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बजट सत्र के दूसरे चरण में सुधार का एजेंडा

 सोमवार, 22 अप्रैल, 2013 को 07:10 IST तक के समाचार
मनमोहन सिंह, सोनिया गांधी

क्लिक करें बजट सत्र के दूसरे चरण में कांग्रेस के नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार वित्त विधेयक 2013 समेत कुछ प्रमुख आर्थिक सुधारों को संसद से मंजूरी दिलाने की कोशिश में है.

21 फरवरी को शुरू हुए संसद के बजट सत्र का दूसरा चरण 10 मई को समाप्त होगा.

बजट सत्र के दूसरे चरण में कुल 13 बैठकें होनी हैं और कई क्लिक करें विधेयक पास किए जाने का इंतजार कर रहे हैं.

हालांकि उनकी क्लिक करें वरीयता सूची को लेकर स्थिति अभी तक स्पष्ट नहीं हो पाई है.

पिछले साल 8 मई को क्लिक करें वित्त विधेयक पारित कर दिया गया जबकि बजट सत्र का समापन 22 मई को हुआ था.

इस साल क्लिक करें संसदीय कार्य मंत्री कमल नाथ ने छह और सात मई को वित्त विधेयक पर बहस कराए जाने का प्रस्ताव किया है.

बहरहाल इस प्रस्ताव को मीरा कुमार की अगुवाई वाली लोकसभा के काम काज से जुड़ी समिति की मंजूरी की जरूरत है.

चिदंबरम के जवाब का इंतजार

संसद के समक्ष लंबित विधेयक

वित्त विधेयक, 2013

राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा विधेयक, 2011

भूमि अधिग्रहण विधेयक, 2011

बीमा संशोधन विधेयक, 2008

पेंशन विधेयक, 2011

फ़ॉरवर्ड कॉन्ट्रैक्ट्स (रेगुलेशन) अमेंडमेंट बिल, 2010

कंपनी विधेयक, 2012

लेकिन प्रस्तावित कानूनों की अहमियत को देखते हुए इस बात की संभावना जताई जा रही है कि सरकार वित्त विधेयक के अलावा पांच अन्य विधेयक पारित कराना चाहेगी.

ये विधेयक खाद्य सुरक्षा, भूमि अधिग्रहण, बीमा पेंशन और उपभोक्ता वस्तुओं के कारोबार से संबंधित हैं.

हालांकि सरकार बजट सत्र के पहले चरण में 68 विधेयक पारित कराए जाने के लिए सूची में रखे गए थे.

इनमें सरकार 11 विधेयक ही पारित करवा सकी थी जिनमें रेलवे, आम बजट और झारखंड राज्य से जुड़े नौ लेखानुदान मांगें थीं और दो महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराध से जुड़े थे.

विदेशी निवेशक, उद्योग जगत खास तौर पर ऑटोमोबाइल सेक्टर और कॉमोडिटी बाजार से जुड़े लोग वित्त विधेयक पर वित्तमंत्री पी चिदंबरम के जवाब का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं.

ऑटोमोबाइल क्षेत्र के कारोबारी सरकार से स्पोर्ट्स यूटिलिटी व्हीकल (एसयूवी) पर उत्पाद शुल्क में कुछ राहत की उम्मीद कर रही है.

जबकि कॉमोडिटी कारोबार से जुड़े लोग गैर कृषि उत्पादों की खरीद-बिक्री पर लगने वाले प्रस्तावित टैक्स को लेकर किसी फैसले का इंतजार कर रहे हैं.

खाद्य सुरक्षा विधेयक

राजग नेता

विपक्ष कई मुद्दों पर सरकार को घेरने की कोशिश कर सकता है.

संसद की मंजूरी का इंतजार कर रहे अन्य प्रस्तावित कानूनों में बजट सत्र के दूसरे चरण में खाद्य सुरक्षा विधेयक के भविष्य पर सबकी नजर होगी.

इस प्रस्तावित कानून के तहत देश की तकरीबन 67 फीसदी आबादी को एक निश्चित मात्रा में तीन रुपए प्रति किलो की दर से गेहूं, दो रुपए की दर से चावल और एक रूपए किलो की दर से मोटा अनाज मुहैया कराने की महत्वाकांक्षी परियोजना पर सरकार काम कर रही है.

खबरों के मुताबिक अगले साल होने वाले आम चुनावों के मद्देनजर सरकार इस विधेयक को अपनी वरीयता सूची में सबसे ऊपर रख सकती है.

इससे पहले गुरुवार को हुई सर्वदलीय बैठक के बाद भूमि अधिग्रहण विधेयक के मुद्दे पर केंद्रीय मंत्री कमल नाथ और भाजपा नेता सुषमा स्वराज ने कहा था, “भूमि अधिग्रहण विधेयक से जुड़े ज्यादातर मसलों पर सहमति बन गई है.”

भाजपा ने कहा है कि सरकार ने उनकी तरफ से दिए गए 12 में से 11 सुझावों को मान लिया है.

हालांकि इस विधेयक से जुड़े दो मसलों पर अभी तक आम सहमति नहीं बनाई जा सकी है.

इनमें एक मुद्दा है अधिग्रहण से प्रभावित होने वाली सभी पार्टियों की सहमति ली जानी चाहिए या नहीं और दूसरा राज्य सरकारों की तरफ से किया जाने वाला अधिग्रहण है.

बीमा और पेंशन क्षेत्र

"भूमि अधिग्रहण विधेयक से जुड़े ज्यादातर मसलों पर सहमति बन गई है. सरकार ने भाजपा की तरफ से दिए गए 12 में से 11 सुझावों को मान लिया है."

सुषमा स्वराज, लोकसभा में विपक्ष की नेता

इसके अलावा वित्तीय क्षेत्र में सुधारों को लागू करने के सरकारी एजेंडे में बीमा और पेंशन जैसे महत्वपूर्ण विधेयक भी हैं.

प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री हाल के समय में प्रस्तावित बीमा कानून को पास करवाने पर काफी कुछ कहते रहे हैं.

यह विधेयक बीमा क्षेत्र में विदेशी निवेश की मौजूदा सीमा 26 फीसदी से बढ़ाकर 49 फीसदी किए जाने का प्रस्ताव करता है.

विदेशी निवेश की यह सीमा पेंशन क्षेत्र की तरह ही होगी.

कॉमोडिटी बाजार में भविष्य के कारोबारी सौदों के विनियमन से जुड़ा संशोधन विधेयक लंबे समय से संसद की मंजूरी का इंतजार कर रहा है.

इसके तहत कॉमोडिटी मार्केट में फ्यूचर ट्रेडिंग में बैंकों को भागीदारी का मौका दिया जाना है.

सर्वदलीय बैठक

हामिद अंसारी

राज्यसभा सदस्यों के बर्ताव को लेकर सभापति व्यथित हैं.

इस बीच बजट सत्र के दूसरे चरण की पूर्व संध्या पर राज्य सभा की सुचारू कार्यवाही को लेकर रविवार को राज्य सभा के सभापति हामिद अंसारी, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और विभिन्न पार्टियों के वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी में एक बैठक हुई.

इस बैठक में सदस्यों की अनुशासनहीनता और सदन की कार्यवाही का टीवी पर सीधे दिखाए जाने वाले प्रसारण को कुछ विलंब के साथ प्रसारित किए जाने के मुद्दे पर किसी आम सहमति तक नहीं पहुंचा जा सका.

राज्य सभा के सभापति हामिद अंसारी ने कहा है कि सदन में कुछ सदस्यों के व्यवहार को लेकर बहुद दुखी और व्यथित हैं.

उन्होंने कहा कि हाल के दिनों में सदन का स्थगन बार-बार होता रहता है, और अगर ये जारी रहता है तो प्रजातंत्र के सबसे अहम मंच माने जानेवाले संसद की गरिमा लोगों की निगाह में कम हो जाएगी.

हामिद अंसारी ने कहा कि अगर यही हाल रहा तो लोग संसद की ज़रूरत पर ही सवाल उठाने लगेंगे.

बैठक के दौरान उन्होंने राज्य सभा के नियमों में बदलाव का सुझाव भी दिया.

सांसदों का आचरण

"सांसदों की सदस्यता स्वंय निलंबित होने के प्रावधान से ये खतरा पैदा हो सकता है कि सरकार इसका इस्तेमाल सदस्यों को खामोश कर विधेयकों को पास करवाने या किसी दूसरे कामों के लिए कर सके."

अरुण जेतली, राज्यसभा में विपक्ष के नेता

इसमें गड़बड़ी फैलाने वाले सांसदों की सदस्यता अपने आप ख़त्म हो जाने, सभा की कार्यवाही को थोड़े विलंब से प्रसारित करने, और उपद्रवी सदस्यों के नामों को सदन के बुलेटिन में शामिल करने जैसी सिफारिशें शामिल थीं.

हामिद अंसारी 23 मार्च को हुई उस घटना को लेकर बहुत चिंतित थे जिसमें तमिलनाडु के राजनीतिक दल अन्नाद्रमुक के कुछ सदस्यों ने सदन में काग़ज़ के टुकड़े उछाले और माइक तोड़ डाले थे. ये लोग राज्य सभा में श्रीलंका में तमिलों के खिलाफ़ हो रहे कथित भेद भाव का मुद्दा उठाना चाहते थे.

लेकिन सभापति के इस सुक्षाव को नेताओं का समर्थन हासिल नहीं हो सका.

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के नेता डी राजा ने सांसदों को उपद्रवी कहने पर ऐतराज़ जताया तो कुछ ने इसकी तुलना सदस्यों की आवाज़ दबाने से की.

राज्य सभा में विपक्ष के नेता अरूण जेटली का कहना था कि इससे ये खतरा पैदा हो सकता है कि सरकार इसका इस्तेमाल सदस्यों को खामोश कर विधेयकों को पास करवाने या किसी दूसरे कामों के लिए कर सके.

जानकारों का ये भी कहना है कि विपक्ष के सदस्यों को कई बार वाकआउट, अध्यक्ष के आसन के सामने जैसे कामों के लिए इसलिए मजबूर होना पड़ता है क्योंकि उनकी बात सुनने को, या अहम मामलों पर चर्चा के लिए सरकार तैयार नहीं होती है.

बजट सत्र के दूसरे हिस्से में भी कई महत्वपूर्ण विधेयकों पर चर्चा होनी है जिसमें कई मुद्दों पर राजनीतिक दलों में गहरे मतभेद हैं.

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