मेरी बेचैनी ने मुझे लेखक बना दिया: प्रतिभा राय

  • 24 मई 2013
प्रतिभा राय

ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित उड़िया लेखिका डॉक्टर प्रतिभा राय का मानना है कि साहित्य को व्यवसाय से अलग रखना चाहिए और उसके व्यवसायीकरण की कोशिश कतई नहीं करनी चाहिए.

बीबीसी के साथ ख़ास बातचीत में उन्होंने कहा कि बाज़ार आधारित साहित्य कभी टिकाऊ नहीं रह सकता.

उनका कहना था कि साहित्य लेखन किसी में जबरन पैदा नहीं किया जा सकता बल्कि व्यक्ति की जन्मजात प्रतिभा और साधना के द्वारा ही कोई महान रचनाकार बन सकता है.

प्रतिभा राय को साल 2011 का ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया गया है.

उन्होंने कई उपन्यास और कहानियां लिखी हैं जिनका लगभग सभी भारतीय भाषाओं में अनुवाद हो चुका है.

'हिंसा की बजाय शांति'

अपने बहुचर्चित उपन्यास 'द्रौपदी' के बारे में वो कहती हैं, "इस उपन्यास का नाम द्रौपदी है और कहानी भी उसी काल की है, लेकिन उसके पात्र आज के युग के हैं. उपन्यास में यही दिखाया गया है कि नारी के लिए समाज में दोहरी व्यवस्था है जो कि उस युग में भी थी और आज के युग में भी है."

वो कहती हैं कि उपन्यास का संदेश यही है कि इसमें द्रौपदी भगवान कृष्ण से अपील करती है कि वो इस तरह से बाँसुरी बजाएं कि शक्तिशाली लोग युद्ध और हिंसा की बजाय शांति की ओर उन्मुख हों.

'अनुवाद ज़रूरी है'

उनके मुताबिक भारत की विभिन्न भाषाओं के साहित्य को एक-दूसरे के पाठकों से परिचित कराना बहुत ज़रूरी है. इसके लिए अनुवाद के क्षेत्र में व्यापक स्तर पर काम होना चाहिए.

हिन्दी में अनूदित उनकी पुस्तकें बेहद लोकप्रिय हैं

वो कहती हैं, "हमारे यहां भारतीय भाषाओं के साहित्य के अनुवाद के लिए सिर्फ सरकारी संस्थाएं ही हैं, जबकि इस दिशा में निजी संस्थाओं को भी आगे आना चाहिए. जब तक एक-दूसरे की भाषा के साहित्य को नहीं जोड़ेंगे तब तक साहित्य का समुचित विकास नहीं हो सकता."

अपने साहित्यिक जीवन के बारे में वो कहती हैं कि उन्होंने कविताएं बचपन से ही लिखनी शुरू कर दी थीं और ये तय कर लिया था कि आगे चलकर उन्हें लेखक ही बनना है.

वो कहती हैं, "मैं विज्ञान की विद्यार्थी थी, बावजूद इसके साहित्य लेखन की मेरे भीतर एक बेचैनी थी और वही बेचैनी मुझे लिखने के लिए प्रेरित करती थी."

प्रतिभा राय ने बीबीसी को बताया कि उन्होंने उड़ीसा की एक प्रमुख आदिम जाति बुंडा जनजाति की जीवन शैली पर एक उपन्यास लिखा जो उन्होंने उन आदिवासियों के बीच रहकर लिखा.

बुंडा जनजाति

प्रतिभा राय ने बीस से भी ज़्यादा उपन्यास लिखे हैं

वो बताती हैं, "ये एक ऐसी जनजाति है जिसके पास कोई जा नहीं सकता क्योंकि ये लोग किसी भी बाहरी व्यक्ति को मार डालते हैं. लेकिन ये लोग औरतों को नहीं मारते और इसी वजह से मैंने उनके बीच जाने का जोखिम उठाया और उन पर अपना उपन्यास लिखा."

प्रतिभा राय ने उड़ीसा में आए भयानक चक्रवात पर भी एक उपन्यास लिखा था.

प्रतिभा राय के अब तक 20 उपन्यास, 24 लघुकथा संग्रह, 10 यात्रा वृत्तांत, दो कविता संग्रह और कई निबंध प्रकाशित हो चुके हैं.

उनकी प्रमुख रचनाओं का देश की प्रमुख भारतीय भाषाओं व अंग्रेजी समेत दूसरी विदेशी भाषाओं में अनुवाद हुआ है.

ज्ञानपीठ पुरस्कार भारतीय ज्ञानपीठ न्यास द्वारा भारतीय साहित्य के लिए दिया जाने वाला सर्वोच्च पुरस्कार है. यह पुरस्कार भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में उल्लिखित 22 भाषाओं में से किसी भाषा के लेखक को प्रदान किया जाता है.

अभी तक हिन्दी और कन्नड़ भाषाओं के लेखकों को सबसे ज़्यादा बार ये पुरस्कार मिल चुका है. दोनों भाषाओं के लेखकों को सात-सात बार ये पुरस्कार मिला है.

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