बड़े सिर वाली रूना की गूंजेगी किलकारी?

  • 20 अप्रैल 2013
रुना बेगम के मुफ्त इलाज के लिए सामने आया गुड़गांव का एक अस्पताल.

महज़ 16 महीने की उम्र में अपने लगातार बढ़ते सिर के चलते जिंदगी और मौत से जूझ रही त्रिपुरा की मासूम रुना बेगम को नई जिंदगी मिल सकती है.

गुड़गांव का एक अस्पताल बच्ची की इलाज के लिए सामने आया है. अस्पताल प्रबंधन ने बच्ची और उसके गरीब माता-पिता को त्रिपुरा से हवाई जहाज के जरिए नई दिल्ली लाकर गुड़गांव में बच्ची का मुफ्त इलाज शुरू कर दिया है.

पहले दिन डॉक्टरों की टीम ने रुना के सिर का एमआरआई टेस्ट किया है. बच्ची के इलाज़ की देखरेख कर रहे फ़ॉर्टिस अस्पताल के न्यूरोसर्जरी विभाग के प्रमुख संदीप वैश्य ने बीबीसी को बताया, "हमने एमआरआई किया है, अब हम एमआरआई रिपोर्ट की जांच करने के बाद आगे का इलाज़ करेंगे."

लाइलाज नहीं है बीमारी

रूना का इलाज करने वाले चिकित्सकों का मानना है कि ये एकदम लाइलाज और अनोखी बीमारी नहीं है. बल्कि पांच सौ से लेकर एक हजार बच्चों के बीच में एक बच्चे का सिर सामान्य से बड़ा होता है.

लेकिन रुना बेगम का सिर जितना बड़ा हो चुका है, वो अपने आप में इसे रेयरेस्ट केस बना रहा है क्योंकि अस्पताल के डॉक्टरों ने किसी बच्चे का सिर इतना बड़ा नहीं देखा है.

संदीप वैश्य ने बीबीसी को बताया, “एक सामान्य बच्चे के सिर का आकार 36 से 40 सेंटीमीटर तक होता है. जब बच्चे का सिर बढ़ता है तो वो भी सामान्य 55 सेंटीमीटर तक होता है. लेकिन इस बच्ची के सिर का आकार 90 सेंटीमीटर तक पहुंच गया है.”

यही वजह है कि बच्ची की जान बच पाएगी या नहीं ये डॉक्टर भी भरोसे नहीं कह पा रहे हैं. क्या इस बच्ची की जान बच पाएगी?

कुछ भी कहना मुश्किल

इस बारे में पूछने पर सैकड़ों ऐसे मामले देख चुके डॉक्टर संदीप वैश्य ने कहा, "अभी कुछ भी कहना मुश्किल होता है. सिर के बढ़ने से दिमाग को कितना नुकसान हुआ है.इसका अंदाजा लगाना होगा. ऐसे बच्चों के हृदय में भी मुश्किल हो सकती है. दूसरे अंग पर पड़ने वाले प्रभाव को भी देखना होगा."

इस बीमारी के इलाज़ के बारे में डॉक्टर वैश्य के मुताबिक ने कई बार इलाज़ के लिए सर्जरी की जरूरत नहीं पड़ती है, कई बार सर्जरी की जरूरत होती है और अगर दिमाग को ज़्यादा नुकसान हुआ तो सर्जरी से भी बहुत ज़्यादा फ़ायदा नहीं होता.

त्रिपुरा की जिरानिया गांव के एक बेहद गरीब परिवार में जब रूना बेगम का जन्म हुआ तो आस पास के लोग हक्के बक्के रह गए, क्योंकि आम बच्चों के मुक़ाबले रूना का सिर बेहद बड़ा था.

अस्तपाल
फाइल फोटो

एक तो गरीबी और दूसरी जागरुकता के कमी के चलते किसी को मालूम नहीं चला कि रुना एक गंभीर बीमारी की शिकार हो चुकी हैं.

दरअसल रूमा बेगम के दर्द का पता पिछले दिनों मीडिया में उनकी तस्वीर आने के बाद सबको लगा.

अस्पताल ने की मदद

रुना की मुश्किल की ख़बर अस्पताल प्रबंधन तक एक मीडियाकर्मी ने पहुंचाई. उसके बाद उन्होंने अस्पताल प्रबंधन को इस बच्ची के इलाज के लिए तैयार हुआ है.

इस गंभीर बीमारी को हाइड्रोसेफलस कहते हैं. जब ये जन्म से ही हो तो इसे कनजाइटेनल हाइड्रोसेफलस कहते हैं.

इस बीमारी के बारे में न्यूरोसर्जन संदीप वैश्य ने बताया, “दिमाग में जो पानी होता है, वह सरकुलेट होती है, लेकि जब कहीं भी पानी के सरकुलेट का रास्ता बंद हो जाता है, तो बह दिमाग में जमा होने लगता है.”

डॉक्टरों के मुताबिक इस बीमारी का पता गर्भ के दौरान ही चल जाता है और बच्चों में ये बीमारी गर्भ से ही हो सकती है.

मासूम का हौसला कायम

रुना बेगम के इलाज के लिए मिली मदद से रूना के माता-पिता को नई उम्मीद मिली है.

महज दिहाड़ी मजदूर करने वाले अब्दुल रहमान अपनी बेटी की मदद करन वालों के शुक्रगुज़ार हैं जबिक मां फातिमा खातून कहती हैं कि इन लोगों के एहसान को बयां करने के लिए उनके पास कोई शब्द नहीं है.

इन सबके बीच जिंदगी और मौत के बीच झूल रही मासूम रूना की जीजवीषा में कमी नहीं हुई है.

चिकित्सक संदीप वैश्य ने बताया, “वह कुछ खा रही है. सिर हिला नहीं सकती, तो लेटी रहती है.”

अगर डॉक्टरों की कोशिश और परिवार वालों की दुआओं ने असर दिखाया तो रूना भी आम बच्ची की तरह खेलने कूदने लायक हो जाएगी.