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कंप्यूटर खोल रहे नीतीश शासन की कलई

 बुधवार, 6 फ़रवरी, 2013 को 16:27 IST तक के समाचार
बिहार में घपला

बिहार में कंप्यूटर में दर्ज हो रहे हैं सरकारी आंकड़े

बिहार में सरकारी योजना से जुड़ी जानकारी कंप्यूटर में दर्ज होते समय कई गड़बड़ियों और घोटालों का पता चल रहा है.

कहीं रोजगार गारंटी योजना में घपला पकड़ा जा रहा है तो कहीं स्कूली छात्रों को साइकल-पोशाक के लिए मिलने वाली सहायता राशि में गड़बड़ियां मिल रही हैं.

विभागीय मंत्री ये कहकर झेंप मिटा रहे हैं कि ख़ुद सरकारी पहल पर इन गड़बड़ियों का पता चला.

हालांकि सारा कमाल कंप्यूटर की उस ख़ूबी का है, जो फ़ीड के बावजूद फ़र्ज़ी या बेमेल एंट्री को पचा ही नहीं पाता है और डुप्लीकेट या फर्जी नाम का खुलासा कर देता है.

इसी कारण स्कूलों में लाखों की तादाद में नकली नामांकन के आंकड़े निकल आए. रजिस्टर में दर्ज छात्र-छात्राओं की संख्या और वास्तविक उपस्थिति में भारी अंतर भी सामने आया.

नतीजा ये हुआ कि स्कूलों में बच्चों के दाख़िले की दर काफ़ी बढ़ा देने का ढोल पीट रही राज्य सरकार का मुंह इस कंप्यूटरी करामात से लटक गया.

नक़ली नामांकन और लूट

"सामने आई तमाम गड़बड़ियों की ना सिर्फ जांच जारी है, बल्कि कार्रवाई भी हो रही है. उनके मुताबिक नरेगा श्रमिकों के खाते अब पोस्ट ऑफिस से हटाकर बैंकों में खोले जा रहे हैं."

अतुल वर्मा, नरेगा मॉनिटरिंग अधिकारी

एक ही छात्र या छात्रा का नाम दो-तीन स्कूलों में दर्ज पाया गया. इससे साबित हुआ कि साइकिल या पोशाक के लिए सरकार से मिलने वाली राशि के दोबारा -तिबारा भुगतान का घोटाला हुआ है.

बाद में सरकारी आंकड़ों में ही स्वीकार कर लिया गया कि राज्य के कुल 38 में से 9 ज़िलों में जिन दस लाख नामांकनों की जांच की गई, उनमें तीन लाख छत्तीस हज़ार नक़ली नामांकन थे.

इस खुलासे पर हुई भारी फजीहत से सचेत राज्य सरकार ने गुणवत्ता जांच मिशन जारी रहने के नाम पर बाक़ी 29 ज़िलों के आंकड़े घोषित ही नहीं किए.

अब इस गड़बड़ी को रोकने के लिए स्कूलों में छात्र-छात्राओं की 75 प्रतिशत उपस्थिति की जो शर्त लगा दी गई है, लेकिन इसका तीखा विरोध हो रहा है.

ऐसे में ये भी आरोप लग रहे हैं कि अटेंडेंस यानी हाज़री बनाने के लिए भी घूसखोरी शुरू हो गई है और कहीं-कहीं तो इस कारण शिक्षक पीटे जा रहे हैं.

बीस लाख फ़र्ज़ी 'जॉब कार्ड'

ई-गवर्नेंस का सबसे ताज़ा झटका राज्य की नीतीश कुमार सरकार को महात्मा गाँधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना यानी नरेगा से लगा है.

'नरेगा' के तहत बिहार में पंजीकृत एक करोड़ 31 लाख श्रमिकों को ‘जॉब कार्ड’ दिए गए हैं. सरकारी सूचनानुसार इनमें से तक़रीबन 76 लाख कार्डधारियों ने काम ही नहीं मांगा.

नीतीश कुमार

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के 'सुशासन' की बड़ी चर्चा होती है

लेकिन जो आंकड़े कंप्यूटर पर मैनेजमेंट इनफ़ॉर्मेशन सिस्टम (एमआइएस) के तहत सामने आए, वे बेहद चौंकाने वाले हैं.

बताया गया है कि बीस लाख लोगों के नाम से दो-दो ‘जॉब कार्ड’ बने हुए हैं. सबसे ज़्यादा यानी 96 हज़ार 855 डुप्लीकेट जॉब कार्ड मुज़फ्फ़रपुर ज़िले में पाए गए हैं.

पंचायतों की ओर से जारी किए गए इन बीस लाख फ़र्ज़ी कार्डों को नहीं पकड़ पाने का दोष राज्य सरकार ने पंचायत रोज़गार सेवक और प्रखंड कार्यक्रम पदाधिकारी पर मढ़ा है.

इस फ़र्ज़ीवाडे में नींचे से ऊपर तक भ्रष्ट सरकारी कर्मियों की मिलीभगत और अरबों रूपए के घोटाले का आरोप लगता रहा है.

हाल ही सेंटर फॉर एन्वायर्मेंट एंड फ़ूड सिक्योरिटी नामक संस्था ने एक सर्वेक्षण के ज़रिए दावा किया कि बिहार में नरेगा के कम से कम छह हज़ार करोड़ रूपए बिना काम के बंट गए.

यह सर्वेक्षण राज्य के दस ज़िलों में ढाई हज़ार परिवारों के बीच किया गया, बताते हैं.

दूसरी तरफ बिहार सरकार के ग्रामीण विकास विभाग में नरेगा की मॉनिटरिंग से जुड़े अधिकारी अतुल वर्मा ने बीबीसी को बताया कि सामने आई तमाम गड़बड़ियों की ना सिर्फ जांच जारी है, बल्कि कार्रवाई भी हो रही है. उनके मुताबिक नरेगा श्रमिकों के खाते अब पोस्ट ऑफिस से हटाकर बैंकों में खोले जा रहे हैं.

सरकार कहती है कार्रवाई हुई

"नीतीश सरकार ने ई-गवर्नेंस वाली आधुनिक छवि बनाने के चक्कर में आई-टी टूल्स का जो इस्तमाल शुरू करवाया तो मामला उल्टा पड़ गया. मशीन झूठ नहीं बोलती"

अजय कुमार, बिहार टाइम्स के संपादक

राज्य सरकार ने इस तरह की गड़बड़ियों की जांच पहले से ही करने और अबतक 286 नरेगा कर्मियों पर एफ़आइआर और 251 को बर्खास्त करने की सूचना दी है.

इस विषय पर पैनी नज़र रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार और ' बिहार टाइम्स ' के संपादक अजय कुमार ने कहा, “नीतीश सरकार ने ई-गवर्नेंस वाली आधुनिक छवि बनाने के चक्कर में आई-टी टूल्स का जो इस्तमाल शुरू करवाया तो मामला उल्टा पड़ गया. मशीन झूठ नहीं बोलती, इसलिए जो सूचनाएं उसमें डाली गईं, उनका तालमेल वास्तविक आंकड़ों के साथ नहीं बैठा. इसी कारण राज्य में पल-बढ़ रहे घपलों के लक्षण वाली गड़बड़ी कंप्यूटर की भाषा में भी दिखने लगी. अब तो सरकार कवर-अप में जुट गयी है. "

एएन सिन्हा समाज अध्ययन संस्थान के निदेशक डीएम दिवाकर इस बारे में कुछ अलग तर्क पेश करते हैं.

उन्होंने कहा, “सूचना तंत्र में जो आंकड़ा नहीं छिपा पाने का गुण निहित होता है, उसका अंदाजा भ्रष्ट सरकारी तंत्र को अक्सर नहीं हो पाता है. फ़ाइलों में भ्रष्टाचार दबे होने का ज़माना बदल रहा है और कंप्यूटरों से कामकाज में पारदर्शिता बढ़ी है. इसलिए गड़बड़ियों का इस तरह पकड़ में आना आसान हुआ है. हालांकि ऐसा दावा भी नहीं किया जा सकता कि इस डर से भ्रष्टाचार कम होगा.”

ज़ाहिर है कि अपने सूचना तंत्र से भी सामने आ चुके तथ्यों को झुठलाना राज्य सरकार के लिए संभव नहीं हो पा रहा है.

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