क्या ज़रूरी है ग्रेजुएशन में चार साल?

  • 4 जून 2013

चार साल के अंडरग्रेजुएट प्रोग्राम को लेकर दिल्ली विश्वविद्यालय इस वक्त विवादों में है. कई शिक्षाविदों, विश्वविद्यालय शिक्षकों और छात्र संगठनों का आरोप है कि यूनिवर्सिटी प्रशासन ने जल्दबाज़ी में ग्रेजुएशन को चार साल में तब्दील कर दिया है.

उधर, यूनिवर्सिटी प्रशासन का दावा है कि चार साल के कोर्स में बेहद लचीलापन है और इससे छात्रों के लिए रोज़गार के अवसर बढ़ेंगे.

चार साल के अंडरग्रेजुएट डिग्री प्रोग्राम को यूनिवर्सिटी की अकेडमिक काउंसिल से मंजूरी मिल चुकी है और 5 जून से इसमें दाख़िले की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी.

विरोध करने वाले इस बात से सहमत नहीं हैं. देश के जाने-माने शिक्षाविदों और विद्वानों ने दिल्ली यूनिवर्सिटी के विजिटर और राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी से मामले में हस्तक्षेप करने की अपील की है.

विरोध देखते हुए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की तरफ से भी सवाल उठा कि आखिर विश्वविद्यालय इसे लागू करने को लेकर यूनिवर्सिटी इतनी जल्दबाज़ी में क्यों है?

इस बीच दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जीएन साईबाबा ने बताया कि इंडिया गेट पर इसका विरोध कर रहे 200 से भी अधिक प्रदर्शनकारी छात्रों और शिक्षकों को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया.

उन्होंने बताया कि वे लोग इंडिया गेट पर दिल्ली विश्वविद्यालय में चार वर्षीय ग्रेजुएशन कोर्स को लागू किए जाने का विरोध कर रहे थे.

प्रोफेसर साईबाबा का कहना है कि गिरफ्तार किए गए लोगों में 10 बच्चे भी थे.

बीबीसी ने चार साल के इस अंडरग्रेजुएट प्रोग्राम के विरोधियों के अलावा इसके समर्थक शिक्षकों से भी बात की, और जानने की कोशिश की कि आखिर यूनिवर्सिटी के इस नए कदम का क्या मतलब है. क्या ये वाकई छात्रों के करियर में मददगार होगा?

‘चार साल बाद भी छात्रों के हाथ कुछ नहीं आएगा’

हिंदी विभाग के प्रोफेसर अपूर्वानंद चार साल के अंडर ग्रेजुएट प्रोग्राम के ही खिलाफ हैं. उनका कहना है कि इसमें बुनियादी खोट है और ये देश की स्कूल व्यवस्था से मेल नहीं खाता. अपूर्वानंद ने प्रोग्राम की गुणवत्ता पर चार सवाल खड़े किए.

प्रोफेसर अपूर्वानंद के मुताबिक ऐसा कोई शोध नहीं हुआ है जिसमें अब तक लागू तीन साल का ग्रेजुएशन रोज़गार दिलाने में नाकाम रहा है.

दूसरे, चार साल के पाठ्यक्रम के बावजूद छात्रों के हाथ कुछ ज़्यादा नहीं लगेगा क्योंकि उन्हें इसमें अतिरिक्त कुछ नहीं मिल रहा और न इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस के चार वर्षीय पाठ्यक्रम की तरह इसका कोई स्पष्ट लक्ष्य ही है.

तीसरी बात, चार साल के प्रोग्राम में डिप्लोमा, बैचलर और ऑनर्स तीनों के लिए एक ही सिलेबस के ज़रिए लक्ष्य हासिल करने की कोशिश हो रही है.

प्रोफेसर अपूर्वानंद के मुताबिक प्रोग्राम में शामिल फाउंडेशन कोर्स हर विषय के छात्रों के लिए एक ही हैं. उन्हें मर्जी के मुताबिक फाउंडेशन कोर्स चुनने की छूट नहीं है.

‘प्रोग्राम के पीछे कमर्शियल सोच’

दिल्ली विश्वविद्यालय से जुड़े सेंट स्टीफेंस कॉलेज की असोसिएट प्रोफेसर और गणित विभाग की अध्यक्ष नंदिता नारायण का कहना है कि ग्रेजुएशन में एक साल बढ़ाने का फैसला अजीबोग़रीब है. बिना फैकल्टीज की मंजूरी के इसे पास कराया गया है.

प्रोफेसर नंदिता ने इसे 'अलीटिस्ट आयडिया' बताते हुए कहा कि इसे लागू करते समय आम शिक्षकों का विरोध दबाया गया है ताकि विदेशी यूनिवर्सिटीज यहां आएं और कुछ लोग प्रॉफिट बना पाएं.

इससे आम लोग अपने बच्चों को ऊंची शिक्षा नहीं दिला पाएंगे.

‘डिग्री को बाज़ार के मुताबिक बनाने की कोशिश’

प्रोग्राम को तैयार करने वाली टास्क फोर्स में शामिल रहे यूनिवर्सिटी के इतिहास विभाग के प्रोफेसर प्रकाश नारायण ने विरोध के पीछे कुछ वामपंथियों के ग्रुप का हाथ बताया है.

उनका कहना था दिल्ली विश्वविद्यालय में 25-30 फीसदी तक ड्राप आउट रेट है.

इसके मद्देनजर ये प्रावधान रखा गया है कि अगर छात्र दो साल बाद आगे नहीं पढ़ पाते तो कम से कम उनका यूनिवर्सिटी में वक्त बिताना बेकार न जाए.

प्रोफेसर नारायण के मुताबिक यूनिवर्सिटी ने इस चार साल के प्रोग्राम को शुरू करके उन छात्रों को राहत दी है जो बीच में ही पढ़ाई छोड़ने को मजबूर हो जाते थे.

अब वो डिप्लोमा या डिग्री लेकर निकल पाएंगे. प्रोफेसर प्रकाश के मुताबिक दिल्ली यूनिवर्सिटी देश की पहली यूनिवर्सिटी है जिसने इंडस्ट्री और यूनिवर्सिटी के बीच इंटरफेस स्थापित करने की कोशिश की है.

इसे चार साल के प्रोग्राम में प्रोजेक्ट्स, फ़ाउंडेशन कोर्स और एप्लाइड कोर्स के ज़रिए इस सवाल का हल पाने की कोशिश की है. अब छात्र बाजार की जरूरत के मुताबिक अपनी डिग्री पा सकेंगे.

‘सरकार ने नहीं लिया फैसला’

यूनिवर्सिटी में अंग्रेजी विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर जीएन साईबाबा ने बताया कि 5 जून से यूनिवर्सिटी के चार साल वाले अंडर ग्रेजुएट प्रोग्राम के तहत दाख़िले शुरू हो रहे हैं. इसके बाद इस प्रक्रिया को रोकना मुश्किल होगा.

उनका कहना है कि करीब सात हजार छात्र इस जुलाई से एडमिशन लेंगे और उनकी ज़िंदगी बर्बाद हो जाएगी.

प्रोफेसर साईबाबा ने बताया कि वो इस सिलसिले में मानव संसाधन विकास मंत्री पल्लम राजू से भी मिले हैं, लेकिन उन्होंने अभी तक कोई फैसला नहीं लिया.

उनका कहना था कि सरकार इसे दिल्ली विश्वविद्यालय की स्वायत्तता से जोड़कर बता रही है जबकि इस फैसले के सामाजिक पहलू भी हैं और इससे हजारों छात्रों की सामाजिक और आर्थिक किस्मत जुड़ी है.

‘शिक्षकों से नहीं की गई चर्चा’

शिक्षाविद विनोद रैना का कहना है कि असल में इसे अंजाम देने की जिम्मेदारी शिक्षकों की है और उन्हीं से इस फैसले के बाबत चर्चा नहीं की गई.

विनोद रैना का कहना है कि यूनिवर्सिटी की एकेडमिक काउंसिल में शिक्षकों का पूरा प्रतिनिधित्व नहीं होता.

ऐसे में दिक्कत ये है कि कॉलेज शिक्षकों के साथ जो व्यापक चर्चा होनी चाहिए थी, वो नहीं हुई.

पूर्व छात्र भी आंदोलित

दिल्ली यूनिवर्सिटी के पूर्व छात्र भी चार साल के अंडरग्रेजुएट प्रोग्राम के ख़िलाफ़ आंदोलन चला रहे हैं. पूर्व छात्रों ने इसके ख़िलाफ एक अपील पर चार हजार लोगों के दस्तख़त इकट्ठे किए हैं.

विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र नकुल साहनी के मुताबिक इसका सबसे ज़्यादा नुकसान छात्रों को झेलना पड़ेगा और असल में यह प्रोग्राम उनके वक्त की बर्बादी से ज़्यादा कुछ नहीं.

नकुल साहनी के मुताबिक अभी तक बाहर से यहां पढ़ने आने वाले छात्रों को सालाना डेढ़ से दो लाख रुपए तक खर्च करने पड़ते है.

अगर उन्हें एक साल और रहना पड़ा तो उन पर ये आर्थिक बोझ की तरह होगा. नकुल के मुताबिक विश्वविद्यालय प्रशासन को सामाजिक-आर्थिक सच्चाइयों को ध्यान में रखकर फैसले लेने चाहिए.

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