मझधार में फंसी केरल की 'सुहागिन विधवाएं'

  • 3 फरवरी 2013
केरल
अरब सागर के पार केरल के इन लोगों के सपने बसते हैं

केरल के मुस्लिम-बहुल मल्लापुरम शहर से कुछ दूर स्थित सरकारी अस्पताल में बहुत सी महिलाएं डॉक्टर से अपनी मुलाकात का इंतजार कर रही हैं.

गोद में बच्चे लिए वो यहां काउंसलिंग के लिए आई हैं क्योंकि वो कई तरह की मानसिक परेशानियों से जूझ रही हैं.

दरअसल कम उम्र में खाड़ी देशों में काम करने वाले युवकों से शादी के बाद वो अब अकेली रह गई हैं. इस तन्हाई और अकेलेपन ने इनको मानसिक रूप से तोड़ दिया है और ये समस्या अब समाज के साथ साथ केरल की सरकार के लिए भी चिंता का विषय बन गई है.

सरकार ने मल्लापुरम, कोजीकोड और आसपास के इलाकों में जिला, प्रखंड और यहाँ तक कि गाँव के स्तर पर भी मनोचिकित्सकों की नियुक्ति शुरू कर दी है ताकि मानसिक रूप से परेशान इन महिलाओं को राहत मिल सके.

मुश्किल मुकद्दर

सरकारी अस्पताल में काम कर रहीं डॉक्टर रमला दिन भर कई मरीजों से रूबरू होती हैं. वो इस समस्या को समझने की कोशिश कर रहीं है. मगर मरीजों की इतनी संख्या है कि वो भी इनसे बात करते करते थक जाती हैं.

मैं अस्पताल में उनके क्लिनिक में ही मौजूद था जब वो कुछ लड़कियों से मलयालम में बात कर रही थीं. बातचीत का सारांश वो मुझे बताती रहती थीं.

वो कहती हैं, “सबसे बड़ी समस्या है कम उम्र में लड़कियों की शादी कराने की प्रथा. वो जल्दी माँ बन जाती हैं और पति से दूर रहते रहते हुए उनकी मानसिक स्थिति ठीक नहीं रहती. मानसिक रोग कई समस्याओं की जननी है.”

रमला ने बताया कि समय के साथ परिवार में कई समस्याएं पैदा होती हैं. पति के साथ समस्या और ससुराल की समस्या, जिसकी वजह से ये लड़कियां मानसिक तनाव में ही रहने को मजबूर हो जाती हैं.

"इनकी त्रासदी है कि सुहागिन होते हुए भी वो विधवाओं जैसा जीवन जीने पर मजबूर हैं. पति का इंतज़ार करना इनकी नियति है. और अपने अरमानों का गला घोटना इनका कर्त्तव्य."

बढ़ती कलह

इलाके के जाने माने वकील शसमुद्दीन कहते हैं कि अब मल्लापुरम के लोगों ने इसी के बीच जीने की आदत डाल ली है.

वो कहते हैं., “गल्फ सिंड्रोम एक हकीकत है. लोग उसे स्वीकार भी कर रहे हैं और उसकी वजह से समझौता भी कर रहे हैं. ये अब यहां की ज़िंदगी का हिस्सा है. कई ऐसे मामले हैं जहां शादी को बीस साल बीत गए हैं मगर पति पत्नी इस दौरान अगर साथ रहे हैं, तो वो मात्र नौ या दस महीनों के लिए.”

शमसुद्दीन का कहना है कि अब समाज के इस व्यवहार की वजह से पारिवारिक कलह अपने चरम पर है. अब इस इलाके में तलाक़ के मामले भी ज्यादा हो रहे हैं.

समाज में समस्या ने जब विकराल रूप धारण करना शुरू कर दिया तो जमात-ए- इस्लामी ने भी इसे रोकने के लिए बड़े पैमाने पर अभियान चलाया और कई इलाकों में अपने काउंसलर नियुक्त किए.

चूंकि जमात-ए-इस्लामी का इस इलाके में ख़ासा प्रभाव है, इसलिए संगठन ने समाज में जागरूकता अभियान चलाया है. मगर संगठन के लोग इस पूरे प्रकरण पर अपना एक अलग ही दृष्टिकोण रखते हैं.

जमात के प्रवक्ता नसीरुद्दीन अलुंगल का कहना है कि ये नहीं समझा जाए कि लड़कियां इससे कमज़ोर हो रही हैं. अलबत्ता वो इस परिस्थिति से और मज़बूत हो रही हैं.

उनका तर्क है कि पति के बिना रहने पर वे परिवार के प्रमुख का काम कर रही हैं और अच्छी मेनेजर बन रही हैं.

ना घर के ना घाट के

केरल
केरल के इस इलाके में खाड़ी देश जाने वालों की कमी नहीं है.

इस तरह की शादियों के कई और पहलू भी है. वो लड़के, जो अपनी पूरी ज़िंदगी खाड़ी के देशों में मेहनत कर बिता देते हैं ताकि उनका परिवार सुखी रहे, वो ज़िन्दगी के अगले पड़ाव में अपने आपको अकेला महसूस करने लगते हैं.

परिवार से दूर रहने की वजह से परिवार के लोगों का उनसे उतना भावनात्मक जुडाव नहीं रहता. उन्हें लगता है कि वो बस पैसे कमाने की एक मशीन भर बन कर रह गए हैं.

मल्लापुरम में मेरी मुलाक़ात अधेड़ उम्र के मोहम्मद कुट्टी से हुई जो खाड़ी देश में कई सालों तक ड्राइवर की नौकरी करने के बाद वापस लौटे तो उनके पास कुछ नहीं रहा. न बीवी बच्चों का साथ और न ही कोई जमा पूँजी.

वो भावुक होकर कहते हैं, “कमाने के लिए बहार गए. रात दिन मेहनत की. दूर रहकर पैसे इकठ्ठा किए. दूर रहने से क्या हुआ. ये हुआ कि हमारे लिए किसी की कोई भावना नहीं है. हम साथ नहीं रहे ना. अब ना बीवी पहचानती है न बच्चे.”

फिर भी अरब सागर के उस पार बसे खाड़ी के देशों में काम करना केरल के इस इलाके के लोगों के लिए सपनों की दुनिया है. नौबत यहां तक आ पहुंची है कि लोग अब वहां कम पैसों में भी काम करने को तैयार हैं.

यही वजह हैं कि वहां उनका खूब शोषण होता है. जिस सुंदर भविष्य का सपना संजोय वो खाड़ी के देशों में जा रहे हैं, उसने अब इन्हें कहीं का न छोड़ा. ऐसे में वो न इधर के रहते हैं और उधर के.