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'मुल्ला-मुलायम' क्यों हुए भाजपा पर मुलायम

 शुक्रवार, 1 मार्च, 2013 को 20:59 IST तक के समाचार

सपा और भाजपा के बीच क्या दूरियां घट रही हैं?

संघ परिवार और भारतीय जनता पार्टी के लिए ‘मुल्ला-मुलायम’ रहे मुलायम सिंह यादव बुधवार को लोकसभा में भाजपा के लिए मुलायम दिखाई दिए.

मुलायम सिंह ने बातों की बातों में भाजपा की कमियां और खूबियां गिना दीं, जिनसे लगा कि मुलायम भाजपा के करीब आ सकते हैं.

मुलायम सिंह की इसी नरमी ने राजनीतिक गलियारों में सपा और भाजपा के बीच दोस्ती की संभावनाओं के कयास शुरू कर दिए.

बुधवार को लोकसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा के दौरान राजनाथ सिंह ने किसानों की समस्याओं पर बोलते हुए कांग्रेस सरकार की आलोचना की.

इसी सिलसिले में राजनाथ सिंह ने इंदिरा गांधी का जिक्र करते हुए कहा कि उन्होंने 42वें संविधान संशोधन के ज़रिए समाजवाद और धर्मनिरपेक्ष शब्द जोड़े थे, लेकिन अब कांग्रेस समाजवाद के रास्ते से हट गई है.

समाजवाद

"आप मुसलमानों के मुद्दे पर अपनी पार्टी अपने विचार को बदलें, तब हमारे और आपके बीच दूरी काम हो जायेगी. अगर आपकी विचारधारा ठीक होती तो हमें इन्हें(कांग्रेस) क्यों समर्थन देना पड़ता. "

मुलायम सिंह, बुधवार को लोकसभा में बहस के दौरान

इसके बाद मुलायम सिंह का नंबर आया. उनका किसान दिल अब तक राजनाथ सिंह के भाषण से खुश हो चुका था और फिर राजनाथ सिंह के मुंह से समाजवाद शब्द का उच्चारण सुनकर तो वह और भी प्रसन्न हो गए.

इसलिए उन्होंने किसान और समाजवाद, दोनों मुद्दों पर बोलने के लिए राजनाथ सिंह को बधाई दी.

मुलायम सिंह ने कहा, “हम राजनाथ सिंह को उनके भाषण के लिए बधाई देते हैं, क्योंकि उन्होंने इसमें समाजवादी विचारधारा का उल्लेख किया है.”

मुलायम ने राजनाथ को सलाह दी कि वह भारतीय जनता पार्टी की नीतियों में भी बदलाव लाएं. उन्होंने कहा, “आप मुसलमानों के मुद्दे पर अपनी पार्टी, अपने विचार को बदलें, तब हमारे और आपके बीच दूरी काम हो जाएगी. अगर आपकी विचारधारा ठीक होती तो हमें इन्हें (कांग्रेस) क्यों समर्थन देना पड़ता."

मुलायम सिंह यहीं नहीं रुके, उन्होंने कहा, "मंदिर मस्जिद के बारे में हमारी भाजपा से काफी दूरी है. इस मामले में देश को एकजुट रखने के लिए उस समय हमारी सरकार को अयोध्या में गोली चलाने का आदेश देना, क्या हमें यह अच्छा लगा? बिलकुल नही.”

मुलायम ने यह भी कहा कि देशभक्ति, सीमा सुरक्षा और भाषा के मामले में उनकी पार्टी और भाजपा की नीति एक है.

मुसलमान और कश्मीर

बयानों का ये सिलसिला राजनाथ सिंह के बयान से शुरु हुआ.

मुलायम ने यह भी कहा कि अगर भाजपा मुसलमानों और कश्मीर के मामले में अपनी नीति बदल ले तो भाजपा और उनके बीच दूरियाँ कम हो सकती हैं.

इस तरह की बात मुलायम पहले भी कह चुके हैं. लेकिन राजनाथ सिंह को संबोधित उनके भाषण से पूरी लोकसभा में गर्मी आ गई.

राजनाथ सिंह ने फ़ौरन जवाब दिया , “हमारे और आपके बीच दूरी कहाँ है. अगली बार आप निश्चित तौर पर हमारे साथ होंगे.”

कहने की जरुरत नहीं कि राजनाथ सिंह स्वयं प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा रखते हैं.

वह अपनी छवि किसान हितैषी की बनाए रखना चाहते हैं और साथ ही साथ यह भी दिखाना चाहते हैं कि अटल बिहारी बाजपेयी के बाद भाजपा में वही एक ऐसे नेता हैं, जिनके नाम पर गैर भाजपा दल भी सहमत हो सकते हैं. मोदी को किनारे लगाने का इससे बेहतर ट्रंप कार्ड भी नहीं हो सकता.

पर वास्तविकता यह है कि राजनाथ पार्टी अध्यक्ष जरूर हैं, पार्टी के नीति निर्माता नहीं. इसलिए भाजपा और संघ के लोगों को उनके द्वारा 42वें संविधान संशोधन और समाजवाद की बात करना अच्छा नहीं लगा.

संघ का रवैया

भाजपा और संघ परिवार अगले लोकसभा चुनावों में हिंदूवादी शक्तियों को एकजुट करने की नीति पर चल रहे हैं. ऐसे में जिसे वह 'मुल्ला-मुलायम' कहते रहे हों, उसके करीब कैसे जाएँगे?

लेकिन राजनाथ के दिमाग में लोकसभा चुनाव के बाद की रणनीति है. जो माहौल है उसमे समाजवादी पार्टी जैसे छोटे दल भाजपा के साथ भले न आएँ, पर वह कांग्रेस का खेल बिगाड़ने में तो मदद कर ही सकते हैं.

समाजवादी पार्टी उत्तर प्रदेश में मुसलमानों को लुभाने की हर कोशिश में लगी है. इसलिए सपा के प्रदेश नेता स्पष्टीकरण दे रहे हैं कि भाजपा के साथ जाने का सवाल नहीं उठता. मुस्लिम नेताओं ने भी कहना शुरू कर दिया है कि , “अगर मुलायम ने धोखा दिया तो दूसरा रास्ता देख्नेंगे”

कांग्रेस तो ऐसा अवसर तलाश ही रही है कि वह मुसलमानों के लिए नंबर एक विकल्प बन जाए.

यह सही भी है भाजपा के केवल एक चेहरे कल्याण सिंह का साथ लेने से हुई छीछालेदर को सपाई अभी भूले नही हैं.

परिस्थितियाँ कुछ ऐसी हैं कि उत्तर प्रदेश की दोनों प्रमुख पार्टियों सपा और बसपा को न चाहते हुए भी दिल्ली में कांग्रेस का साथ देना पड़ रहा है.

टीकाकारों का कहना है कि मुलायम बीच-बीच में इस तरह के बयान देकर कांग्रेस नेतृत्व को इस बात का अहसास कराते रहते हैं उनके समर्थन को वह गारंटी न समझें.

ऐसा करते रहने से बीच-बीच में वह पाने और अपने हितैषियों के कुछ रुके हुए काम पूरा करा लेते हैं.

साथ ही इस बात का भ्रम भी बनाए रहते हैं कि अगर जोड़ तोड़ और जुगाड़ से चंद्रशेखर, देवेगौड़ा और गुजराल प्रधानमंत्री बन सकते हैं तो वह क्यों नही?

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