नालंदा विश्वविद्यालय को मिली नई ज़िंदगी

  • 29 मई 2013
नालंदा विश्वविद्यालय

यूरोप के ऑक्सफ़ोर्ड और कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से भी कई सदी पहले बिहार का नालंदा विश्वविद्यालय शिक्षा और ज्ञान का एक प्रतिष्ठित केंद्र था.

पांचवी सदी में बने इस विश्वविद्यालय में एशिया के लगभग हर इलाक़े से लोग पढ़ने आते थे. लेकिन 1193 में हमलावरों ने इसे नष्ट कर दिया.

लेकिन अब 21वी सदी के पहले दशक में कुछ विद्वानों ने इस प्राचीन विश्वविद्यालय की गरिमा को बहाल करने की योजना बनाई है.

विद्वानों के इस गुट की अगुवाई की नोबेल पुरस्कार विजेता प्रोफ़ेसर अमर्त्य सेन ने.

सेन और उनके सहयोगी प्राचीन विश्वविद्यालय के खंडहर से सटे हुए एक विश्व विख्यात विश्वविद्यालय बनाना चाहते हैं, जहां दुनिया भर के छात्र और शिक्षक एक साथ मिलकर ज्ञान अर्जित कर सकें.

इस नए विश्वविद्यालय में तमाम आधुनिक विषयों की शिक्षा दी जाएगी. लेकिन बिहार जैसे ग़रीब और अविकसित राज्य में एक विश्व स्तर का विश्वविद्यालय बनाना बहुत कठिन काम है.

अमरीका के बॉस्टन कॉलेज के प्रोफ़ेसर फ़िलिप ऑल्टबैक इस तरफ़ इशारा करते हुए कहते हैं, ''क्या उच्च स्तर के छात्र और शिक्षक ग्रामीण बिहार की तरफ़ आकर्षित होंगे?''

2014 से पहला बैच

लेकिन नालंदा विश्वविद्यालय के कुलाधिपति अमर्त्य सेन इन सब अटकलों को ख़ारिज करते हुए कहते हैं, ''हमारा काम नए विश्वविद्यालय की स्थापना करना और पढ़ाई शुरू कर देना है. यह एक शुरुआत है. पुराना विश्वविद्यालय लगभग 200 वर्षों में अपनी ख्याति की चरमसीमा पर पहुंचा था. हमलोगों को शायद 200 साल नहीं लगेंगे लेकिन कुछ दशक तो लगेंगे ही.''

साल 2006 में भारत, चीन, सिंगापुर, जापान और थाईलैंड ने पुराने नालंदा विश्वविद्यालय को दोबारा शुरू करने की योजना की घोषणा की, जिसका बाद में अमरीका, रूस जैसे देशों ने भी समर्थन किया.

नए विश्वविद्यालय को राजगीर में बनाया जा रहा है जो प्राचीन विश्वविद्यालय से लगभग 10 किलोमीटर की दूरी पर है. सबसे पहले इतिहास और पर्यावरण की पढ़ाई होगी जिसके लिए दुनिया भर में विज्ञापन दिया जा चुका है.

अमर्त्य सेन (फाइल फोटो)
अमर्त्य सेन विश्वविद्यालय के कुलाधिपति हैं.

साल 2014 से पहला बैच शुरू होगा.

विश्वविद्यालय के लिए ज़मीन बिहार सरकार ने दिया है जबकि बाक़ी ख़र्चों के लिए केंद्र सरकार और कई विदेशी देश सहायता कर रहे हैं. प्रोफ़ेसर सेन के अनुसार विश्वविद्यालय को धीरे-धीरे बनाया जाएगा और इस बीच पढ़ाई भी चलती रहेगी.

प्रोफ़ेसर सेन का कहना है कि नए विश्वविद्यालय की प्रेरणा एशियाई राज्यों से मिली है लेकिन शिक्षा, विषय और विशेषज्ञों के मामले में ये विश्व स्तर का होगा.

गौरवशाली इतिहास

पांचवी सदी में बने इस विश्वविद्यालय में एक समय में लगभग 10 हज़ार छात्र पढ़ते थे. छात्रों में ज्यादातर चीन, जापान, कोरिया और दूसरे एशियाई देशों से आने वाले बौद्ध भिक्षु थे.

चीनी भिक्षु ह्वेनसांग ने सातवीं सदी में नालंदा में शिक्षा हासिल की थी और उन्होंने अपनी किताब में तत्कालीन विश्वविद्यालय की भव्यता का ज़िक्र किया है. वह अपनी किताब में नौ मंज़िली लाइब्रेरी का ज़िक्र करते हैं.

दलाई लामा
दलाई लामा का मानना है कि बौद्ध धर्म का सारा ज्ञान नालंदा विश्वविद्यालय से ही मिला है.

जनवरी 2013 में जयपुर साहित्य मेले में तिब्बतियों के धार्म गुरू दलाई लामा ने कहा था, ''बौद्ध धर्म के सभी ज्ञान का स्रोत नालंदा विश्वविद्यालय है.''

नालंदा विश्वविद्यालय उस समय बौद्ध धर्म का सबसे बड़ा शैक्षणिक केंद्र था. नया नालंदा विश्वविद्यालय प्राचीन संस्थान के बौद्धिक स्तर को पाने की कोशिश ज़रूर करेगा लेकिन ये कोई धार्मिक शिक्षण केंद्र नहीं होगा.

इस विश्वविद्यालय के क़रीब ही बोध-गया में महात्मा बुद्ध को 'ज्ञान' की प्राप्ति हुई थी.

बाधाएं

दुनिया भर के बेहतरीन विश्वविद्यालयों के विशेषज्ञ माने जाने वाले प्रोफ़ेसर ऑल्टबैक को इस नए विश्वविद्यालय के स्थान को लेकर काफ़ी शक है.

उनका कहना है, ''नालंदा कुछ बड़े विद्वानों को ज़रूर अपनी ओर आकर्षित कर सकता है लेकिन शिक्षक उसी जगह रहना चाहते हैं जहां आधारभूत ढांचा उच्च स्तर का हो. वो कॉलेज परिसर के बाहर भी बौद्धिक लोगों को ढ़ूंढते हैं.''

लेकिन विश्वविद्यलय परियोजना से जुड़े लोग तनिक भी निराश नहीं हैं.

नालंदा विश्वविद्यालय के गवर्निंग बॉडी के सदस्य और लोकसभा सांसद नंद किशोर सिंह कहते हैं कि विश्वविद्यालय के कारण इस क्षेत्र का विकास होगा और विश्वविद्यालय आस-पास के 60 गांवों के साथ मिलकर काम कर रहा है.

नंद किशोर सिंह के अनुसार बिहार में तेज़ी से विकास हो रहा है और आधारभूत ढाँचों पर काफ़ी तवज्जो दी जा रही है. पास ही गया में एक अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट बन रहा है और राज्य सरकार पूरी तरह से नालंदा विश्विद्यालय परियोजना के साथ है.

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