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'जब समुद्री डाकुओं ने हमें बंधक बना लिया'...

 सोमवार, 1 अप्रैल, 2013 को 08:53 IST तक के समाचार
प्रीतम साहू

समुद्री लुटेरों की कैद से रिहा होने के बाद लौटे प्रीतम साहू घर वालों के साथ.

प्रीतम साहू ने इंजीनियरिंग में स्नातक की परीक्षा पास करने के बाद मर्चेंट नेवी में अपना करियर बनाने का सपना देखा और एक निजी माल वाहक जहाज़ पर नौकरी कर ली.

सफ़र के पहले ही चरण में उनके साथ वो सब कुछ हुआ जो वो कभी किस्से कहानियों में ही पढ़ा करते थे. वे उन 22 लोगों में थे जिन्हें क्लिक करें सोमालिया के क्लिक करें समुद्री डाकुओं नें एक साल से भी ज्यादा क्लिक करें बंधक बनाए रखा.

पूरा एक साल क्लिक करें पानी के जहाज पर बिताने के बाद आखिरकार प्रीतम रिहा हुए और छत्तीसगढ़ में अपने घर राजनंदगांव पहुंचे. बीबीसी से एक लंबी बातचीत में प्रीतम साहू ने अपनी आपबीती सुनाई. पेश है प्रीतम के अनुभवों की कहानी उन्हीं की जुबानी जो उन्होंने बीबीसी संवाददाता सलमान रावी से बाँटे.

समंदर की खामोश लहरों के दरम्यां

"हमारे जहाज की उम्र 30 साल हो चुकी थी और वह दिन भर में 200 नॉटिकल मील का ही सफ़र तय कर सकता था. हम समुद्री डाकुओं के डर की वजह से सोमालिया से काफी दूरी बनाते हुए चल रहे थे"

प्रीतम साहू

29 फरवरी 2012 की शाम मौसम बेहद साफ़ था. तकरीबन पौने चार बजे के आसपास समंदर की खामोश लहरों के दरम्यां हमारा जहाज एमटी रॉयल ग्रेस हिंद महासागर के बीचो बीच बढ़े चले जा रहा था.

एक महीने तक दुबई के क्लिक करें बंदरगाह पर रहने के बाद हमारा जहाज़ निकल चुका था. बीच समंदर में आते आते जहाज़ ने अपनी रफ्तार पकड़नी शुरू कर दी. चूंकि दुबई के बंदरगाह पर हमने माल उतार दिया था इसलिए जहाज़ खाली था.

हमारे जहाज की उम्र 30 साल हो चुकी थी और वह दिन भर में 200 नॉटिकल मील का ही सफ़र तय कर सकता था. हम समुद्री डाकुओं के डर की वजह से क्लिक करें सोमालिया से काफी दूरी बनाते हुए चल रहे थे.

ओमान पार कर चुके थे और हमारा गंतव्य था नाइजीरिया. हमारा जहाज भी नाइजीरिया का था और उसका मालिक भी वहीं रहता है. इस सफर के बीच में हमें दक्षिण अफ्रीका के केप टाउन शहर में भी रुकना था.

( ये रिपोर्ट बीबीसी संवाददाता सलमान रावी से बातचीत पर आधारित है. डायरी के अगले भाग में पढ़िए किस तरह खाने और दवाइयों के आभाव में बंधकों ने जहाज़ पर गुज़ारा किया.)

गोलियां चलाते हुए वो हमारे जहाज़ तक पहुँचे

समुद्री लुटेरे

सोमालिया के आसपास मालवाहक जहाजों पर लुटेरों का खतरा बना रहता है.

तभी समंदर में दूर मछुआरों का एक जहाज़ नज़र आया. थोडा अटपटा सा भी लगा कि बीच समंदर में मछुआरों के जहाज़ का भला क्या काम? फिशिंग बोट तो ज़्यादातर सागर किनारे ही रहते हैं. फिशिंग बोट का किनारे से समंदर के इतने बीच में नज़र आना थोडा अस्वाभाविक था.

थोड़ी देर में हमारी नज़र एक 'स्पीड बोट' पर पड़ी. वो तेज़ी के साथ हमारे जहाज़ की तरफ आ रही थी. दूरबीन से देखा उसमे 9 से 10 लोग सवार थे. करीब आते आते उन्होंने गोलियां चलानी शुरू कर दी थी. उनके पास आधुनिक हथियार थे.

गोलियां चलाते हुए वो हमारे जहाज़ तक पहुँच चुके थे. हम कुछ नहीं कर सकते थे क्योंकि स्पीड बोट की रफ़्तार बहुत तेज़ थी. वहां से भागने का कोई उपाय नहीं था.

स्पीड बोट से आए लोगो ने हमारे जहाज़ पर रस्सियां फेंकनी शुरू कर दी और उसके सहारे ऊपर चढ़ने लगे. अब तक हमें आभास हो चुका था कि ये समुद्री डाकू ही हैं.

जहाज़ पर कुल 22 लोग थे

"बंदूकें भिड़ा कर उन्होंने हमें बंधक बना लिया. हमारे जहाज़ पर कुल २२ लोग थे, जिसमे 17 भारतीय, तीन नाईजीरियाई, एक बांग्लादेशी और एक पाकिस्तानी शामिल हैं"

प्रीतम साहू

फिर बंदूकें भिड़ा कर उन्होंने हमें बंधक बना लिया. हमारे जहाज़ पर कुल 22 लोग थे, जिसमे 17 भारतीय, तीन नाईजीरियाई, एक बांग्लादेशी और एक पाकिस्तानी शामिल हैं.

मैं उस वक़्त इंजन रूम में काम कर रहा था तभी ऊपर केबिन से हमें फोन आया सब ऊपर आ जाओ. ऊपर पहुंचे तो सब बंधक बने हुए थे. हमें भी उन्ही के साथ कतार में खड़ा कर दिया गया.

समुद्री डाकुओं का मूड ख़राब था. इन में से सभी को अंग्रेजी नहीं आती थी. सिर्फ एक या दो ही ऐसे थे जो अंग्रेजी में बात कर सकते थे.

हमारे जहाज़ पर क़ब्ज़ा करने वाले समुद्री डाकुओं का नेतृव कर रहा था छोटे क़द का 'गैन्नी'. वह बड़ा ही डरावना दिख रहा था. उसका एक दांत सोने का था.

बंदूकों के साए में बंधक बने रहे

प्रीतम साहू

प्रीतम के लिए वो सफर कभी न भूलने वाला सफर बन गया.

सबसे पहले उन्होंने मछुआरों की कश्ती को छोड़ दिया. हमने उन्हें डीज़ल और खाना दिया. फिर वो कश्ती वहां से चली गई. हमें लगा कि ये मछुआरों की कश्ती ईरान की थे और उसमे 11 लोग सवार थे. फिर वो कश्ती वहां से चली गई.

समुद्री डाकू अमूमन मछुआरों की कश्तियों का इस्तेमाल बड़े जहाज़ पकड़ने के लिए करते हैं. अब समुद्री डाकुओं का क़ब्ज़ा हमारे जहाज़ पर पूरी तरह हो गया था.

तभी गैन्नी ने घोषणा की कि वो अब हमारे जहाज़ का कप्तान है और जहाज़ को सोमालिया की तरफ मोड़ दिया गया. उनके पास 'ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम' (जीपीएस) था और उसी के हिसाब से हमारे सफ़र की दिशा तय की गयी.

इस बीच जहाज़ के हमारे सभी साथी बंदूकों के साए में बंधक बने रहे. सभी समुद्री डाकुओं के पास एके-47 रायफलें थीं. इस गिरोह के बड़े ओहदेदारों के पास माऊज़र थे. उनके पास रॉकेट लांचर भी थे.

वे बेहद क्रूर थे, किसी को हिलने भी नहीं देते

"हमने समुद्री डाकुओं से कहा कि हमारा जहाज़ पुराना है, खाली है और मालिक ज्यादा पैसे नहीं दे सकेगा. हमने उनके सामने प्रस्ताव रखा कि वो हमारे जहाज़ से चल कर दूसरे किसी जहाज़ को हाईजैक कर लें और हमें छोड़ दें"

प्रीतम साहू

इस बीच सबको जहाज़ के ब्रिज पर ही बंधक बनाए रखा गया. उन्होंने हमारे जहाज़ के मालिक के बारे में पूछा और जहाज़ पर हमारे नाइजीरियाई साथिओं से कहा कि वो मालिक को फोन कर बता दें कि जहाज़ हाइजैक कर लिया गया है.

हमने समुद्री डाकुओं से कहा कि हमारा जहाज़ पुराना है, खाली है और मालिक ज्यादा पैसे नहीं दे सकेगा. हमने उनके सामने प्रस्ताव रखा कि वो हमारे जहाज़ से चल कर दूसरे किसी जहाज़ को हाईजैक कर लें और हमें छोड़ दें.

मगर नाईजीरियाई साथियों ने उनसे कह दिया कि मालिक पांच अरब डालर तक दे सकता है क्योंकि वो काफी पैसे वाला है. समुद्री डाकुओं ने कहा कि जहाज़ पर कुछ नहीं है तो वे मालिक से हमारी जान की कीमत वसूलेंगे.

शुरूआत में वे बेहद क्रूर थे. वो किसी को हिलने भी नहीं देते थे. हमारे तीसरे इंजीनियर साथी ने एक दो क़दम चलने की कोशिश की तो उन्हें बुरी तरह पीटा गया.

(प्रीतम की डायरी के पहले भाग में आपने पढ़ा कि किस तरह उनका जहाज़ हाईजैक किया गया. अगले भाग में पढ़िए किस तरह खाने और दवाइयों के आभाव में उन्होंने जहाज़ पर गुज़ारा किया. ये रिपोर्ट बीबीसी संवाददाता सलमान रावी से बातचीत पर आधारित है.)

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