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'मुलायम के बेटवा में कलेजा' दिखा था!

 गुरुवार, 14 मार्च, 2013 को 17:40 IST तक के समाचार
अखिलेश यादव

अखिलेश साल भर पहले पिता की राजनीतिक विरासत संभालते हुए मुख्यमंत्री बने थे

उत्तर प्रदेश की राजनीति ने 2012 में एक नया सवेरा देखा था जब अखिलेश यादव ने तमाम कयासों को दरकिनार करते हुए एक मज़बूत सरकार का गठन किया था.

फर्राटे से अंग्रेजी बोलने वाले, लोगों से गले मिलने को बेताब अखिलेश यादव ने चुनाव के पहले जब 'साइकिल यात्रा' शुरू की थी तब प्रदेश में समाजवादी पार्टी के समर्थकों के अलावा दूसरों में भी एक आस बंधी थी.

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आस एक ऐसी सरकार की जिसमें सुशासन होगा, भ्रष्टाचार पर लगाम लगेगी और युवा वर्ग के सपने और हौसले दोनों बुलंद होंगे.

उस विधानसभा चुनाव कवर करते वक़्त न जाने कितने ऐसे लोगों से मिलना हुआ था जिन्हें 'मुलायम के बेटवा में कलेजा' दिखा था.

अगर यह कहूँ कि दूर दिल्ली में बैठ कर असलियत बगल में दिखती है तो थोडा ग़लत होगा.

लेकिन जब साल भर बाद दोबारा तमाम ऐसे इलाकों में जाना हुआ जहाँ से अखिलेश भारी मतों से जीते थे और जहाँ उनकी 'आंधी' सी आई हुई थी, तब थोड़ी निराशा ज़रूर हाथ लगी.

निराशा

वहीं वे लोग जो समाजवादी पार्टी के मसीहा के रूप में अखिलेश यादव को देखते थे, आज उन दंगों को याद कर रहे हैं जो पिछले एक साल में उत्तर प्रदेश के क़रीब ग्यारह कस्बों और गांवों में हुए हैं.

कोसीकलां (मथुरा), मुज़फ्फरनगर, मेरठ, प्रतापगढ़, बरेली, फैजाबाद और टांडा कुछ ऐसे ही उदाहरण हैं जहाँ दंगों की वजह जान या माल का नुकसान हुआ.

"हमारे इलाके में हिन्दुओं का काम मुसलमान के बिना और मुसलमान की रोज़ी हिन्दुओं के बिना नहीं चलती थी. लेकिन आज आलम यह है कि इलाके में जैसे किसी ने दोनों समुदायों के बीच एक लकीर खींच दी है"

इमाम शाही मस्जिद, कोसीकलां मथुरा

फैजाबाद के एक सम्मानित व्यक्ति ने मुझसे कहा,"जिस इलाके में बाबरी मस्जिद गिर जाने के बाद सांप्रदायिक तनाव नहीं बढ़ा, उसी इलाके में दुर्गा पूजा और दशहरे के बाद से दंगे भड़क उठे."

मथुरा के कोसीकलां में एक शाही मस्जिद है जिसके इमाम तीसरी पीढ़ी के हैं.

पिछले साल इलाके में हुए सांप्रदायिक तनाव और ख़ून ख़राबे के सदमे से आज तक निकल नहीं सके हैं इमाम साहब.

कहते हैं,"हमारे इलाके में हिन्दुओं का काम मुसलमान के बिना और मुसलमान की रोज़ी हिन्दुओं के बिना नहीं चलती थी. लेकिन आज आलम यह है कि इलाके में जैसे किसी ने दोनों समुदायों के बीच एक लकीर खींच दी है."

अफ़वाह

उत्तर प्रदेश में क़रीब सात ज़िलों में घूमते वक़्त न जाने कितने ऐसे लोग मिले जिन्हें लगा कि अखिलेश यादव आदमी तो बेहतरीन हैं, लेकिन अपनी ही सरकार पर नकेल कस पाने में कामयाब नहीं रहे हैं.

मथुरा और अंबेडकर नगर ऐसे दो ज़िले लगे जहां आम लोग इस बात से ज्यादा हैरान हैं कि जब सांप्रदायिक अफवाहें फैलनी शुरू होती हैं तो प्रशासन देर से ही हरकत में क्यों आता है?

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई लोग अभी भी इस बात से खफ़ा हैं कि जहाँ दंगे भड़के वहां ज़्यादातर बाहर के लोग पहुंचे और हिंसा को अंजाम दिया.

यात्रा के दौरान चार ऐसे परिवारों से भी सामना हुआ जिन्होंने अपनों को इन दंगों की भेंट चढ़ते देखा.

बिगड़ते हालात

अखिलेश यादव

युवा मुख्यमंत्री से आम लोगों की बहुत उम्मीदें हैं

इन परिवारों मिलकर लगा कि केवल मुआवज़े भर से ही इन लोगों की दिन पर दिन बिगड़ती दशा सुधरने वाली नहीं है.

हालांकि इस बात में कोई शक नहीं कि ज़्यादातर दंगा प्रभावित परिवारों को मुआवजा देने में उत्तर प्रदेश सरकार ने ज्यादा देर नहीं की. लेकिन बुनियादी सवाल यही है कि दंगे आखिर भड़कने ही क्यों दिए गए?

अब इसे अखिलेश यादव का दुर्भाग्य कहिए या फिर उनके आलोचकों की खुशकिस्मती, सच्चाई यही है कि ज्यादा से ज्यादा आम लोगों का मानना यही है कि सरकार की प्रशासन पर से लगाम ढीली पड़ती जा रही है.

देवरिया के एक गाँव में जब मैं मृत पुलिस उपाधीक्षक ज़ियाउल हक के परिवार से मिलने जा रहा था तो रास्ते में एक ढाबे पर रुक कर चाय पी और उनके घर का पता पूछा.

जवाब में पता भी मिला और एक सवाल भी."पिछली सरकार में कितने डीएसपी मारे गए रहे भैया".

इस तरह के कई सवालों के जवाब अखिलेश यादव को कम से कम तैयार रखने होंगे.

  • परवीन आज़ाद

    पति की मासूमियत की लड़ाई

    मैं हूँ परवीन आज़ाद और मेरी लड़ाई अपने पति की मासूमियत के लिए है. ज़ियाउल हक़ वरिष्ठ पुलिस अधिकारी थे और उत्तर प्रदेश के कुंडा में तैनात थे. ऐसा नहीं है कि मेरे पति किसी जंग पर थे या किसी से लड़ रहे थे.

    वह सिर्फ़ अपनी ड्यूटी करते हुए 'शहीद' हो गए और अब मेरी ज़िन्दगी में चाहत यही है कि मुझे इंसाफ मिले.

    रहा सवाल सरकार का तो मैं किसी को दोष नहीं देना चाहतीं.

    बस आने वाली पीढ़ियों के लिए यह महत्त्वपूर्ण है कि उनकी 'शहादत' ज़ाया न जाए. गरीबी से उठ कर इतने बड़े मुकाम तक पहुँचने पर उनकी हत्या हुई तो कोई तो वजह रही होगी हमारे प्रदेश में व्याप्त सिस्टम की.

  • मखमल बेग़म

    जुड़वां पैदा हुए, जुड़वां मार दिए गए

    मेरा नाम मखमल बेग़म है और मेरा परिवार मथुरा के पास कोसीकलां के नखास इलाके में वर्षों से रहा रहा है.

    1 जून, 2012 के दिन मेरे परिवार पर जो बीती वह किसी के साथ न हो.

    मेरे दो जुड़वाँ बेटे दंगों की भेंट चढ़ गए, साथ ही पैदा हुए और साथ ही मर गए.

    रेहड़ी लगाने वाले मेरे बेटों का किसी से कोई झगड़ा भी नहीं था.

    बड़े बेटे को गोली लगी और छोटा उसे रिक्शे पर बैठकर अस्पताल ले जा रहा था.

    घर से थोड़ी दूर गुस्साई भीड़ ने भूरा और कलुआ दोनों को जिंदा जला दिया.

    दोनों के दो-दो बच्चे हैं जो अनाथ हो गए.

    बहुएं बच्चों को लेकर अपने-अपने मायके चली गईं हैं.

    सरकार ने उन्हें मुआवजा तो दिया है लेकिन नौकरियों का वादा नहीं पूरा हुआ.

    मैं अब अकेली पड़ गईं हूं, बेटे भी गवाएं और बुढापे की लाठी भी.

  • अनामिका गुप्ता

    अपाहिज के पेट पर लात

    मेरा नाम अनामिका गुप्ता है और मेरा घर-संसार उजड़ चुका है.

    24 अक्टूबर, 2012 को दशहरा था और हम सब खुश थे. ख़बर आई की फैजाबाद के पास दंगे हुए हैं और कुछ घंटे बाद हमारे कसबे भदरसा में अफवाहें फैलने लगीं. मेरे पति दुर्गा प्रसाद गुप्ता यह सुन कर दे खने निकले कि उनकी दुकान तो ठीक है न.

    बस फिर देर रात को इनका शव घर लाया गया क्योंकि बाज़ार में कुछ लोगों ने दंगों की आड़ में इन्हें छुरे से मार डाला. मेरी दो जवान बेटियां हैं, एक लड़की बचपन से अपाहिज है. अब हमारा कोई आसरा नहीं है. सरकार ने पांच लाख मुआवजा दिया लेकिन उतना तो एक शादी भर में खर्च हो जाएगा. आखिर सरकार ने दंगे भड़कने क्यों दिए?

  • सज्जुनिसा

    गरीब किसान भी चढ़े भेंट

    मैं सज्जुनिसा हूँ और साठ साल के मोहम्मद उमर मेरे पति थे जो 2 अक्टूबर, 2012 के दिन अपने छोटे से खेत में बीज बोने गए थे. बीकापुर में उस दिन सुबह से तनाव था क्योंकि पास के इलाकों में दंगे भड़क चुके थे.

    एक बजे की बात होगी, पति और बेटा खेत में थे तभी बाज़ार से कुछ युवक लाठी और हंसिया लेकर पहुंचे और उन्हें पीटना शुरू कर दिया.

    मेरा बेटा बेहोश हो गया, उसे मरा समझ के भीड़ ने मेरे पति की हत्या कर दी.

    सरकार ने मुआवजा दिया लेकिन सब बेटे के इलाज में ख़त्म हो गया.

    जवान बेटियां हैं, कमाई का जरिया नहीं है.

    सुना है कि किसी बड़े अफसर का न तो इसके बाद तबादला हुआ न ही कार्रवाई.

    मेरा तो सब ख़त्म हो ही गया है, किसी को इससे क्या.

  • निशात

    दहेज का सामान दंगे की भेंट

    मेरा नाम निशात है और परिवार में पति के अलावा तीन बेटियां हैं. चार मार्च, 2012 को हमारी जीवन भर की कमाई आग के हवाले कर दी गई.

    एक दिन पहले किसी नेता की हत्या हुई थी और दूसरे दिन खबर फैली कि हमारी बस्ती की तरफ़ गुस्साए लोगों की भीड़ आ रही है. हम अपना एक कमरे का घर बंद कर के खेत की तरफ भाग गए. अगले दिन लौटे तो देखा सब जल दिया गया था.

    बेटियों की शादी के लिए वर्षों मजदूरी कर के सामान इकठ्ठा किया था सब कुछ जल गया.

    प्रशासन कह रहा है कि कार्रवाई जल्द होगी लेकिन अभी तक हमारी सुध लेने कोई नहीं आया है.

    हमारी यही गलती है साहब कि हम लोग गरीब लोग हैं.

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