फ़ेसबुक के ज़रिए मिली बच्ची को मदद

  • 17 अप्रैल 2013
वजीहा के इलाज के लिए फेसबुक और ईमेल, मैसेजिंग आदि के ज़रिए पैसे जमा किए गए हैं.

तीन महीने की वजीहा फ़ातिमा को शायद ही पता होगा कि जब अस्पताल में उसका इलाज चल रहा था तो उसके लिए फ़ेसबुक पर भी दुआएं की जा रही थीं.

इतना ही नहीं वजीहा के आपरेशन के लिए एक बड़ी राशि फ़ेसबुक के ज़रिए भी जमा हुई है. वजीहा के दिल में छेद था जिसके कारण उसकी जान को ख़तरा पैदा हो गया था लेकिन मुंबई के एक प्रसिद्ध अस्पताल में इलाज के बाद वो स्वस्थ है.

वजीहा के पिता आफ़ताब हुसैन को भी फ़ेसबुक के बारे में ज्यादा पता नहीं है लेकिन उन्हें इतना पता है कि फ़ेसबुक नाम की किसी इंटरनेट जैसी चीज़ के कारण कई लोगों ने उन्हें फोन किए और वजीहा के लिए काफी पैसा भी दिया.

पेशे से ज़रदोज़ी का काम करने वाले आफ़ताब कहते हैं कि उनका काम भी बहुत अच्छा नहीं चल रहा है और अगर लोगों की मदद नहीं मिलती तो बच्ची का आपरेशन नहीं होता.

जन्म से संकट

किस्सा लखनऊ के शीश महल इलाक़े का है जहां तीन महीने पहले वजीहा का जन्म हुआ था. बीमार वजीहा के बारे में स्थानीय डॉक्टरों ने कहा कि जब वो एक डेढ़ साल की होगी तब दिल का आपरेशन होगा लेकिन तीन महीने में ही बच्ची की हालत ख़राब होने लगी.

आफ़ताब बताते हैं, ‘‘जब हम बड़े अस्पताल में गए तब डॉक्टरों ने कहा कि आपरेशन तुरंत करना पड़ेगा क्योंकि दिल की नसें छोटी हैं और छेद भी बड़ा हो गया है. फिर सैयद हुसैन अफसर ने हमारी मदद की.’’

सैयद हुसैन अफसर ने इस मुद्दे को फ़ेसबुक पर रखा और लोगों से मदद की अपील की. इसके बाद लोगों ने आफ़ताब के लिए अच्छी खासी मदद मुहैया कराई.

आफ़ताब के अनुसार फ़ेसबुक पर उनका फ़ोन नंबर आते ही उनके पास कई फोन आए.

वो कहते हैं, ‘‘फ़ोन कई लोगों ने किया. किसी ने पांच हज़ार, किसी ने दस हज़ार और किसी ने पच्चीस हज़ार रुपए की मदद की. लोगों ने दुआएं भी दी और कहा कि हम बच्ची के लिए दुआएं करेंगे. शायद दुआओं ने असर दिखाया और हमें शिव मेनन मिले जिनकी मदद से आपरेशन हो पाया. कना़डा और अमरीका से भी फोन आए थे लोगों के और उन्होंने भी मदद की हमारी.’’

इलाज की शुरुआत

मदद मदद मदद. यही संदेश डाला गया था वजीहा के लिए फेसबुक पर

शिव मेनन डिज़नी-यूटीवी में कार्यरत हैं जिनके सामने अफसर हुसैन के एक परिचित ने यह मुद्दा रखा. मेनन बच्चों के इलाज से लंबे समय से जुड़े रहे हैं.

मेनन ने बीबीसी से बातचीत में कहा, ‘‘बच्चों की हम मदद करते हैं. जब हमें इस बारे में पता चला तो मैंने बच्चों के सबसे अच्छे डॉक्टर सुरेश राव से बात की और डॉक्टर ने कहा कि बच्ची को मुंबई लाना होगा. जब वजीहा मुंबई पहुंची तो बस दो किलो की थी और उसकी हालत ख़राब लग रही थी.’’

वजीहा को तुरंत मुंबई के कोकिलाबेन अस्पताल ले जाया गया जहां डॉक्टर ने उसका ऑपरेशन किया. ऑपरेशन जब दोपहर के ढाई बजे से आठ बजे तक चल रहा था उस समय भी कनाडा, अमरीका और यूएई, लंदन और बंगलौर से भी फोन आए.

मेनन कहते हैं, ‘‘मैंने अपने फोन बुक में जितने लोग थे सबको मैसेज किया. ईमेल किए और फ़ेसबुक पर भी इस बात को रखा तो लोगों ने मिलकर मदद की. ढाई लाख रुपए अस्पताल की फीस थी जो लोगों ने मिलकर मुहैया कराई है. मैं बता नहीं सकता किन लोगों ने पैसे दिए हैं. वो अपना नाम बताना नहीं चाहते. लेकिन सात आठ लोगों ने मिलकर ये पैसे दिए हैं.’’

फ़ेसबुक का सहारा

इस मुद्दे को फ़ेसबुक पर रखने वाले सैयद हुसैन अफसर पत्रकार हैं और वो स्थानीय अखबार संडे आग के संपादक भी. वो बताते हैं कि वो पहले भी कई अन्य मुद्दों को फ़ेसबुक के ज़रिए लोगों के सामने ला चुके हैं और वजीहा के मामले में उन्हें उम्मीद थी कि कोई न कोई मदद ज़रुर मिलेगी.

वो कहते हैं, ''हमने जब फ़ेसबुक पर ये बात रखी थी तो हमने पारदर्शिता बरती थी. हमने अपना फोन नंबर नहीं दिया अपना. बच्ची के पिता का नंबर दिया. उनका बैंक अकाउंट का नंबर दिया. लोगों को सीधे जोड़ने की कोशिश की तो शायद इसी से बात बनी है. पारदर्शिता बहुत ज़रुरी होती है इस तरह की चीज़ों में.''

फ़ेसबुक का इस्तेमाल लोग हर दिन अपनी बात रखने के लिए करते हैं लेकिन यहां किसी ने किसी मदद के लिए बात रखी और किसी ने किसी की किसी और के कहने पर की. सोशल मीडिया की यही खूबी है. वो किसी को कहीं से कहीं जोड़ देता है जहां ये बहुत ज़रुरी नहीं होता कि लोग एक दूसरे को निजी तौर पर जानते हों.