जिनके लिए जंजाल है होली का त्योहार

  • 26 मार्च 2013
होली

ज़्यादातर लोगों के लिए होली का मतलब है रंग, मस्ती, गुझिया, दही-पापड़ी और भांग. पर कई लड़कियों और महिलाओं के लिए ये त्योहार बदतमीज़ी, छेड़छाड़ और हिंसा का डर भी लेकर आता है. कुछ महिलाओं ने बीबीसी से होली को बदरंग करनेवाले ऐसे अनुभव बांटे.

‘अब मैं होली नहीं खेलती’

दक्षिण अमरीका में पली बढ़ीं 34 वर्षीय सारा छह साल से भारत में नौकरी कर रही हैं. पिछले साल वो बरसाना में होली खेलने गईं.

होली के रंग त्वचा को बदरंग भी कर सकते हैं

तीन पुरुष दोस्तों के साथ होने के बावजूद कुछ लड़कों ने उनके शरीर को ग़लत ढंग से छुआ. उन्होंने पलट कर लड़कों को मारा और उनके दोस्त भी शामिल हो गए, जितनी खराब उन्हें छेड़छाड़ लगी उतना ही खराब मारपीट करना.

लेकिन ये फिर हुआ. अगले दिन वो मथुरा के पास नंदगांव गए. होली खेलते हुए 20 लड़के पिचकारी लेकर उन्हें और उनके साथ एक भारतीय लड़की को रंग मारने लगे.

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पहले तो उन्होंने कुछ नहीं कहा, फिर एक लड़के ने बहुत नज़दीक आकर उनके शरीर के निजी हिस्सों पर पानी फेंका, तो गुस्से में फिर उन्होंने थप्पड़ मारा.

सारा ने मुझे बताया, “वो मुझे वापस मारने के लिए लपका तो मैंने भागकर पुलिस को बुलाया, गनीमत है कि उन्होंने मेरी मदद की और उसे रोका, पर ऐसा नहीं होता तो.. अब मैं समझ सकती हूं कि भारतीय महिलाएं सड़कों पर क्यों नहीं निकलती हैं, इस साल मैं होली नहीं खेलूंगी.”

‘कपड़े गीले हुए तो कहा कितनी चमक रही हो’

दिल्ली में एक स्कूल में पढ़ानेवाली कुसुमलता पिछले एक महीने से पर्स में एक सूट लेकर स्कूल जा रही हैं. रोज़ाना उनकी मिनिबस (आरटीवी) पर लड़कों का एक झुंड बाल्टी भर पानी फेंकता है.

उनका कहना है कि आरटीवी के ड्राइवर और कंडक्टर की इन लड़कों से मिलीभगत है, जिस आरटीवी में महिलाएं होती हैं उसकी रफ्तार जानबूझकर लड़कों के झुंड के पास धीमी की जाती है ताकि अंदर पानी फेंका जाए, और पानी कहीं पुरुषों पर पड़ जाए तो कहते हैं कि ‘ज़ाया चला गया.’

कुसुमलता ने बीबीसी को बताया, “मुझ पर ना जाने कितनी बार पानी डाला गया, एक बार बाल्टी भर पानी मेरी सहेली पर डाला जो हल्के रंग का सूट पहने थी, ज़ाहिर है कपड़े बदन से चिपक गए तो ड्राइवर और कंडक्टर ही छेड़ने लगे कि कितनी चमक रही हो आज, मुझे तो बस होली खत्म होने का इंतज़ार है.”

‘स्कूली लड़की को छेड़ा, हमने कॉलेज जाना छोड़ दिया’

दिल्ली यूनिवर्सिटी में पढ़नेवाली प्रांशिता और उनकी कई दोस्त पिछले हफ्ते कॉलेज से छुट्टी करती रही हैं, इस हफ्ते तो टीचरों ने भी कह दिया कि होली के हुड़दंग से बचने के लिए कॉलेज ना आएं.

दरअसल ये लड़कियां पिछले कुछ दिनों से स्कूटर पर रंग के साथ दो लड़कों को घूमते देख रही थीं. फिर एक दिन देखा कि पास ही के स्कूल से पैदल आ रही एक लड़की इन लड़कों से डरकर भाग रही है, इससे पहले प्रांशिता कुछ कर पातीं लड़की गिर गई, मुंह से खून निकलने लगा, लड़कों ने फिर भी रंग फेंका और रफूचक्कर हो गए.

प्रांशिता के मुताबिक फिर अपनी सहेलियों के साथ वो लड़की को अस्पताल लेकर गए जहां उसके होंठ पर टांके लगे. और वो लड़के अब भी उस इलाके में घूमते हैं.

प्रांशिता ने कहा, “इतने हादसे हो रहे हैं, कि घर में ही रहना ठीक है, उन दो लड़कों ने मेरी कुछ सहेलियों पर भी रंग फेंका जिसके बाद उनकी त्वचा पर ऐलर्जी भी हो गई, तो पिछले दिनों हम कॉलेज से बस स्टॉप भी कुछ लड़के दोस्तों के साथ ही जा रहे थे क्योंकि तब छेड़छाड़ नहीं होती.”

भद्दे और अश्लील मज़ाक लाउडस्पीकर और टीवी पर

बनारस में पली बढ़ीं अंजलि सिन्हा, होली के त्योहार पर शहर के माहौल में छाने वाले भद्दापन की बात करती हैं और बताती हैं कि इस मौके पर वहां हर साल होनेवाला कवि सम्मेलन कैसे इसको बढ़ावा देता है.

लोकल केबल टीवी पर दिखाए जानेवाले और बड़े-बड़े लाउडस्पीकर पर सुनाई देने वाले इस सम्मेलन की ख़बरें स्थानीय अखबारों में भी छाई रहती हैं.

पिछले सालों में हुए इस सालाना सम्मेलन के वीडियो यूट्यूब पर भी मौजूद हैं. एक वीडियो में पढ़ी गई कविता कुछ इस प्रकार है – ‘साली, वो तूफानवाली प्याली, खट्टी-मीठी प्यारी लगे होली की गाली हो.. बिना कारतूस डारे, अंखियों से गोली मारे, ऐसी ऑटोमैटिक बंदूक की नाली हो.’

अंजलि ने बीबीसी को बताया, “संस्कृति की आड़ में ऐसे भद्दापन और अश्लील भाषा का प्रयोग किया जाता है, और उसको सुनने शहर के प्रतिष्ठित लोग जाते हैं, महिलाएं नहीं केवल पुरुष, पर त्यौहार के नाम पर अश्लीलता, साली और घरवाली पर मज़ाक, शादी के बाहर के संबंध पर चुटकुले, हंसी नहीं आती सार्वजनिक अपमान लगता है.”