भिंडरावांला 'चरमपंथी' या फिर 'शहीद'?

  • 1 मई 2013

स्वर्ण मंदिर परिसर में ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार’ के दौरान मारे गए चरंमपथी नेताओं की याद में बने ‘शहीद’ स्मारक की राजनीति गरमा गई है.

विवाद इस बात को लेकर है कि ये स्मारक ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार’ में मारे गए लोगों की याद में हैं, लेकिन इस गुरुद्वारा रुपी स्मारक में कई जगहों पर जनरैल सिंह भिंडरावाला का नाम क्यों खुदा है.

यही नहीं, गुरुद्वारे के भीतर लगी घड़ी पर भी भिंडरावाले की तस्वीर छपी है.

देखिए:तस्वीरों में ऑपरेशन ब्लू स्टार का स्मारक

जनरैल सिंह भिंडरावाला दमदमी टकसाल के 14 वें मुखी थे और वो पंजाब में पृथकतावादी आंदोलन को चला रहे थे.

5 जून, 1984 को भारतीय सेना ने स्वर्ण मंदिर को चरंपथियों से मुक्त कराने के लिए अभियान चलाया और इस ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार’ में जनरैल सिंह भिंडरावाला की अगुआई में सैकड़ों सशस्त्र चरमपंथी मारे गए.

तस्वीरें: ऑपरेशन ब्लू स्टार पहले और बाद का मंजर

लंबा विवाद

इस स्मारक के बनाए जाने को लेकर लंबे समय से विवाद था और जब इसे बनाए जाने को अनुमिति मिली तो मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने कहा था कि स्मारक एक गुरुद्वारा ही होगा और इसमें किसी की फोटो या नाम नहीं लिखा जाएगा.

चाहे वो गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के प्रमुख हों या अकाल तख्त के जत्थेदार हों या फिर दमदमी टकसाल के वर्तमान प्रमुख हरनाम सिंह हों, हर बड़ा धार्मिक नेता स्मारक के उद्धाटन पर वहाँ मौजूद था.

यहाँ जनरैल सिंह भिंडरावाला और उनके सहयोगियों को ‘शहीद’ का दर्जा दिया गया है,

पर्दे के पीछे की राजनीति

तो सवाल ये है कि पंजाब की राजनीति मे भिंडरावाला इतने महत्वपूर्ण क्यों हैं?

ओपन पत्रिका के राजनीतिक संपादक हरतोष बल कहते हैं, “भिडरावांले का इस्तेमाल करके कांग्रेस ने एक बार अकालियों के जनाधार को खत्म करने की कोशिश की थी, इसलिए अकालियो को लगता है कि पंजाब में अगर किसी तरह का खतरा अकालियों पर आएगा तो वो कट्टरपंथियों से ही आएगा, इसलिए सामने तो वो संविधान की बात करते हैं, पर पीछे से मौके बे मौके वो इस तरह के काम करते रहते हैं, ताकि कट्टरपंथी उनके हक में रहें.”

शहीद कौन भिंडरावाला या सैनिक

लेकिन इस ऑपरेशन ब्लू स्टार में न सिर्फ चरमपंथी मारे गए थे, बल्कि आम श्रद्धालुओं के साथ-साथ सेना के सैकड़ों जवान भी मारे गए थे.

पंजाब में चरमपंथ का भीषण दौर देख चुकीं पूर्व मंत्री और वर्तमान में भारतीय जनता पार्टी की उपाध्यक्ष लक्ष्मीकांता शहीदी यादगार के बनाए जाने का विरोध करती हुई कहती हैं, “शहीद कौन है जनरैल सिंह भिंडरावाला या फिर सेना के जवान. शहीद स्मारक तो उन सैनिकों का बनना चाहिए, जिनके परिवार अनाथ हो गए, या फिर उन लोगों का जिन्होंने पंजाब में हत्याओं का सिलसिला जारी रखा.”

वो आगे कहती हैं कि ये उस भिंडरावाला का महिमामंडन है जो चरमपंथी था और जिसने न सिर्फ पंजाब को चरमपंथ के रास्ते पर डाल दिया बल्कि हिंदुओं की हत्याओं के लिए प्रेरित किया

ये एक तथ्य है ये ऑपरेशन ब्लू स्टार ही था जिसके बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की हत्या हुई और पंजाब में हत्याओं का सिलसिला चल पड़ा.

जनरैल सिंह भिंडरावाला के बेहद करीबी सहयोगी रहे कट्टरपंथी सरदार मोकम सिंह कहते हैं, “अगर आपके घर में कोई घुसपैठिया आ जाए तो आप क्या करेंगे? सेना ने हमारे घर में घुसपैठ की थी, न कि हमने. और घुसपैठिए शहीद नही होते. सेना ने हमारे लिए सबसे पूज्य हरमंदर साहब को अपवित्र किया. हमारे लिए शहीद भिंडरावाला और उनके साथी हैं, न कि सैनिक.”

29 साल बाद भिंडरावाला के महिमामंडन की ज़रूरत क्या है. इस सवाल पर ऑपरेशन ब्लू स्टार के दौरान भिंडरावाला के साथ मारे गए अमरीक सिंह के बेटे कहते हैं, “भिंडरावाला ने सिखों के लिए वो किया है जो कोई नहीं कर सका. जख्मों को हरा ही रहना चाहिए, ताकि ये कभी भरे नहीं.”

महिमामंडन

आज पंजाब में तमाम युवाओं को भिंडरावाला की तस्वीर वाली टीशर्ट पहने देखा जा सकता है.

तमाम लोग ऐसे हैं जिनके घरों में उनकी तस्वीरें लगीं हैं, गाड़ियों के शीशे पर भिंडरावाला नजर आते हैं. ऐसा क्यों?

पत्रिका 'ओपन' के राजनीतिक संपादक हरतोष बल कहते हैं, “पंजाब की नई पीढ़ी ने तो ऑपरेशन ब्लूस्टार देखा, और ना ही पंजाब की वीभत्स हिंसा देखी, या फिर उस वक्त वो बेहद छोटे थे, भिंडरावाला के बारे में जो कुछ सुना है, उसकी सच्चाई कोई नहीं जानता, सिर्फ मिथक ही लोगों को पता है.”

“कभी किसी भी धार्मिक दल या तत्वों ने भिंडरावाला की विरासत को सीधे चुनौती नहीं दी. कोई ये कहने को तैयार नहीं है कि भिंडरावाला सिखों के लिए कितने खतरनाक इरादे वाले और कितने कट्टरवादी थे”

भिंडरावांले शहीद हैं या फिर चरमपंथी, इस बात पर बहस ऑपरेशन ब्लू स्टार के 29 साल बाद भी जारी है.

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