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कालबेलिया नृत्य के तार से जुड़े दो कलाकार

 शनिवार, 13 अप्रैल, 2013 को 01:44 IST तक के समाचार

ये बेल्जियम की माया हैं. भारतीय कालबेलिया नृत्य की दीवानी.

सपेरा जाति का कालबेलिया क्लिक करें नृत्य कभी भारत में राजस्थान तक सीमित था मगर अब इस नृत्य ने पश्चिम के मंचों पर धूम मचाई हुई है.

बेल्जियम की माया इस कालबेलियाई नृत्य की दीवानी हैं.

इस नृत्य ने माया के दिलोदिमाग पर ऐसा असर पैदा किया कि वो अब अपनी मेहनत के दम पर इसमें पारंगत हो गई हैं.

माया और राजस्थान की खातू सपेरा ने मिलकर इस नृत्य विधा के जरिए पूर्व और पश्चिम के बीच संबधों का सेतु खड़ा कर दिया है.

सपेरों की किसी लड़की की तरह क्लिक करें लिबास, झुमके, घुंघरू और वैसी ही भाव-भंगिमा लिए माया जब मंच पर उतरती हैं तो ये भेद करना मुश्किल हो जाता है कि वो भारत की है या कहीं और से आई है.

खूबसूरत मोड़

माया कहती हैं,"बेल्जियम मेरा मायका है और भारत ससुराल."

उन्होंने राजस्थान के ही एक लोक कलाकार से शादी की है और दुनिया के सामने उन्होंने खुद को ‘माया सपेरा’ के नाम से पेश किया है.

"यूरोप में मैं कोरियोग्राफर के साथ काम करती हूं. मगर यूरोपीय नृत्य मुझे थोड़े अधूरे लगते हैं जबकि कालबेलिया एक मुकम्मल नृत्य है."

माया, बेल्जियम की नृत्यांगना

माया ने बताया,"भारतीय नृत्य-संगीत मेरी जिन्दगी में एक खूबसूरत मोड़ की तरह आया."

उन्हें कालबेलिया नृत्य प्रस्तुत करते हुए तेरह साल हो गए हैं. वह कहती हैं कि उनका दिल अब दो हिस्सों में बंट गया है. वो आधी राजस्थानी हैं तो आधी बेल्जियम की हैं.

वह हिंदी में बात करती हैं. हालांकि उन्होंने अरबी, स्पेनिश और अंग्रेजी भी सीख ली है.

माया कहती हैं, " क्लिक करें नृत्य खुद मेरी जिन्दगी के रास्ते में आ गया. ये मेरी पहल नहीं थी, बल्कि भारतीय नृत्य खुद मुझ तक चल कर आया. मैं जब पांच साल की थी, तब भारतीय नृत्य सीखना शुरू किया. यह नृत्य मुझे राजस्थान तक ले आया."

माया बताती हैं कि उनके पति महबूब खान ने ही उनमें कालबेलिया नृत्य के प्रति ललक पैदा की. कालबेलिया नृत्य बहुत ही मनभावन है. इसमें में स्वभाविकता है.

मुकम्मल नृत्य

कालबेलिया नृत्य

खातू और माया की मुलाकात बेल्जियम में हुई और माया ने खातू को अपना गुरु स्वीकार कर लिया

माया बताती हैं,"मैं इसमें थोड़ा फेर-बदल भी कर लेती हूँ. यूरोप में मैं कोरियोग्राफर के साथ काम करती हूं. मगर यूरोपीय नृत्य मुझे थोड़े अधूरे लगते हैं जबकि कालबेलिया एक मुकम्मल नृत्य है."

जोधपुर की खातू सपेरा उस परिवेश और परिवार में पैदा हुईं जहाँ कालबेलिया नृत्य बच्चियों को घुट्टी में ही पिलाया जाता है.

खातू अपनी नृत्य विधा को लेकर दुनिया के बहुत देशों में प्रस्तुति दे चुकी हैं.

खातू और माया की मुलाकात बेल्जियम में हुई और माया ने खातू को अपना गुरु स्वीकार कर लिया. खातू की निगाह में वो उनकी सबसे काबिल और होनहार शिष्या हैं.

खातू के अनुसार,"मुझे माया ने पन्द्रह दिन के लिए बेल्जियम बुलाया. शुरू में माया के लिए यह नृत्य सीखना मुश्किल था क्योंकि दोनों एक दूसरे के लिए नए थे और भाषा भी अलग-अलग थी."

'मिलाप'

खातू बताती हैं,"इन सबके बावजूद हमारे दिल की भाषा एक थी."

" माया में बड़ी लगन है. हम साथ-साथ प्रस्तुति देते हैं तो मुझे बहुत ख़ुशी होती है."

खातू, जोधपुर की सपेरा जाति की एक नृत्यांगना

इस वजह से माया ने जल्द ही कालबेलिया नृत्य के गुर सीख लिए.

खातू बताती हैं, "माया में बड़ी लगन है. हम साथ प्रस्तुति देते हैं तो मुझे बहुत ख़ुशी होती है. जब हम मंच पर साझा प्रस्तुति देते हैं तो देखने वालों को लगता है कि ये भारतीय ही हैं. मगर जब कोई करीब से देखता है तो उसे जरूर माया के नैननक्श और गोरेपन से उसके यूरोपीय होने का भान होने लगता है."

माया और खातू ने 'मिलाप' नाम से एक परियोजना शुरू की है.

माया कहती हैं,"ये मिलाप बेल्जियम और भारत के बीच है, ये मिलाप नृत्य और संगीत के बीच है, ये परम्परा और समकालीन नृत्य विधा का मिलाप है."

उन्होंने कहा,"हमारा पैगाम अमन है क्योंकि हम टीवी पर हमेशा हिंसा की खबरें देखते है. ऐसे में हम शांति का संदेश देना चाहते हैं ,इसमें मिलाप बड़ा काम कर सकता है, क्योंकि संगीत नृत्य सरहदों में बंधे नहीं हैं."

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