आदर्श स्पीड ब्रेकर की खोज में...

  • 28 मई 2013
ये हैं विभिन्न प्रकार के स्पीड ब्रेकर - रंबल स्ट्रिप, स्पीड टेबल और बिटुमन से बना स्पीड ब्रेकर (बाएं से दाएं)

सड़क पर धचके तो हिंदुस्तान में सबने खाए होंगे. बुरा तब ज्यादा लगता है जब ये धचके सड़क पर गड्ढों की बजाय उन स्पीड ब्रेकर से लगें, जो चमचमाती सड़कों पर जहां-तहां मिलते हैं.

कहीं ये स्पीड ब्रेकर गाड़ी में बैठे-बैठे ऊंट की सवारी की याद दिलाते हैं, और कुछ ऐसे भी जिन पर से आपकी गाड़ी बिना हिचकोले खाए ही गुज़र जाती है.

भले ही आपने या आपकी गाड़ी चलाने वाले ने ब्रेक लगा दिए हों, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि ये कौन तय करता है कि स्पीड ब्रेकर फलानी जगह लगेगा या नहीं?

धचके की तरह ही झटका शायद इस बात पर भी आपको लगे कि भारत में लगभग हर स्पीड ब्रेकर अनूठा है.

जो मानक एक सड़क को बनाने के हैं, स्पीड ब्रेकर को लेकर अमूमन न तो कोई वैज्ञानिक सोच है न आधार.

क्या कोई मानकीकृत और आदर्श स्पीड ब्रेकर जैसी चीज होती है?

देश की राजधानी और आसपास मैंने एक आदर्श स्पीड ब्रेकर की खोज करनी शुरू की, तो जो जवाब मिले, वे न तो साफ थे, न पूरे.

स्पीड ब्रेकरः कागज़ी, कानूनी और गैरकानूनी?

भारतीय सड़क कांग्रेस यानि आईआरसी के दिशा-निर्देशों के मुताबिक एक आदर्श स्पीड ब्रेकर की ऊंचाई 10 सेंटीमीटर, लंबाई 3.5 मीटर और वृत्ताकार क्षेत्र यानी कर्वेचर रेडियस 17 मीटर होना चाहिए.

साथ ही ड्राइवर को सचेत करने के लिए स्पीड ब्रेकर आने से 40 मीटर पहले एक चेतावनी बोर्ड लगा होना चाहिए.

स्पीड ब्रेकर का मकसद है गाड़ियों की रफ्तार को 20 से 30 किलोमीटर प्रति घंटा तक पहुंचाना ताकि सड़क हादसों के खतरे कम किये जा सकें. पर जो स्पीड ब्रेकर कागज़ पर है, वह हिंदुस्तान की सड़क पर शायद ही कहीं दिखाई दें.

विशेषज्ञों के मुताबिक यूरोपीय देशों के रिहाइशी इलाकों में हर 80 मीटर की दूरी पर स्पीड ब्रेकर मौजूद होते हैं, जबकि भारत में ऐसे कोई स्पष्ट मानक नहीं हैं. और जिसका जहां जैसे मन आया, गुजरती सड़क पर एक स्पीड ब्रेकर तान देता है.

बहुत से स्पीड ब्रेकर रिहाइशी इलाकों में पाए जाते हैं, क्योंकि मुहल्ले के लोग आपस में तय कर लेते हैं और चार मज़दूरों को काम पर लगवा कर खड़ी ढाल सा स्पीड ब्रेकर बनवा देते हैं, जो ग़ैर-कानूनी है.

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सड़क बनवाने के लिए जितनी मारामारी करनी होती है, स्पीड ब्रेकर के लिए कुछ भी नहीं.

आजकल सड़कों पर काले-पीले रबड़ के स्ट्रिप भी स्पीड ब्रेकर के रूप में दिखाई देते हैं.

ये लगाने में आसान और सस्ते ज़रूर हैं, लेकिन इन्हें इतना कामयाब नहीं माना जाता.

वो इसलिए क्योंकि ये बहुत जल्दी ही घिसने लगते हैं और फिर सड़क पर रह जाती हैं तो इनकी कीलें, जो वाहनों के टायरों को चुभते हैं.

यानि जो स्पीड ब्रेकर के रूप में रफ्तार रोकने के लिए बने थे, वही स्पीड ब्रेकर अब टायरों को पंक्चर करने के काम आ रहे होते हैं.

स्पीड ब्रेकर के तरफदार

रिहाइशी इलाकों में गैर-कानूनी ऊंचे-नीचे स्पीड ब्रेकर दिखाई देते हैं.

चलती गाड़ी में धचके भले ही किसी को पसंद न आते हों, पर कुछ तकनीकी विशेषज्ञों के मुताबिक सड़क हादसों से बचने का उनसे बेहतर कोई उपाय नहीं.

आईआईटी के प्रॉफेसर डॉक्टर दिनेश मोहन का मानना है कि जान बचाने की कवायद में अगर कुछ ग़ैर-कानूनी भी करना पड़े, तो उसमें कुछ ग़लत नहीं है.

बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, “स्पीड ब्रेकर का काम है जान बचाना, तो फिर उसके आकार और ऊंचाई से क्या फर्क पड़ता है भला? भारत की सड़कों पर हर साल करीब डेढ़ लाख लोग मारे जाते हैं और सच्चाई ये है कि इस आंकड़े को कम करने में स्पीड ब्रेकर एक अहम भूमिका निभा रहे हैं, फिर चाहे वो कानूनी रूप से बने हों, या ग़ैर-कानूनी रूप से.”

बेतरतीब बने स्पीड ब्रेकर से चोट खाए लोग शायद डॉ मोहन की बात से सहमत न हों.

सेंटर फॉर रोड रिसर्च इस्टिट्यूट के ट्रैफिक इंजिनियरिंग विभाग के अध्यक्ष डॉक्टर एस वेलमुरुगन का कहना है कि अगर दिशा-निर्देशों का पालन किया जाए, तो सुरक्षा के साथ-साथ मुसाफ़िरों का सफर भी सुखदायी हो सकता है.

तो फिर सवाल ये उठता है कि आखिर इन दिशा-निर्देशों का पालन क्यों नहीं होता?

जिम्मेदार कौन?

इस सवाल के जवाब में डॉक्टर एस वेलमुरुगन ने कहा, “दिक्कत ये है कि विभिन्न नागरिक प्राधिकरणों के बीच आपसी तालमेल नहीं है जिसकी वजह से सड़क पर बनने वाले विभिन्न प्रकारों के स्पीड ब्रेकरों पर कोई नज़र नहीं डाल रहा है. इसके अलावा लोग निर्धारित गति का पालन नहीं करते, जिसके चलते कभी-कभी लाल बत्ती से पहले, तो कभी फ्लाईओवरों के ऊपर भी स्पीड ब्रेकर लगाने पड़ते हैं, जो कि एक बेतुकी बात है.”

उनका मानना है कि भारतीय लोगों की ड्राइविंग आदतों को सभ्यता की ओर ले जाने के लिए अधिकारियों को कभी-कभी ऐसे बेतुके फैसले भी लेने पड़ते हैं.

हालांकि लोक निर्माण विभाग यानी पीडब्ल्यूडी के इंजीनियरिंग विभाग के अध्यक्ष दिनेश शर्मा की निजी राय ये है कि सड़कों पर कम से कम स्पीड ब्रेकर होने चाहिए.

लेकिन उनका कहना है कि जहां दुर्घटनाएं होने लग जाती हैं, वहां स्पीड ब्रेकर लगाने के अलावा कोई दूसरा समाधान ईजाद करना मुश्किल है.

और फिर स्पीड ब्रेकर लगवाना इतना मुश्किल काम नहीं है. हां, अगर कानूनी रूप से बनवाना हो, तो ये ज़रूर एक मुश्किल काम है.

ब्रेकरों का बाज़ार

एक आदर्श स्पीड ब्रेकर के मानक कुछ इस प्रकार हैं

सरकारी तरीका तो ये है कि अगर किसी जगह स्पीड ब्रेकर की ज़रूरत महसूस की जाती है, (उदाहरण के तौर पर जहां दुर्घटनाएं बढ़ रही हों या होने की संभावना हो) तो ट्रैफिक पुलिस या रेज़िडेन्ट वेलफेयर असोसिएशन उस प्राधिकरण को आवेदन पत्र लिखती है जिसके अधिकार क्षेत्र में वो सड़क पड़ती है – जैसे कि दिल्ली में पीडब्लूडी, एनडीएमसी, डीडीए या फिर एमसीडी.

आवेदन पत्र पर गौर किया जाता है और इंजीनियरों की सलाह के बाद उन्हें मंज़ूर या नामंज़ूर कर दिया जाता है.

मतलब ये कि जो सड़क बनाते हैं, वे उसका ट्रैफिक कंट्रोल नहीं करते.

तो ज़ाहिर है कि ज़्यादातर मामलों में ट्रैफिक पुलिस के सुझावों को पास कर दिया जाता है क्योंकि वे ट्रैफिक को कंट्रोल करते हैं.

रिहायशी इलाकों के हकदार इतने खुशकिस्मत नहीं हैं, जिसका नतीजा ये कि वे खुद ही कानून को हाथ में लेकर जहां-तहां स्पीड ब्रेकर बनवा देते हैं.

और फिर आजकल रबड़ के स्पीड ब्रेकर (रंबल स्ट्रिप) फैक्ट्रियों में सस्ते दामों में बिकते हैं, जिन्हें कोई भी खरीद कर अपनी गली में लगवा सकता है.

जब मैंने एक रंबल स्ट्रिप बनाने वाली फैक्ट्री के मालिक से बात की तो उन्होंने फटाफट रेट बताकर मुझे आश्वासन दे दिया कि पुलिस या पीडब्लूडी के चक्कर में पड़ने की ज़रूरत ही नहीं है!

क्या आपके आसपास के इलाके में भी बनाए गए हैं कुछ ‘बेतुके’ कमर-तोड़ स्पीड ब्रेकर, जिनसे आपको परेशानी होती है? अगर हां तो हमें एक तस्वीर खींच कर भेजिए hindi.letters@bbc.co.uk पर. इसके अलावा आप हमारे फेसबुक पेज या ट्विटर पर भी तस्वीरें भेज सकते हैं.

(स्पीड ब्रेकरों की अगली कड़ी में पढ़िए – क्यों सहम जाती हैं संपति हाशिम स्पीड ब्रेकर का नाम सुनकर?)