जलियांवाला बाग़ के लिए कैमरन मांगेंगे माफ़ी?

  • 19 फरवरी 2013
कैमरन
प्रधानमंत्री के तौर पर यह कैमरन की दूसरी भारत यात्रा है.

ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरन भारत यात्रा पर हैं. ऐसे में सवाल उठाए जा रहे हैं कि क्या इस दौरान कैमरन 1919 में हुए जलियाँवाला गोलीकांड के लिए माफ़ी मांगेंगे?

यह वही स्थल है जहाँ वर्ष 1919 में ब्रितानी जनरल डायर के निर्देशों पर शांतिपूर्वक प्रदर्शन कर रहे भारतीय नागरिकों पर गोलियां चलाई गईं थीं और सैंकड़ों लोगों की मौत हुई थी.

सवाल यही है कि क्या डेविड कैमरन को भारत में ब्रिटेन के औपनिवेशिक इतिहास के दौरान हुए इस दर्दनाक हादसे के लिए माफ़ी मांगनी चाहिए?

कुछ महीने पहले दिल्ली में कैमरन के प्रमुख राजनयिक के सामने ये सवाल एकाएक रख दिया गया था जब एक नागरिक समारोह के दौरान ब्रितानी शासनकाल के दौरान जेल जा चुके एक व्यक्ति ने उनसे जानना चाहा कि ब्रिटेन आखिर माफ़ी कब मांगेगा.

प्रधानमंत्री के तौर पर कैमरन की दूसरी भारत यात्रा की शुरुआत से ही इस तरह के कयास लगते रहे हैं कि वह शायद माफ़ी मांग लेंगे.

असहज

मैं उस नागरिक समारोह में मौजूद था जब भारत में ब्रिटेन के उच्चायुक्त सर जेम्स बेवन से यह सवाल पूछ लिया गया था.

उनके असहज भाव से यह भी भांप गया था कि उनके पास इस सवाल का जवाब तैयार नहीं था.

जवाब में वह सिर्फ इतना कह कर बच निकले थे कि, "उनकी पैदाईश भारतीय स्वतंत्रता के बाद की है इसलिए इस सवाल पर जवाब देने के लिए वह उपयुक्त व्यक्ति नहीं हैं".

हालांकि जानकारों का मत है कि जलियांवाला बाग़ गोलीकांड के लिए ब्रिटेन की ओर से अगर डेविड कैमरन माफ़ी मांग लेते हैं तो भारत के साथ 'ख़ास रिश्ते' स्थापित करने की उनकी पहल को बल मिलेगा.

हालांकि इस दिशा में अभी बहुत कुछ होना बाकी है.

डेविड कैमरन से मुलाक़ात करने वाले एक जाने-माने निवेशक ने बताया, "भारतीय छात्रों के ब्रिटेन जाकर पढाई करने के अलावा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् में समर्थन की ही दरकार है भारत को ब्रिटेन से. इन चीज़ों के बाद महत्व घट जाता है".

'इंग्लैंड'

कैमरन
कैमरन की यात्रा की शुरुआत भारत की वाणिज्य राजधानी कहे जाने वाले मुंबई से हुई.

वैसे 'इंग्लैंड' शब्द का बढ़ता प्रयोग उस बात का एक सूचक है जो इस 'ख़ास रिश्ते' की और इशारा करता है और ज़्यादातर भारतीय लोगों की दिलचस्पी इस शब्द के इस्तेमाल में हैं.

हालांकि डेविड कैमरन के भारत आगमन पर एक बड़े राष्ट्रीय दैनिक ने तीन पन्नों के फीचर में यह दर्शाने की कोशिश की थी कि कैसे भारतीय लोग हर अमरीकी वस्तु के दीवाने हैं.

इन लेखों में ब्रिटेन को भारत में व्याप्त ब्रितानी अंग्रेजी तक लिए कोई श्रेय नहीं दिया गया था और यही बताया गया था कि दोनों देशों के संबंध एक 'अमरीकी' धागे से जुड़े हैं.

भारत अमरीका से ज्यादा प्रभावित है, यह बात अब पुरानी हो चुकी है.

वर्षों से भारतीय छात्र अमरीका जाना ज़्यादा पसंद करते हैं और अमरीका के बड़े विश्विद्यालय भारत में निवेश कर रहे हैं यह भी बात पुरानी हो चुकी है.

व्यापार

डेविड कैमरन ने हालांकि अपनी सरकार की ओर से अब साफ़ कर दिया है कि भारतीय छात्रों के लिए वीज़ा कानून नरम किए जाएँगे.

वर्ष 2010 में हुई उनकी पिछली यात्रा के बाद से भारत और ब्रिटेन के बीच व्यापार भी बढ़ा है लेकिन अभी भी यह जर्मनी और बेल्जियम की तुलना में कम है.

जबकि फ्रांस-भारत के मध्य व्यापार भी तेज़ी से बढ़ता जा रहा है.

रहा सवाल भारत का तो इसके साथ कारोबार करने वाले दो सबसे बड़े देश अभी भी चीन और अमरीका ही हैं.

हालांकि यह भी सही है कि भारतीय कम्पनियाँ धीरे-धीरे ब्रिटेन के उद्योग खरीद रहीं हैं.

माफ़ी से मदद?

कैमरन
मंगलवार को कैमरन ने दिल्ली में मनमोहन सिंह से मुलाक़ात की.

अगर डेविड कैमरन माफ़ी मांगते हैं तो ज़ाहिर तौर पर यह उस घटना से बेहतर होगा जो प्रिंस फिलिप की जलियांवाला बाग़ यात्रा के दौरान 1997 में हुई थी.

शाही यात्रा पर गए प्रिंस फिलिप के उस बयान ने एक बड़ा विवाद खड़ा कर दिया था जब उन्होंने कहा था कि गोलीकांड में मरने वालों की तादाद "बढ़ा-चढ़ा कर पेश की गई है".

इस बीच ख़बरों के मुताबिक़ जलियांवाला गोलीकांड में कथित रूप से मारे गए लगभग 1,000 भारतीय लोगों के परिवार वाले डेविड कैमरन से माफ़ी की उम्मीद कर रहे हैं.

जबकि भारत के पूर्व विदेश सचिव श्याम सरन का कहना है कि, "इस माफ़ी का स्वागत देश भर में होगा."

हालांकि इसके फायदे बेहद कम समय के लिए ही हो सकते हैं.

लेखक और पूर्व वाणिज्य प्रमुख गुरचरण दास कहते हैं कि ब्रितानी माफ़ी महज़ 'राजनीतिक कदम' ही हो सकती है और यह अब ज़्यादातर भारतीयों के लिए बड़ा मुद्दा नहीं है.

उनका कहना है, "भारत की नई पीढ़ी इससे आगे बढ़ चुकी है."

एक वरिष्ठ निवेशक का कहना है कि, "जापान के साथ सबका पता है रेलवे का मसला है जबकि फ्रांस के साथ परमाणु ऊर्जा का. लोग यह नहीं जान पाए हैं कि ब्रितानी यहां क्यों हैं?

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