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कांग्रेस की राह के 11 रोड़े

 शुक्रवार, 3 मई, 2013 को 09:00 IST तक के समाचार

मई 2009 में जब यूपीए-2 की सरकार आई तब लगा था कि देश में स्थिरता का एक दौर आने वाला है.

सरकार के पास सुरक्षित बहुमत है. सहयोगी दल अपेक्षाकृत सौम्य हैं.

आर्थिक और सामाजिक विकास का एक नया दौर शुरू हो सकता है.

इस घटना के कुछ महीने पहले ही मंदी का पहला दौर शुरू हुआ था. हमारी आर्थिक विकास दर 9 प्रतिशत से घटकर 6 प्रतिशत के करीब आ गई थी. पर उस संकट से हम पार हो गए. अन्न के वैश्विक संकट का प्रभाव हमारे देश पर नहीं पड़ा.

नवम्बर 2009 में भारत ने इंटरनेशनल मॉनीटरी फंड से 200 टन सोना खरीदा. इस खरीद का यों तो कोई खास अर्थ नहीं. पर प्रतीक रूप में महत्व है. इस घटना के 18 साल पहले 1991 में जब हमारा विदेशी मुद्रा रिजर्व घटकर दो अरब डॉलर से भी कम हो गया था, हमें अपने पास रखे रिजर्व सोने में से 67 टन सोना बेचना पड़ा था.

इसके अगले साल यानि 2010 तक देश के उत्साह में कमी नहीं थी. एक अप्रैल 2010 को हमने हर बच्चे को शिक्षा का अधिकार दिया. आर्थिक इंडिकेटर्स भी ठीक थे. पर जून आते-आते हालात बदल गए. और तब से पिछले तीन साल में कांग्रेस की कहानी में बुनियादी पेच पैदा हुए हैं. स्क्रिप्ट भटक गई है.

सबसे बड़ी बात यह कि लालकृष्ण आडवाणी के पराभव के बाद रसातल की ओर जा रही भारतीय जनता पार्टी को नकारात्मक प्रचार का फ़ायदा मिला और कांग्रेस को नुकसान.

इस दौरान कांग्रेस को केवल एक बड़ी राजनीतिक सफलता मिली है. वह है राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति पद पर उसके प्रत्याशियों की जीत. इस बात को जानने की कोशिश करें कि वे कौन से बिन्दु हैं जो कांग्रेस को परेशान करते हैं.

विवाद और घोटाले

कॉमन वेल्थ गेम्स ट्रेक

पिछले पचास साल में ऐसा कोई बरस नहीं गया होगा, जब किसी घोटाले पर से पर्दा न उठा हो.

पर हाल के वर्षों में झड़ी जैसी लग गई है.

मधु कोड़ा और सत्यम के मामलों पर हैरत हो रही थी कि कॉमनवैल्थ गेम्स यानी सीडब्ल्यूजी का मामला उठा.

सन 2008 के बीजिंग ओलिम्पिक खेलों में चीन ने अपनी प्रगति को शोकेस किया था.

उम्मीद थी कि 2010 के कॉमनवैल्थ गेम्स में भारत अपनी प्रगति का प्रदर्शन करेगा और 2020 के ओलिम्पिक खेलों की दावेदारी भी पेश करेगा.

कॉमनवैल्थ गेम्स के आधार-ढांचे में हो रही देरी ने मीडिया का ध्यान खींचा और देखते ही देखते ये खेल घोटालों की सूची में शामिल हो गए.

उन्हीं दिनों एंट्रिक्स देवास मामला भी सामने आया था, पर चूंकि उस दिशा में खास काम हुआ नहीं था, इसलिए उसका जिक्र ज्यादा नहीं हो पाया.

पर असली रंग पकड़ा 2जी ने.

सरकार ने पहले तो इसे स्वीकार नहीं किया, फिर किया तो सारा दोष डीएमके के मंत्री ए राजा पर मढ़ दिया.

उधर मुंबई के आदर्श हाउसिंग घोटाले का जिक्र हो ही रहा था कि कोयला ब्लॉकों के आबंटन की कहानियाँ सामने आने लगीं.

घोटालों के बरक्स कुछ दूसरे विवादों ने भी सरकार की फजीहत की.

इनमें सेनाध्यक्ष जनरल वीके सिंह की जन्मतिथि से लेकर चीफ विजिलेंस कमिश्नर पीजे थॉमस की नियुक्ति का मामला था.

इन सबके ऊपर रहा नीरा राडिया टेप विवाद, जिसके छींटे सरकार पर भी पड़े.

खुद कांग्रेसी

बेनी प्रसाद वर्मा

पिछले साल उत्तर प्रदेश के चुनाव में पराजय के बाद पत्रकारों से बातचीत में सोनिया गांधी से किसी ने पूछा, क्या इस हार का कारण नेतृत्व की कमी थी?

सोनिया ने हँसते हुए कहा, "मैं नेतृत्व की कमी के बजाय नेतृत्व की अधिकता कहूँगी. हमारे यहाँ नेता काफी ज्यादा हैं. यह समस्या है."

हाल में केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश ने चाईबासा में पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा कि कांग्रेस के सबसे बड़े दुश्मन कांग्रेसी ही हैं.

कांग्रेस के इतिहास को देखें तो हर दौर में एक कांग्रेसी दूसरे को निपटाता नज़र आएगा. एक के पर निकलते हैं तो दूसरे के कतरे जाते हैं.

कर्नाटक विधान सभा चुनाव में पूर्व मुख्यमंत्री एसएम कृष्णा पूरी तरह किनारे हैं. यह विस्मय की बात नहीं.

गठबंधन अ(धर्म)

सन 1996 के चुनाव में हार और उसके बाद एक के बाद एक मिली-जुली सरकारें बनने के बावजूद कांग्रेस ने गठबंधन के महत्व को नहीं समझा.

वर्ष 1998 का पचमढ़ी शिविर 1996 में हुई पराजय के बाद बदलते वक्त की राजनीति को समझने की कोशिश थी.

उसमें तय किया गया कि हम अकेले चलेंगे.

पर पाँच साल तक सत्ता के बाहर रहने पर सन 2003 के शिमला शिविर में गठबंधन का मतलब समझ में आ गया.

शरद पवार

उसका फौरी लाभ 2004 की जीत के रूप में मिला.

बावजूद गठबंधन के 2004 से 2008 तक कांग्रेस और वाम मोर्चा के रिश्ते (अ)सहयोगी रहे.

2009 के चुनाव में कांग्रेस की ताकत बढ़ी और वाम मोर्चे के दबाव से मुक्ति मिली तो पार्टी के हौसले और बढ़े.

समन्वय की कमी

यूपीए-2 ने न तो कोई साझा कार्यक्रम बनाया और न समन्वय समिति.

बड़े-बड़े फैसले भी उसने सहयोगी दलों से विमर्श के बगैर किए.

नवम्बर 2011 का खुदरा बाजार में विदेशी निवेश का फैसला हो या मार्च 2012 का एनसीटीसी बनाने का निर्णय, सहयोगी दल शोर मचाते रहे.

पिछले साल जुलाई में प्रणव मुखर्जी के राष्ट्रपति पद का प्रत्याशी घोषित होने के बाद कैबिनेट की बैठकों में दूसरे नंबर की कुर्सी को लेकर राकांपा के शरद पवार नाराज़ हो गए.

इसके बाद राकांपा और कांग्रेस के बीच समन्वय समिति बनी.

कांग्रेस अपनी खामियों के लिए हमेशा गठबंधन को ही कोसती रही.

अनाज की कीमतें बढ़ीं तो राहुल गांधी ने कहा, कृषि मंत्रालय हमारे पास नहीं है.

2जी मामले पर मनमोहन सिंह का हमेशा स्टैंडर्ड जवाब रहा गठबंधन की मजबूरी.

सरकार इधर, पार्टी उधर

राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (एनएसी) के रूप में एक और संस्था खड़ी होने से राजनैतिक नेतृत्व बजाय ताकतवर होने के और कमज़ोर हो गया.

यूपीए सरकार और उसकी राजनीति में यह अंतर्विरोध साफ नज़र आया.

एक ओर उदारीकरण और दूसरी ओर लोक-लुभावन नीतियां.

भोजन के अधिकार और भूमि अधिग्रहण कानून को लेकर सरकार और एनएसी के दृष्टिकोण का फ़र्क साफ़ देखा जा सकता था.

यही कारण है कि ये कानून आज तक कोई शक्ल नहीं ले पाए हैं.

कांग्रेस पार्टी इस दौरान गेम चेंजरों की तलाश ही करती रही.

इनमें सबसे बड़ा गेम चेंजर कंडीशनल कैश ट्रांसफर की योजना को माना जा रहा है.

अनिश्चय का बोलबाला

यूपीए सरकार की लगातार बिगड़ती छवि को दुरुस्त करने के लिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 10 मई 2011 को पब्लिक रिलेशनिंग के लिए एक और ग्रुप ऑफ मिनिस्टर्स बनाया.

घोषणा की गई कि इस ग्रुप की हर रोज़ बैठक होगी और मीडिया को ब्रीफ किया जाएगा.

सरकार के भीतर फैसले करने का जज़्बा कमज़ोर पड़ता गया.

ग्रुप ऑफ मिनिस्टर्स को जिम्मेदारियाँ थमाने का चलन शुरू हो गया.

ग्रुप ऑफ मिनिस्टर्स की लाइन लग गई. यूपीए-दो ने सौ से ऊपर जीओएम बनाए होंगे.

सोशल मीडिया

हाल में एक अध्ययन में कहा गया है कि देश की 543 लोकसभा सीटों में 160 सीटों के नतीजों को सोशल मीडिया प्रभावित कर सकता है.

जयपुर में चल रहे चिंतन शिविर में भी विभिन्न मुद्दों के बीच सोशल मीडिया चर्चा का अहम हिस्सा बना था.

पर सरकार तय नहीं कर पाई कि सोशल मीडिया से मदद लेनी है या उसके खिलाफ मोर्चा खोलना है.

फ़ेसबुक पर कमेंट करने वालों की गिरफ्तारी ने सरकार को खासी बदनामी दी.

कपिल सिब्बल सोशल मीडिया पर नियंत्रण के पैरोकार बने.

पर वे खुद इस मीडिया का इस्तेमाल नहीं करते.

कपिल सिब्बल का ट्विटर हैंडल नहीं है. वे ट्वीट नहीं करते.

शशि थरूर को छोड़ कांग्रेस में बहुत कम राजनेता ट्वीट करते हैं.

देश में ट्विटर पर सबसे सक्रिय राजनेता सुब्रह्मण्यम स्वामी और नरेन्द्र मोदी हैं.

दोनों कांग्रेस विरोधी हैं.

अब 100 करोड़ की योजना का नाम सुनाई पड़ा है.

पर सोशल मीडिया का काम रुपयों से नहीं लगन और उत्साह से होता है.

आंध्र में सेल्फ़ गोल

आंध्र प्रदेश में कांग्रेस दो सेल्फ़ गोल करके बैठी है.

तेलंगाना मामले को पहले उठाया और फिर छोड़ दिया.

सन 2004 में चुनावी सफलता हासिल करने के लिए कांग्रेस ने तेलंगाना राज्य बनाने का वादा कर दिया था.

संयोग से केन्द्र में उसकी सरकार बन गई.

तेलंगाना राष्ट्र समिति इस सरकार में शामिल ही नहीं हुई, यूपीए के कॉमन मिनीमम प्रोग्राम में राज्य बनाने के काम को शामिल कराने में कामयाब भी हो गई थी.

नवम्बर 2009 में के चन्द्रशेखर राव के आमरण अनशन को खत्म कराने के लिए गृहमंत्री पी चिदम्बरम ने राज्य बनाने की प्रक्रिया शुरू करने का वादा कर दिया, पर सबको पता था कि यह सिर्फ बात मामले को टालने के लिए है.

कांग्रेस अब कुएं और खाई के बीच खड़ी है.

उधर वाईएसआर रेड्डी के निधन के बाद उनके बेटे जगनमोहन रेड्डी की वाईएसआर कांग्रेस का मुकाबला कर पाना कांग्रेस के लिए मुश्किल लग रहा है.

पिछले दो साल में आंध्र में जितने चुनाव हुए हैं प्रायः सबमें उसे विफलता मिली है.

हिन्दी पट्टी में सफाया

कांग्रेस पार्टी के महत्वपूर्ण नेता उत्तर भारत से आते थे. आज हिन्दी पट्टी में कांग्रेस वस्तुतः गायब है.

उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, और झारखंड में वह सत्ता से बाहर है.

राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा और दिल्ली में वह सत्ता में है, पर लगातार संकट में.

पिछले नौ वर्ष में कांग्रेस को लगातार दो बार से केन्द्र की सत्ता मिली, पर हिन्दी पट्टी में उसकी पकड़ बेहतर नहीं हुई.

वर्ष 1998 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस का एक भी सांसद यूपी से संसद तक नहीं पहुंच पाया था.

वहीं 2009 में कांग्रेस को यूपी में 21 सीटें मिली थीं.

लेकिन 2012 के विधानसभा चुनाव में पार्टी सपा, बसपा और बीजेपी से भी पीछे रही.

सीबीआई

कांग्रेस की संकटमोचक सीबीआई उसके लिए भस्मासुर भी बन सकती है, ऐसा सोचा न था.

ऐसा नहीं कि सीबीआई केवल कांग्रेस का आदेश मानती है.

एनडीए के शासनकाल में सन 1999 में सीबीआई ने राजीव गांधी का नाम बोफोर्स की चार्जशीट में डाला था.

इसमें क्वात्रोक्की की भूमिका का भी जिक्र किया गया था.

और सन 2004 में दिल्‍ली हाईकोर्ट ने पूरे मामले को खत्‍म कर दिया.

फ़िलहाल सब मानते हैं कि केन्द्र सरकार को लगातार मिलते बाहरी समर्थन के पीछे सीबीआई का हाथ है.

वे कौन सी बातें हैं जो इस्पात जैसे मजबूत नेताओं को मौका पड़ने पर नरम बना देते हैं? सीबीआई ऐसा क्या करती है कि हर नेता सीबीआई की आलोचना करता है? और क्या वजह है मौका आने पर उसे आज़ाद कराने से हाथ खींच लेता है?

अन्ना-आंदोलन और लोकपाल

लोकपाल कानून को लेकर टालमटोल भी कांग्रेस के रास्ते में बड़ी बाधा साबित होगी.

लोकपाल आंदोलन स्वतः स्फूर्त आंदोलन नहीं था.

इसकी योजना कुछ लोगों ने बनाई थी. पर उस आंदोलन के साथ देश के बड़े मध्यवर्ग की हमदर्दी थी.

उसे सफल बनाने का काम सरकार ने किया.

पहले इसकी उपेक्षा की, फिर एक संयुक्त ड्राफ्टिंग कमेटी बना ली.

फिर अपनी मर्जी से ड्राफ्ट बनाया.

बाबा रामदेव के स्वागत में पहले मंत्री गए, फिर रात में लाठी चलवा दी.

पहले अन्ना हजारे को गिरफ्तार किया, फिर संसद की मंशा का प्रस्ताव पास करा दिया.

और दिसम्बर 2011 के आखिरी हफ्ते में एंटी क्लाइमैक्स होने दिया.

इसके बाद पलट कर इस तरफ देखा भी नहीं.

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