'

  • 7 जून 2013
मोदी पर निगाहें
क्या मोदी को मिलेगी कोई बड़ी ज़िम्मेदारी?

ग्यारह साल पहले गोवा में हुई भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में नरेंद्र मोदी लगभग एक अभियुक्त की तरह पहुंचे थे--कुछ डरे और कुछ सहमे हुए.

गुजरात में हुए व्यापक मुस्लिम विरोधी दंगों के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी उन्हें मुख्यमंत्री पद से हटाने का मन बना चुके थे.

मोदी के बोलने का अवसर आया तो उन्होंने सबसे पहले इस्तीफ़े की पेशकश की. मोदी का भाषण ख़त्म होते-होते कार्यकारिणी का माहौल बदल गया.

वाजपेयी हार गए, लाल कृष्ण आडवाणी जीत गए. वह जीत आडवाणी की थी क्योंकि वे मोदी की ढाल बन कर खड़े थे.

वही आडवाणी ग्यारह साल बाद मोदी के ख़िलाफ़ तलवार लेकर गोवा जा रहे हैं.

दरअसल, 'मोदी की सबसे बड़ी ताक़त पार्टी के बाहर के उनके विरोधी हैं तो सबसे बड़ी कमज़ोरी पार्टी के अंदर के विरोधी.'

लेकिन गुजरात में हुए उपचुनाव में मिली ताज़ा सफलता ने नेतृत्व पर मोदी के दावे को और पुख़्ता ही किया है.

बुधवार को घोषित चार विधानसभा और दो लोकसभा उपचुनावों के नतीजे भाजपा के पक्ष में गए हैं. इस कामयाबी की अहमियत इसलिए भी बढ़ जाती है कि ये सारी सीटें कांग्रेस के क़ब्ज़े में थीं.

उपचुनावों में जीत का यह छक्का लगाकर नरेंद्र मोदी गोवा जा रहे हैं, पर पार्टी के भीतर के उनके विरोधी अब भी कमर कसे हुए हैं.

मोदी के 'विरोधी'

भारतीय जनता पार्टी में इस समय मोदी की राष्ट्रीय भूमिका को लेकर संघर्ष छिड़ा हुआ है, ऐसा कि बक़ौल कबीर 'साधो घर में झगरा भारी’.

मोदी-आडवाणी
आडवाणी आज शायद मोदी के सबसे बड़े विरोधी हैं.

भाजपा में मोदी के तीन तरह के विरोधी हैं. एक जो खुलकर सामने हैं, दूसरे जो विरोध तो करना चाहते हैं पर साहस नहीं जुटा पा रहे और तीसरे जो मौक़े की तलाश में हैं.

पहले वर्ग का नेतृत्व लाल कृष्ण आडवाणी कर रहे हैं, पर उन्हें एक कंधे की तलाश रहती है जिस पर बंदूक़ रख कर वे निशाना साध सकें.

इसी प्रयास में उनको कभी शिवराज सिंह चौहान में वाजपेयी की छवि नज़र आती है तो कभी सुषमा स्वराज का भाषण कौशल वाजपेयी सरीखा नज़र आता है.

मोदी विरोध के लिए वे नितिन गडकरी पर लगे भ्रष्टाचार के आरोप भी भुलाने को तैयार हैं.

आडवाणी के मोदी विरोध का कोई सैद्धांतिक आधार नहीं है. उनकी प्रधानमंत्री बनने की अधूरी महत्वाकांक्षा उन्हें मोदी को स्वीकार नहीं करने दे रही. वे वानप्रस्थी होते-होते गृहस्थ बने रहना चाहते हैं.

मोदी विरोधियों के दूसरे वर्ग में मुरली मनोहर जोशी, सुषमा स्वराज, उमा भारती, जसवंत सिंह सरीखे नेता हैं जो एक क़दम आगे बढ़ाते हैं और फिर पीछे हट जाते हैं.

इन्हें मोदी का नहीं अपनी ही पार्टी के कार्यकर्ताओं का डर है जो मोदी के अलावा किसी और की बात सुनने को तैयार नहीं हैं. यही दबाव राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर भी है.

मोदी बनाम नीतीश

मोदी, नीतीश
अगर मोदी के नाम की घोषणा होती है तो फिर नीतीश क्या करेंगे?

मोदी इस समय देश भर में भाजपा कार्यकर्ताओं की पहली पसंद हैं. इस डर का ज़िक्र पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से कर चुके हैं.

वसुंधरा राजे सिंधिया जयपुर में मोदी की अनुपस्थिति में और अनंत कुमार बंगलौर में मोदी की मौजूदगी में इसका एहसास कर चुके हैं.

गोवा में शनिवार से शुरू हो रही भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक लोकसभा चुनावों के मद्देनज़र बनने वाली पार्टी की रणनीति ही नहीं, मोदी की राष्ट्रीय राजनीति की महत्वाकांक्षा की दृष्टि से भी अहम है.

मोदी के लिए गोवा की अहमियत कुछ ज़्यादा ही है. वो जीते गुजरात में हैं लेकिन उसकी प्रतिध्वनि पटना में सुनाई दे रही है.

बिहार में महाराजगंज लोकसभा सीट के लिए हुए उपचुनाव में जनता दल(यूनाइटेड) की हार में लोगों को नीतीश की हार और मोदी की जीत नज़र आ रही है.

मोदी बुधवार को दिल्ली में ही थे. प्रधानमंत्री ने आंतरिक सुरक्षा के मुद्दे पर मुख्यमंत्रियों की बैठक बुलाई थी, पर आंतरिक सुरक्षा के मसले की बजाय ख़बर बनी मोदी और पी चिदम्बरम के वाकयुद्ध की.

इस सबके बावजूद मोदी के लिए राष्ट्रीय राजनीति की राह आसान नहीं है.

भाजपा से बाहर के मोदी विरोधियों ने उन्हें राष्ट्रीय विमर्श में बनाए रखा है. आजकल भाजपा की आलोचना मोदी की आलोचना के बिना अधूरी मानी जाती है.

गोवा में ग्यारह साल पहले मोदी को राजनीतिक जीवनदान मिला था. इस बार गोवा से उन्हें पार्टी का राष्ट्रीय अभियान चलाने की ज़िम्मेदारी मिलेगी इसके संकेत अभी से मिलने लगे हैं.

ऐसा हुआ तो चुनाव अभियान समिति की अध्यक्षता मोदी की राष्ट्रीय भूमिका पर पार्टी की औपचारिक मुहर की शुरुआत होगी.

उनके विरोधी गोवा के बाद चुप हो जाएंगे ऐसा मानना नासमझी होगी, पर मोदी धैर्य का खेल खेल रहे हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि दिल्ली अभी दूर है.

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