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ईंटें नहीं, बोतलों के बने घर में रहेंगे आप!

 रविवार, 17 मार्च, 2013 को 16:09 IST तक के समाचार
प्रशांत और अरुणा लिंगम ने साकार किया बोलत और बांस से घर बनाने का सपना

क्या आप ऐसे घर की कल्पना कर सकते हैं जो न तो ईंट, पत्थर से बना हो और न ही उसमें लोहे और सीमेंट का इस्तेमाल किया गया हो. बल्कि ईंटों की जगह प्लास्टिक की बोतलें और लोहे की जगह बांस का उपयोग किया गया हो.

हैदराबाद के एक दंपत्ति ने यह कमाल कर दिखाया है. उनका उद्देश्य ऐसे तरीके तलाशना है ताकि ग्रामीण इलाकों में घरों का निर्माण सस्ता हो और सबकी पहुंच में हो.

अपनी तरह का यह अनूठा प्रयोग प्रशांत और अरुणा लिंगम ने किया है जो आठ वर्षों से घरों के निर्माण, फर्नीचर और दूसरे कामों में बांस के उपयोग को बढ़ावा देने का अभियान चला रहे हैं और उनके संगठन "बम्बू हाउस इंडिया" ने इस क्षेत्र में ज़बरदस्त योगदान दिया है.

लेकिन बांस का काम करते करते उन्हें ईंटों की जगह खाली बोतलों के इस्तेमाल का विचार कैसे आया, मैनेजमेंट में ग्रेजुएट प्रशांत कहते हैं, "जब हम गांव में घरों के निर्माण में बांस की अहमियत समझाने की कोशिश कर रहे थे तो गांव वालों ने कहा कि बांस के ढांचे के साथ मिट्टी की दीवारों का निर्माण करना संभव नहीं है क्योंकि वो उसकी तकनीक नहीं जानते.”

"हमने एक आदमी को पानी पीकर खाली बोतल फेंकते हुए देखा. हमें ख्याल आया कि क्यों न इसे इस्तेमाल किया जाए."

प्रशांत

प्रशांत बताते हैं, “फिर हमने ऐसी चीज़ तलाशनी शुरू कर दी जो सस्ती भी हो और आसानी से उपलब्ध भी हो, क्योंकि सीमेंट की एक ईंट 15 रुपए में और मिट्टी की ईंट तीन चार रुपए में मिलती है."

कैसे आया विचार

प्रशांत और उनकी पत्नी इसी उधेड़बुन में थे कि एक दिन उन्होंने एक आदमी को पानी पीकर खाली बोतल फेंकते हुए देखा. उन्हें ख्याल आया कि क्यों न इसे इस्तेमाल किया जाए.

लेकिन खाली बोतल के साथ दीवार बनाने की कोशिश कामयाब नहीं हो सकी. उसके बाद प्रशांत और उनके कारीगरों ने बोतल में मिट्टी भरकर एक और कोशिश की और वो सफल रही.

हैदराबाद के उप्पल इलाके में बम्बू हाउस इंडिया की वर्कशॉप में इस नई तकनीक के साथ 15x15 फीट के एक घर का निर्माण किया गया जिसकी दीवारों में चार हजार बोतलें लगाई गईं.

बोतलों से बना घर

बोतलों से बनी दीवार खासी मजबूत होती है

लगभग 225 घन फीट का ये घर केवल पचहत्तर हजार रुपए में बन कर तैयार हो गया.

बोतलों को मिट्टी और गोबर के मिश्रण से भरा गया और उन्हें आपस में जोड़ कर रखने के लिए भी इसी मिश्रण का उपयोग किया गया. इस दीवार पर सीमेंट का लेप लगाया गया.

प्रशांत का कहना है, "इस घर की छत हमने कम्पोजिट शीट से बनाई है. इसलिए इस पर ज्यादा खर्च आया वरना इसे तीस चालीस हज़ार रुपये में भी बनाया जा सकता है. विशेषकर अगर हम घास और गांव में मिलने वाली दूसरी सामग्री से बानाएं."

शुरू में मजाक बनाया गया

भारत में ये प्लास्टिक की बोतलों से बनी पहली दीवार है लेकिन अफ्रीकी देशों के ग्रामीण इलाकों में यह तरीका काफी लंबे समय से चल रहा है.

प्रशांत का कहना है कि बांस स्टील से छह गुना ज्यादा मज़बूत होता है इसलिए इससे बहुमंजिला इमारतें भी बनाई जा सकती हैं.

इस बात को सिद्ध करने के लिए प्रशांत ने अपने घर की छत पर ही बांस से बना दो मंज़िला भवन खड़ा कर दिया है. और यह लोहे, सीमेंट और ईंटों से बने किसी घर से ज्यादा ठंडा और हवादार है.

प्रशांत और अरुणा को गांव में घरों के निर्माण की समस्याएं अच्छी तरह मालूम हैं क्योंकि वो बांस के उपयोग को बढ़ावा देने के लिए अक्सर अलग अलग गांवो में जाते हैं ताकि जंगलों में रहने वाले आदिवासियों और दूसरे लोगों को उस का प्रशिक्षण दे सकें.

प्रशांत का कहना है, "गाँव में अधिकतर घर दो वर्षों में टूट जाते हैं. लेकिन हमने जो टेक्नॉलजी तैयार की है उससे कम खर्च में ऐसे घर बन सकते हैं जो कम से कम तीस वर्ष तक सुरक्षित रहेंगे."

प्रशांत और अरुणा के साथ इस परियोजना पर किसी इंजीनियर ने नहीं बल्कि आदिलाबाद जिले के बांस के कारीगरों ने काम किया.

बोलतों का घर

इस तरह के घरों से प्रदूषण की समस्या से भी कुछ हद तक निपटा जा सकता है

इनमें से एक बाबू राव बताते हैं कि जब उन्होंने बोतालो से घर बनाने का काम शुरू किया तो आसपास के लोग उन का मजाक उड़ा रहे थे और वो समझते थे कि यह दीवार गिर जाएगी लेकिन जब घर बन कर तैयार हो गया तो वो उसकी मजबूती देख चकित रह गए और वो भी अब इसी तरह का घर बानाने की बात कर रहे हैं."

ऐसे ही एक और कारीगर घटैय्या का कहना है, "यह घर बहुत ही अच्छा और ठंडा है क्योंकि मिट्टी और बोतलें से बनी दीवार गर्मी अंदर घुसने नहीं देती. मैं भी गांव में अपना घर ऐसे ही बनाऊंगा."

आम के आम गुठलियों के दाम

जहां तक बांस और बोतलों से बने घरों की टेक्नॉलजी को वैज्ञानिक दृष्टि से मान्यता दिलाने की बात है तो प्रशांत इसमें आईआईटी दिल्ली की सहायता ले रहे हैं जिनके साथ बम्बू हाउस इंडिया की साझेदारी है.

वो बताते हैं, "हम आईआईटी दिल्ली में बोतलों की एक दीवार बनाएंगे और वहां के विशेषज्ञ मशीनों से उसकी शक्ति को आजमाएंगे. उसके बाद हम वहां एक बोतलों का घर भी बनाएंगे ताकि भाविष्य के इंजीनियर देख सकें कि बोतलें भी ईंटों का एक अच्छा और सस्ता विकल्प हो सकती हैं."

"हम आईआईटी दिल्ली में बोतलों की एक दीवार बनाएंगे और वहां के विशेषज्ञ मशीनों से उसकी शक्ति को आजमाएंगे. उसके बाद हम वहां एक बोतलों का घर भी बनाएंगे ताकि भाविष्य के इंजीनियर देख सकें कि बोतलें भी ईंटों का एक अच्छा और सस्ता विकल्प हो सकती हैं."

प्रशांत

जहां तक चुनौतियों का सवाल है, प्रशांत का कहना है कि इसे लेकर लोगों और विशेष कर निर्माण उद्योग में जागरूकता और विश्वास पैदा करने की ज़रूरत है. दूसरी ओर उसके लिए व्यापक पैमाने पर प्लास्टिक की खाली बोतलों की ज़रूरत भी होगी.

वो कहता हैं, "पहले तो हमें एक रुपए में एक बोतल मिल गई लेकिन जैसे ही लोगों को मालूम हुआ की हम क्या कर रहे हैं तो उन्होंने उसकी कीमत बढ़ा दी."

इसलिए वो कहते है कि शहरों में बेकार फेंक दी जाने वाली जो बोतलें प्रदूषण की गंभीर समस्या पैदा कर रही हैं, उन्हें गैर सरकारी संगठनों की मदद से गांवों तक पहुंचाने की जरूरत है.

वो कहते हैं, "इससे प्रदूषण की एक बड़ी समस्या हल होगी. वैसे प्लास्टिक की एक बोतल को गल कर मिटटी में मिलने में साढ़े सात सौ वर्ष से लेकर एक हज़ार वर्ष का तक समय लग जाता है. ऐसे में दीवारों के निर्माण से अच्छा उनका कोई इस्तेमाल नहीं हो सकता."

इसको बढ़ावा देने के लिए प्रशांत का संगठन होटलों, एयर पोर्ट, रेस्त्रांओं, शॉपिंग मॉल्स और बड़ी बड़ी कंपनियों से बात कर रहा है ताकि वे बोतलों को कचरे में न फेंकें बल्कि सुरक्षित रख कर उन्हें दे दें.

इससे न केवल प्रदूषण की समस्या हल होगी बल्कि ग्रामीण इलाकों में घरों का निर्माण भी हो सकेगा.

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