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आम लोगों की सुनेंगे चिदंबरम?

 बुधवार, 27 फ़रवरी, 2013 को 10:29 IST तक के समाचार
  • प्राची वर्मा, छात्रा, पत्रकारिता स्नातकोत्तर

    प्राची वर्मा पत्रकारिता की छात्रा हैं, लिहाजा उनकी नजर आसपड़ोस के समाज पर भी है. वे कहती हैं, “बजट में सबसे पहले तो प्रॉपर्टी टैक्स लगना चाहिए, क्योंकि सबसे ज़्यादा प्रॉपर्टी तो नेताओं की ही बढ़ रही है.”

    जयपुर में हाल ही में कांग्रेस का चिंतन शिविर आयोजित हुआ था, जिसमें सबसे ज़्यादा युवाओं की चर्चा हुई. प्राची कहते हैं, “इस बार के बजट में शिविर में उठे मुद्दों की झलक जरूर दिखेगी. मुझे भरोसा है कि युवाओं के लिए रोजगार के कुछ प्रावधान शामिल किए जा सकते हैं. युवा वर्ग को बिना प्रोत्साहित किए विकास की प्रक्रिया को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता.”

    प्राची चाहती हैं कि इस बार बजट में सरकार किसानों और महिलाओं को राहत देने की व्यवस्था करे. प्राची के मुताबिक किसानों पर किसी तरह का टैक्स नहीं लगाना चाहिए और महिलाओं के लिए भी कुछ ख़ास रियायती प्रावधान करने चाहिए. ( बातचीत एवं फोटो- नारायण बारेठ, बीबीसी संवाददाता जयपुर)

  • जोगेन्दर राय, 45 साल, किसान

    जोगेन्दर राय का परिवार 25 सदस्यों का संयुक्त परिवार है. 5 बीघे की खेती है. इन्हें भी बजट से कोई ख़ास उम्मीद नहीं है. वे कहते हैं, “उम्मीदे बेकार है. ब्लैक से खाद खरीदते हैं. बीज बढ़िया नहीं मिलता. डीजल का दाम इतना बढ़ गया है कि यही सब खरीदने में सारी पूंजी निकल जाती है.”

    हालांकि सरकार किसानों को सब्सिडी भी देती है. लेकिन जोगेन्दर कहते हैं, “ सब्सिडी का भी अजब चक्कर है, मजाल है कि वो आसानी से मिल जाय? अब ये सब दुरुस्त करने की उम्मीद हम बजट बनाने वाली सरकार से कर सकते हैं? हमारे इस धनौत गाँव की अधिकाँश जमीन जल-जमाव की चपेट में है. पानी निकासी के लिए गुहार लगाते-लगाते थक गए. बजट में क्या खेती की ऐसी गंभीर समस्याओं पर ध्यान नहीं दिया जाना चाहिए ? हम देखने में गंवार जरूर लगते होंगे लेकिन बात सब समझते हैं. फिर किसान को ठगने वाली ही कोई घोषणा हो जाएगी. इसलिए हमलोग बजट के बारे में न ज़्यादा जानते हैं और न ज़्यादा सोचते हैं.'' ( बातचीत एवं फोटो- मणिकांत ठाकुर)

  • मनीष शुक्ला, स्नातकोत्तर के छात्र, राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर

    मनीष शुक्ला की अपील है कि इस साल का बजट युवाओं को ध्यान में रखकर बनाया जाए. वे कहते हैं, “मेरी वितमंत्री से अपेक्षा है कि भारत का बजट इस बार यूथ फ्रेंडली हो, इसमें शिक्षा पर खास ध्यान दिया जाए. क्योंकि ख़ास तौर पर इस समय प्रोफेशनल एजुकेशन महंगी है. उसे सस्ता किया जाना चाहिए क्योंकि भारत की शिक्षा व्यवस्था निजी हाथों में जा रही है और उसमें पैसा ही सब कुछ हो गया है. ऐसे में गरीब विद्यार्थियों के लिए मुश्किल हो गई है. वित्त मंत्री को इस दिशा में कुछ करना चाहिए ताकि शिक्षा गरीब लोगो के लिए भी उपलब्ध हो.”

    मनीष ये भी उम्मीद कर रहे हैं कि वित्त मंत्री युवाओं के लिए बेरोजगारी भत्ते का एलान कर सकते हैं.

    इसके अलावा उनकी मांगे हैं, “पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों को नीचे लाना चाहिए ताकि हम कह सकें कि ये आम बजट है. अगर इसमें आम लोगों के लिए कुछ भी नहीं हुआ तो फिर ये बेमानी होगा.”

    क्या इस बार के बजट में आम लोगों के लिए कोई नया टैक्स तो नहीं आएगा. इस बार मनीष कहते हैं, “अगर बजट में भ्रष्टाचार रोकने के उपाय शामिल कर लिया जाए तो टैक्स से अपने आप ही निजात मिल जाएगी.”

    राजस्थान के एक छोटे कस्बे से जयपुर में आकर तालीम ले रहे मनीष को किसानों की भी चिंता है. वे कहते हैं, “बजट में किसानों के लिए राहत का पैकेज होना चाहिए. किसानों को विकास की प्रक्रिया में शामिल किए बिना देश को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता.” ( बातचीत एवं फोटो- नारायण बारेठ, बीबीसी संवाददाता जयपुर)

  • कनीज़ फातमा, 30 साल, दुकानदार, कलानगर, मुंबई

    अपनी मुंबईया हिंदी में कनीज़ फातमा कहती हैं, “महंगाई बहुत बढ़ गायीला है. इतना बढ़ गायीला है कि अब औरतों को भी बाहर निकलकर काम करना पड़ रहा है. पहले केवल मेरे पति अकेले काम करते थे, अब हमको भी बाहर निकलकर ये दुकान चलानी पड़ रही है.”

    फातमा बजट से अपनी मांगों पर कहती हैं, “एक ही मांग है, महंगाई कम करो. इसके लिए गैस का दाम कम करो, अनाज का दाम कम करो, सब्जियों के दाम कम करो.”

    फातमा की शिकायतें और भी हैं, “मेरे बच्चे नगर निगम के स्कूल में पढ़ने जाते हैं, हम उन्हें अंग्रेजी स्कूल में भेजना चाहते हैं. हमारे जैसे लोगों के बच्चों को अंग्रेजी स्कूल में भेजने के लिए सरकार को बजट में सहायता की घोषणा करनी चाहिए.”

    हालांकि फातमा को सरकार से बहुत ज़्यादा उम्मीद नहीं है. वे कहती हैं, “चुनाव के समय में हम सबको वे लोग पैसा देने आते हैं, लेकिन उसके बाद वो नज़र नहीं आते. ये नेता हम ग़रीबों के बारे में नहीं सोचते. हमारे जैसे लोगों के लिए बजट में वो क्या करेंगे.” ( बातचीत एवं फोटो- ज़ुबैर अहमद, बीबीसी संवाददाता, मुंबई)

  • राम रुप वर्मा, 52 साल, टाइपिस्ट, लखनऊ

    शाहजहांपुर के राम रूप वर्मा पढ़ाई के लिए लखनऊ आये थे. शिया डिग्री कालेज से बीए करके हिन्दी टाइपिंग सीखी. सरकारी नौकरी के लिए दर्जनों बार आवेदन किया. इंटरव्यू दिया. पर सफलता नही मिली नही मिली. कहते हैं कि, “इंटरव्यू में सीधे- सीधे रिश्वत मांगी जाती थी. गरीब बेरोजगार कहाँ से रिश्वत के लिए पैसा लाते.”

    तीन साल के थे तभी पिता की मृत्यु हो गयी थी. इसलिए किसी का सहारा भी नही था. सरकारी नौकरी की उम्र बीत गयी तो 1990 में टाइप राइटर लेकर सचिवालय से सटे जी पी ओ के फुटपाथ पर बैठ गए. तब से यही पता ठिकाना है.

    अब बावन साल के हो गए हैं. तसल्ली यह कि गरीब और सताए हुए लोगों की दरखास्त टाइप करते हैं.

    राम रूप को एक पेज टाइप करने का दस रुपया मिलता है. कहते हैं कि दिन भर में कभी पचास तो कभी डेढ़ दो सौ रूपये मिल जाते हैं. राम रूप पर पत्नी के अलावा चार बच्चों की जिम्मेदारी है.

    बजट से क्या उम्मीद है?

    वह कहते हैं, “सरकार नौकरी तो दे नही पायेगी. यही गुजारिश है कि सरकार कोई और रोजगार दे दे. या कुछ आर्थिक सहायता करे, जिससे अपना कोई रोजगार धंधा कर सकें. या दूकान खुलवा दें.”

    मगर उन्हें बहुत अधिक उम्मीद नही है. कहते हैं, “सुनेगा कोई नही.”

    राम रूप आर्थिक उदारीकरण के दौर में रोजगार की तलाश में जवान से अधेड़ हो गए. अब उनकी उम्मीदें बच्चों पर टिकी हैं.

    ( बातचीत एवं फोटो- रामदत्त त्रिपाठी, बीबीसी संवाददाता, लखनऊ)

  • समीर सरिवारकर, बैंक कर्मचारी, बांद्रा कुर्ला कांपलैक्स, मुंबई

    समीर इस साल के बजट में मध्यम वर्ग के लिए कुछ छूट चाहते हैं. वे कहते हैं, “ जो बजट बनाया जा रहा है, उसमें मध्यम वर्ग और उससे निचले दर्जे के लोगों को कुछ छूट दिया जाना चाहिए.”

    ये छूट किन चीज़ों पर मिलनी चाहिए. इस पर समीर कहते हैं, “ खाने के सामान और ट्रांसपोर्ट पर तो सरकार को छूट देनी ही चाहिए.”

    इसके अलावा समीर को आयकर में भी छूट चाहिए. वे कहते हैं, “पिछले दो बजट से आयकर में कोई छूट नहीं दी गई है. इस बार हमें उम्मीद है कि सरकार कुछ छूट देगी.”

    समीर के मुताबिक देश की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए सरकार को कुछ ठोस कदम भी उठाने चाहिए. ( बातचीत एवं फोटो- ज़ुबैर अहमद, बीबीसी संवाददाता, मुंबई)

  • सुखसागर राय, 70 साल, किसान

    सुख सागर राय किसान हैं लेकिन उनके पास महज 5 कट्ठा जमीन की खेती है. दो बेटे सहित दस लोगों का भरा-पूरा परिवार है.

    लेकिन बजट को लेकर उन्हें कोई उम्मीद नहीं है. वे कहते हैं, “बजट-वजट से उम्मीद कुछ भी नहीं है. हम तो फटेहाल किसान हैं. बेटा भाड़े का टेम्पो-गाडी चलाकर कुछ पैसा नहीं कमाता तो इस टुट पुंजिया खेती के भरोसे भूखे मर जाते.”

    लेकिन ऐसा भी नहीं है कि सुखसागर को सरकार से कोई मांग नहीं है. वे कहते हैं, “हम अगर कहें कि बजट बनाने वाले सरकारी लोग हमारे जैसे मामूली किसान को साग-सब्जी उगाने के लिए दो साल तक बिना सूद के जरूरत के लायक पूंजी दे दे तो क्या सरकार दे देगी? और क्या उम्मीद करें? ये बजट तो चालाक, पढ़े-लिखे और धनी किसानों के लिए बनता होगा, जो लोग सरकारी छूट का फायदा लेना जानते हैं. उन्हीं लोगों का कर्जा भी माफ होता है. जब महंगाई पर कंट्रोले नहीं है तो भला बजट-फजट से क्या भला होगा? बुढापे में भी खुरपी-कुदाल चलाते हैं तो कुछ उपजा लेते हैं. बस इसी पर भरोसा है.''

    ( बातचीत एवं फोटो- मणिकांत ठाकुर)

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