क्या 'सरकार की नाकामी' है निर्भया फंड?

  • 1 मार्च 2013

महिलाओं की सुरक्षा
दिल्ली सामूहिक बलात्कार के बाद महिलाओं की सुरक्षा एक बड़ा मुद्दा बन कर उभरा है

बजट में महिलाओं की सुरक्षा के उद्देश्य से निर्भया फंड और अलग से बैंक बनाने जैसे कदम लगातार सोशल मीडिया पर गर्मागर्म चर्चा का केंद्र बने हुए हैं.

कई लोग इसके औचित्य पर गंभीर सवाल उठा रहे हैं.

वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने गुरुवार को बजट पेश करते हुए दिल्ली सामूहिक बलात्कार की पीड़ित की याद में इस फंड की घोषणा की है.

एक हजार करोड़ रुपए के इस कोष का मकसद महिलाओं की सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए सरकार और गैर सरकारी संगठनों की ओर से की जा रही पहलों को मजबूत करना है.

‘लोकलुभावन कदम’

वित्त पी चिंदबरम ने कहा, “महिलाओं की सुरक्षा और गरिमा को सुनिश्चित करना हम सबकी सामूहिक जिम्मेदारी है.”

बजट में महिलाओं के लिए अलग से बैंक बनाने की भी बात कही गई है.

लेकिन पत्रकार से फिल्मकार बने प्रीतीश नंदी ने ट्वीट किया, “बहुत बढ़िया. हम बलात्कार और महिलाओं पर होने वाले अपराध तो रोक नहीं सकते. लेकिन उनके लिए बैंक खोल रहे हैं. मानो महिलाएं सामान्य बैंकों में नहीं जा सकतीं.”

भारत की पहली महिला आईपीएस अधिकारी और सामाजिक कार्यकर्ता किरण बेदी का कहना है कि महिलाओं के लिए बजट में की गई घोषणाएं लोकलुभावन हैं. उन्होंने कहा, “महिलाओं का बैंक लुभावना कदम है. मैंने देखा है कि महिलाओं के सहकारी बैंक पहले ही अच्छा काम कर रहे हैं.”

एक अन्य ट्वीट में कहा गया है, “महिलाओं की सुरक्षा के लिए निर्भया फंड. ऐसे काम के लिए अलग से फंड की जरूरत क्या है जिसके लिए हम पहले ही टैक्स दे चुके हैं.”

कितना जरूरी निर्भया फंड

ट्वीटर
ट्वीटर पर छाया बजट

कवियत्री मीना कंडास्वामी ने निर्भया फंड बनाने पर ही सवाल उठाए हैं. उन्होंने ट्वीट किया, “निर्भया फंड को अनावश्यक कहा जा सकता है. ये सिर्फ राष्ट्र की तरफ से अपनी नाकामी को मान लेना जैसा है."

कुछ लोगों ने महिलाओं की सुरक्षा से जुड़ी व्यापक समस्या पर ध्यान देने को कहा है. टीनू चेरियन अब्राहण का ट्वीट है, “निर्भया फंड की क्या जरूरत है? सूर्यानेल्ली की उस गरीब का लड़की का क्या होगा? क्या उसे न्याय मिल पाएगा?”

प्रिया जेम्स ने ट्वीटर पर लिखा है, “निर्भया फंड ऐसा है जैसे दांत के दर्द के लिए आइसक्रीम दे दें और दांत को निकालने के लिए कुछ न किया जाए.”

बजट में घोषित महिलाओं की सुरक्षा के उपायों को कुछ हल्कों में सकारात्मक नजरिए से देखा जा रहा है तो कई सामाजिक कार्यकर्ता इन्हें खानापूर्ति से ज्यादा कुछ नहीं मान रहे हैं.