नीतीश की दिल्ली रैलीः तीर और निशाने

  • 16 मार्च 2013
दिल्ली रैली
रैली का मुद्दा है बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिलाने की मांग.

बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिलाने की मांग को लेकर जनता दल यूनाइटेड यानी जदयू ने दिल्ली के रामलीला मैदान में रविवार 17 मार्च को एक रैली आयोजित की है.

जिसे कहते हैं पूरी ताकत झोंक देना, बिल्कुल उसी अंदाज़ में इस रैली के लिए की गई तैयारी के सूत्रधार ख़ुद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार है.

बिहार से जदयू के प्रायः सभी नेता और हज़ारों कार्यकर्त्ता रैली को सफल बनाने के लिए दिल्ली पहुंच चुके हैं.

पार्टी के विधायकों, सांसदों और मंत्रियों में शायद ही ऐसा कोई बचा हो, जो शनिवार तक दिल्ली न पहुँचा हो. ये लोग लगभग दो हफ़्ते से दिल्ली में डेरा डाल कर भीड़ जुटाने में लगे हैं.

असली मक़सद

इसे रैली को 'मेगा शो' बनाने की तमाम कोशिशें हो रही हैं. माना जा रहा है कि विशेष राज्य का दर्जा महज़ एक बहाना है. इस रैली को आयोजित करने के पीछे नीतीश कुमार का असली मक़सद कुछ और है. कहा जा रहा है कि नीतीश इस रैली के ज़रिए अपना राजनीतिक रुतबा दिखाना या बढ़ाना चाहते हैं.

वैसे यह बात छिपी नहीं है कि मौजूदा शर्तों या मापदंडों के रहते बिहार या अन्य पिछड़े राज्यों को विशेष श्रेणी में रखना क़तई संभव नहीं होगा. इसके लिए मापदंड बदलना भी आसान नहीं है, क्योंकि तब अनेक राज्यों से ऐसी मांगें उठ खड़ी होंगी.

विशेष दर्जा प्राप्त राज्यों में देश के पर्वतीय क्षेत्र वाले ग्यारह राज्य शमिल हैं. इन राज्यों को उनके आर्थिक या औद्योगिक विकास के लिए विभिन्न करों या शुल्कों में ख़ास रियायतें मिलती हैं. केंद्र की कांग्रेस नीत सरकार ने एक राजनीतिक रणनीति के तहत इस सन्दर्भ में 'शर्त संशोधन' जैसी संभावना भले ही उछाल दी हो, लेकिन ऐसा हो पाना मुश्किल लगता है.

एक तीर कई निशाने

लेकिन निगाहें और निशाना अलग-अलग होने के इस खेल में जदयू और कांग्रेस के अपने-अपने स्वार्थ छिपे हैं. तीर छाप वाले जदयू को अपनी सत्ता साझीदार भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के कमल पर निशाना लगाने में कांग्रेस का सहयोग मिल रहा है.

नरेन्द्र मोदी के सवाल पर भाजपा से रिश्ता टूटने जैसे मुश्किल वक़्त में नीतीश अपने कथित कांग्रेसी कनेक्शन की बात चलने रहने देना चाहते हैं. उधर भाजपा के नरेन्द्र मोदी समर्थकों को भाजपा के ही नीतीश समर्थकों ने एक चुनावी समीकरण से डरा के रखा हुआ है. कहा जा रहा है कि लोकसभा चुनाव से पहले मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने पर बिहार के मुस्लिम मतदाता लालू यादव के पक्ष में गोलबंद हो जाएंगे.

चिंतित नीतीश

इस बीच भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह समेत भाजपा के कार्यकर्ताओं ने ‘नरेन्द्र मोदी उभारो’ अभियान तेज़ कर दिया है. इससे चिंतित नीतीश कुमार ने पार्टी की दिल्ली रैली को सफल बनाने में अपनी पूरी ताक़त झोंक दी है.

जदयू ने अपनी इस मुहिम से भाजपा को दूर रखा है. ज़ाहिर है कि इसकी झेंप मिटाने के लिए ही भाजपा के नेता मात्र यह बयान देकर चुप हो जा रहे हैं कि वे भी इस मांग के साथ हैं.

भाजपा कोटे से राज्य सरकार के एक मंत्री गिरिराज सिंह ने अपनी पार्टी का यह दर्द छिपाते हुए भी कह दिया, ''दिल्ली की यह रैली अगर सर्वदलीय होती तो अच्छा होता क्योंकि बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिए जाने की मांग किसी दल विशेष का नहीं, पूरे राज्य के लोगों का है.''

दिलचस्प बात ये भी है कि जिस दिन इस बाबत दिल्ली के रामलीला मैदान में जदयू ने रैली बुलाई है, ठीक उसी दिन पटना में भाजपा की प्रदेश कार्यसमिति की बैठक हो रही है.

कहते हैं कि इस रैली में भाजपा के कई सांसदों और विधायकों की संभावित भागीदारी रोकने के मक़सद से पार्टी कार्यकारिणी की यह बैठक बुला ली गई. हालांकि प्रदेश भाजपा ने इसका खंडन किया है.

उधर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने रैली की पूर्व संध्या पर पटना में पत्रकारों से कहा, ''यह मुद्दा बिहार के लिए सबसे बड़ा मुद्दा है. अगर यह विशेष दर्जा नहीं मिला तो बिहार जैसे पिछड़े राज्यों को विकास के राष्ट्रीय औसत तक पहुँचने में बीस बरस लग जाएंगे. सिद्धांत रूप में इसके लिए मापदंड बदलने की बात केंद्र सरकार ने स्वीकार कर ली है, इसलिए जदयू की पहल पर शुरू हुई यह मुहिम दिल्ली रैली के रूप में अब निर्णायक दौर में पहुँच चुकी है.''

इस सिलसिले में जो सवाल नीतीश सरकार को सबसे ज़्यादा चुभता है, वो ये है कि क्या विशेष राज्य वाला मुद्दा इस राज्य में बढ़ते भ्रष्टाचार, अपराध और विकास योजनाओं की विफलता जैसी गंभीर समस्याओं से भी बड़ा मुद्दा है ?

इस बाबत यहाँ के तमाम विपक्षी नेता आरोप लगाते रहे हैं कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपनी विफलताओं को छिपाने या उस पर से ध्यान हटाने के लिए ही यह प्रपंच रचा है.