कश्मीरी पत्रकार गिलानी की नजरबंदी पर पुलिस चुप

  • 10 फरवरी 2013
इफ़्तिख़ार गिलानी
कश्मीरी मूल के पत्रकार इफ़्तिख़ार गिलानी पिछले 20 साल से दिल्ली में पत्रकारिता कर रहे हैं

दिल्ली पुलिस ने उन ख़बरों पर टिप्पणी करने से इंकार कर दिया है जिनके मुताबिक शनिवार को जाने-माने पत्रकार इफ़्तिख़ार गिलानी को नज़रबंद कर लिया गया था.

कश्मीरी-मूल के गिलानी को शनिवार सुबह दिल्ली में उनके घर की पार्किंग से दिल्ली पुलिस के स्पेशल सेल के अधिकारियों ने पकड़ लिया था. वहां से उन्हें, उनके ससुर और कश्मीरी नेता सैयद अली शाह गिलानी के घर ले जाया गया जहां कई घंटों तक उन्हें नज़रबंद रखने के बाद छोड़ दिया गया.

दिल्ली पुलिस के प्रवक्ता राजन भगत से जब बीबीसी हिंदी ने इस बारे में प्रतिक्रिया जाननी चाही, तो उन्होंने “नो कमेंट्स” कहकर फोन काट दिया.

ज़बरदस्ती नज़रबंद

इससे पहले बीबीसी के साथ बात करते हुए इफ़्तिख़ार गिलानी ने बताया कि शनिवार सुबह जब वे काम के लिए निकल रहे थे, तब दो लोग आए और उनसे पूछने लगे कि गिलानी साहब का मकान कौन सा है.

गिलानी ने बताया, "मुझे लगा कि कुरियर वाले हैं तो मैंने पूछा कि आप किस गिलानी साहब के बारे में पूछ रहे हैं तो उन्होंने कहा वो जो कश्मीर के नेता हैं. मैंने कहा कि वो यहां नहीं रहते हैं, दूसरे ब्लॉक में रहते हैं. मैं उन्हें जगह बताने लगा तो उन्होंने मुझसे कहा कि मैं उन्हें वहां तक ले जाऊं. रास्ते में उन लोगों ने मुझे बताया कि वो दिल्ली पुलिस के स्पेशल सेल के हैं और उन्हें गिलानी साहब से कुछ बातचीत करनी है."

इफ़्तिखार गिलानी कहते हैं कि जब वे वहां से लौटने लगे तो उन्हें जबरन उस घर में ले जाया गया, ये कह कर कि पुलिस वालों को उनसे बात करनी है. घर के अंदर कुछ और लोग पहले से ही मौजूद थे जिनकी पुलिस वाले तलाशी ले रहे थे और पूछताछ कर रहे थे. इस अफ़रा-तफ़री में गिलानी किसी तरह से अपने संपादक से संपर्क करने में सफल हो गए.

वे कहते हैं, "पुलिस वालों ने काफ़ी धमकी वाले स्वर में हमें कहा कि आप नज़रबंद हैं और आपको यहीं रुकना है. वे मेरी बीवी को भी मेरे घर से ले आए. मेरे बच्चे घर पर अकेले थे. मैंने बहुत कहा कि मुझे पुलिस स्टेशन या मेरे घर ले चलिए, लेकिन वो लोग कुछ सुनने के लिए तैयार नहीं थे. करीब चार-पांच घंटे के बाद, जब मेरे ऑफिस वालों ने अपने सूत्रों और पहचान का इस्तेमाल किया, तो मुझसे कहा गया कि आप जा सकते है."

इफ़्तिखा़र के मुताबिक उनके घर में भी कुछ लोग मौजूद थे जिन्होंने उनके बच्चों को बेडरूम में बंद कर रखा था. वे कहते हैं कि उनके बच्चे बहुत सहमे और डरे हुए थे. यहां तक कि उनके पड़ोसियों को भी धमका दिया था कि आप ऐसे दहशतगर्द को यहां कॉलोनी में रहने देते हो.

लोगों में डर

इफ़्तिखा़र कहते हैं कि इस हादसे ने उन्हें पूरी तरह डरा दिया है और जो कुछ उनके साथ हुआ वो बिल्कुल ग़लत था. वे कहते हैं कि भले ही सैयद अली गिलानी उनके ससुर हैं, लेकिन उनकी सियासत के साख उनका कोई मतलब नहीं है. वे कहते हैं कि वो पत्रकार हैं और पिछले 20 साल से दिल्ली में पत्रकारिता कर रहे हैं.

उनका कहना था कि शाम को खुफ़िया एजेंसी के प्रमुख ने उनके संपादक से खेद जताया और कहा कि कम्युनिशेकन गैप था जिसकी वजह से उन्हें (इफ़्तिखार गिलानी) को ये सहना पड़ा. लेकिन इफ़्तिख़ार कहते हैं कि जो लोग उन्हें उठाकर ले गए थे, उनके पास उनका नाम और पता था. वे पुलिस की सफ़ाई से संतुष्ट नहीं हैं.

वे कहते हैं, "मुझे समझ नहीं आता कि मैं कैसे साबित करुं कि मैं क़ानून का पालन करने वाला नागरिक हूं."

इफ़्तिख़ार मानते हैं कि उनकी नज़रबंदी का अफ़ज़ल गुरु की फ़ांसी के मामले से संबंध था.

वे कहते हैं, "जिस समय अफ़ज़ल गुरु को फांसी देने की ख़बर आई, उसके कुछ ही समय बाद ये मामला हुआ, तो उससे जुड़ा हुआ है. अगर सरकार को का़नून व्यवस्था बनाए रखने के लिए कदम उठाने भी हैं, तो मुझे समझ नही आता कि मैं कैसे क़ानून व्यवस्था के लिए ख़तरा था."

ये पूछे जाने पर कि उनका अगला कदम क्या होगा, इफ़्तिखा़र गिलानी ने कहा,"मेरा क्या कदम हो सकता है? मैं पत्रकार हूं और वही करना चाहता हूं. पत्रकार के लिए सबसे बड़ी मौत यही है कि वो ख़बर बनाने की बजाय ख़ुद ख़बर बन जाता है."

'भारत कश्मीरियों को हिस्सा नहीं समझता'

इस पूरे घटनाक्रम पर गिलानी का कहना था, "इस तरह के मामलों से ये तो साफ़ हो जाता है कि चाहे कश्मीरी ख़ुद को भारत का हिस्सा समझे या न समझें, लेकिन भारत उन्हें अपना हिस्सा नहीं समझने के लिए तैयार है, ख़ासतौर पर सरकार की इस तरह ग़ैर-जवाबदेह खुफि़या एजेंसी और प्रशासन."

उन्होंने आगे कहा, "...और जब वो उन्हें अपना हिस्सा समझने के लिए तैयार नहीं है, तो ज़ाहिर है कि ये एक चक्र है, इसकी प्रतिक्रिया भी होगी. ऐसे में आप किसको दोष देंगे?"

वे ये भी कहते हैं, "कश्मीर में अगर अलगाववाद है तो भारत में भी कम अलगाववाद नहीं है. वो कश्मीरियों से बहुत अलग तरह से बर्ताव करते हैं. जो लोग ख़ुद को भारत का हिस्सा समझना चाहें भी, उनको भी आप ऐसा समझने नहीं देते, उनके लिए लोकतंत्र नहीं, उनके लिए सहानुभूति नहीं है."

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